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बिहार में कठिन है चुनाव की डगर बहुत है अगर-मगर : बाबा भागलपुर

भागलपुर : लोकसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा 10 मार्च 2019 को हुई है। लेकिन अभी तक बिहार में किसी भी पार्टी के तरफ से उम्मीदवारों का ऐलान नहीं किया गया है। इस संबंध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पं. आर. के. चौधरी, बाबा भागलपुर ने विवेचनोपरान्त बतलाया कि लोकसभा चुनाव में इस बार बिहार में एनडीए और महागठबंधन के बीच रोचक मुकाबला होने की बात कही जा रही है।

देश के कई राज्यों की तरह बिहार में भी पिछला लोकसभा चुनाव-2014 ई. एक तरफा था। मोदी लहर के चलते बीजेपी ने बड़ी छलांग लगाई थी। बिहार में अब मुकाबला एकतरफा नहीं दिख रहा है। शायद यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक दल द्वारा अभी तक उम्म्मीदवारों की घोषणा नहीं हुई है। जबकि राज्य में पहले चरण से ही मतदान होना तय है। इस बार यह तय है कि चुनाव दो बड़े गठबंधनों के बीच होगा। दो प्रमुख गठबंधनों यथा राजग और महागठबंधन में मुकाबला होना है।

सूत्रों से पता चला है कि वामपंथी संगठन और जीतन राम मांझी सरीखे लोग भी मान गये हैं, लेकिन मधेपुरा के निवर्तमान सांसद राजेश रंजन ;पप्पू यादवद्ध नहीं माने है इसलिए एक-दो सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले की गुंंजाइश बन सकती है। बहरहाल उन्हें साधने की भरपूर चेष्टा की जा रही है।

खबरें हैं कि सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का राजनीतिक हित भाजपा से सधता नहीं दिख रहा है। लिहाजा वे या तो महागठबंधन के साथ रहेंगे या फिर एकला। लेकिन यह तो तय है कि इस चुनावी दंगल में मुकाबला जोरदार ढंग से होगा। गठबंधनों की मुश्किल कम नहीं दिखती है, क्योंकि इस बार पप्पू के अलावा दूसरे दल या नेता भी गठबंधनों का सिरदर्द बढ़ाए हुए हैं।

सलीका-सहूलियत वाली मानी जा रही भाजपा भी अभी तक अपने कोटे की सीटों की घोषणा नहीं कर पाई है। जबकि दो माह पहले तय हो गया था कि वह बिहार में अपने सहयोगी जदयू के साथ सामान्य रूप से बराबर.बराबर सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी। भाजपा और जदयू को 17-17 सीटें मिली है। बाकी छह सीटें केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की लोजपा को।

यह परिलक्षित हो रहा है कि इतिहास के दर्पण में बहुत दिनों तक अपनी छवि को बरकरार रख पाएगा 2019 ई. का लोकसभा चुनाव। लोकतंत्र में स्पष्ट बहुमत लोकतंत्र की मजबूती है क्योंकि कोई भी निर्णय लेने में आसानी होती है तथा बेवजह या स्वार्थवश निर्णय को प्रभावित करने से बचा जा सकता है। लेकिन इस चुनाव से स्पष्ट बहुमत की उम्मीद पिछले चुनाव की तुलना में बहुत कम है। अत: त्रिशंकु या मध्यावधि चुनाव भी देखाना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं। छोटी पार्टियां भी अपने को इस चुनाव में तुरूप का इक्का समझ रही है। अत: मांग एवं आकांक्षा की प्रकाष्ठा भी इस चुनाव में हमें देखने को मिलना तय है।