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धर्मांतरण विरोधी कानून संबंधी आदेश में बदलाव की गुजरात सरकार की अर्जी कोर्ट में हुई खारिज

गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की नए धर्मांतरण रोधी कानून की धारा पांच के क्रियान्वयन पर रोक के संबंध में कोर्ट के हालिया फैसले में संशोधन का अनुरोध करने वाली अर्जी आज खारिज कर दी। गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता (संशोधन) कानून, 2021 की धारा-पांच के तहत पुजारी के लिए किसी व्यक्ति का धर्मांतरण कराने से पहले जिलाधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य है। 

इसके साथ ही धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति के लिए भी निर्धारित आवेदन भरकर अपनी सहमति के बारे में जिलाधिकारी को अवगत कराना आवश्यक है। राज्य के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी की दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति बीरेन वैष्णव की खंडपीठ ने कहा, ‘‘हमें 19 अगस्त को हमारे द्वारा पारित आदेश में कोई बदलाव करने का कोई कारण नजर नहीं आता।’’ 

राज्य सरकार के वकील त्रिवेदी ने पीठ से कहा कि गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम, 2021 की धारा पांच मूल कानून को 2003 में क्रियान्वित किए जाने के समय से लागू है और इसका विवाह से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने न्यायाधीशों को यह समझाने की कोशिश की कि धारा पांच पर रोक वास्तव में पूरे कानून के क्रियान्वयन पर ही रोक लगा देगी और धर्मांतरण से पहले कोई भी व्यक्ति अनुमति लेने के लिए अधिकारियों से संपर्क नहीं करेगा। 

उल्लेखनीय है कि हाई कोर्ट ने 19 अगस्त को दिए अपने आदेश में गुजरात धार्मिक आजादी (संशोधन) अधिनियम-2021 की धाराओं- तीन, चार, चार ए से लेकर चार सी तक, पांच, छह और छह ए पर सुनवाई लंबित रहने तक रोक लगा दी थी। पीठ ने कहा था, ‘‘हमारी यह राय है कि आगे की सुनवाई लंबित रहने तक धारा तीन, चार, चार ए से लेकर धारा चार सी, पांच, छह एवं छह ए को तब लागू नहीं किया जाएगा, यदि एक धर्म का व्यक्ति किसी दूसरे धर्म व्यक्ति के साथ बल प्रयोग किए बिना, कोई प्रलोभन दिए बिना या कपटपूर्ण साधनों का इस्तेमाल किए बिना विवाह करता है और ऐसे विवाहों को गैरकानूनी धर्मांतरण के उद्देश्य से किए गए विवाह करार नहीं दिया जा सकता।’’ 

त्रिवेदी ने कोर्ट से कहा कि धारा पांच में ÒविवाहÓ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है और यह विवाह से पहले या बाद में या उन मामलों में भी धर्मांतरण के लिए जिलाधिकारी की अनुमति से संबंधित है, जिनमें धर्मांतरण का विवाह से संबंध नहीं है। त्रिवेदी ने पीठ से अपने पिछले आदेश में सुधार करके धारा पांच पर लगी रोक हटाने का आग्रह करते हुए कहा, ‘‘चूंकि धारा पांच पर रोक है, तो कोई भी व्यक्ति अनुमति नहीं लेगा, भले ही यह बिना विवाह के स्वैच्छिक धर्मांतरण कर रहा हो। वे कहेंगे कि हाई कोर्ट ने धारा पांच पर रोक लगा दी है। यह ऐसे प्रस्तावों के लिए है, जहां सब कुछ स्वेच्छा से किया जाता है। इस आदेश का मतलब है कि अब पूरे कानून पर रोक लग गई है।’’ 

त्रिवेदी ने कहा, ‘‘जिन अन्य धाराओं पर रोक लगाई गई है, वे विवाह से संबंधित हैं, जबकि धारा पांच कानूनी रूप से स्वैच्छिक धर्मांतरण के लिए है। उस धारा के तहत, यदि कोई पुजारी के पास जाता है, तो पुजारी को अनुमति लेनी पड़ती है। यह वैध धर्मांतरण से संबंधित है। वैध धर्मांतरण संबंधी धारा पर रोक लगाने की आवश्यकता क्यों है?’’ पीठ ने त्रिवेदी से कहा कि यह उनकी (त्रिवेदी की) अपनी व्याख्या है कि हाई कोर्ट ने सभी प्रकार के धर्मांतरण के लिए पूर्व अनुमति वाले हिस्से पर रोक लगा दी है। 

मुख्य न्यायाधीश नाथ ने राज्य सरकार की अर्जी खारिज करते हुए कहा, ‘‘अगर कोई अविवाहित व्यक्ति धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे उस अनुमति की आवश्यकता होगी। हमने इस पर रोक नहीं लगाई है। हमने केवल विवाह के माध्यम से धर्मांतरण पर रोक लगाई है। हमने आदेश में यही कहा है।’’ 

विवाह के माध्यम से जबरन या धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन के लिए दंडित करने वाले गुजरात धार्मिक स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम, 2021 को राज्य सरकार ने 15 जून को अधिसूचित किया गया था। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी भाजपा सरकारों ने इसी तरह के कानून बनाए हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद की गुजरात शाखा ने पिछले महीने दाखिल एक याचिका में कहा था कि कानून की कुछ संशोधित धाराएं असंवैधानिक हैं।