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चंबल के पूर्व डकैत मोहर सिंह ने PM से प्राचीन मंदिरों की दुर्लभ धरोहर बचाने के लिए लगाई गुहार

चंबल के बीहड़ों में आतंक का पर्याय रहे दस्यु सरगना मोहर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थित नौवीं शताब्दी के क़रीब 200 मंदिरों का जीर्णोद्धार कराने की अपील की है। मुरैना के महगांव निवासी 92 वर्षीय मोहर सिंह ने मोदी को लिखे एक पत्र में कहा है कि उनके पूर्वजों द्वारा बनवाए गए “मंदिरों को एक-एक करके गिरते हुए नहीं देखा जाता।” 

मोहर सिंह ने कहा कि उन्होंने छह सितंबर को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बटेश्वर स्थित इन मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम फिर से शुरु कराने की अपील की है। पूर्व दस्यु ने कहा, उन्हें “ उम्मीद है कि वे हमारी बात को सुनेंगे।’’ उल्लेखनीय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की मध्य प्रदेश इकाई के तत्कालीन प्रमुख के के मोहम्मद ने 2005 में उत्खनन कराकर जमींदोज हो चुके 80 मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था। 

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उनकी अगुवाई में यह काम 2013 तक चला लेकिन, उनके सेवानिवृत्त होने पर काम बंद हो गया, जो तमाम प्रयासों के बाद अब तक शुरु नहीं हो पाया। मोहम्मद ने बताया कि मुरैना से महज पांच मील की दूरी पर मितावली, पढ़ावली और बटेश्वर गांव के आसपास ऐतिहासिक महत्व के अनेकों स्थल हैं। इनमें मितावली स्थित प्रतिहार कालीन चौंसठ योगिनी मंदिर भी है। 

मोहम्मद सहित अन्य इतिहासकारों का दावा है कि संसद भवन का डिजाइन आठवीं शताब्दी में निर्मित इसी मंदिर की प्रतिकृति है। उन्होंने बताया कि गुर्जर प्रतिहार काल में शासन सत्ता के केन्द्र में रहे ये तीनों गांव, तीन किमी के दायरे में हैं। उन्होंने इन स्थलों का जीर्णोद्धार कर इस क्षेत्र को टूरिस्ट सर्किट बनाने वाली योजना को बटेश्वर से शुरु किया था। लेकिन उनके सेवानिवृत्त होने के बाद योजना का काम आगे नहीं बढ़ा। 

मोहम्मद के अनुसार, बटेश्वर में 200 मंदिरों के अवशेष मौजूद हैं और इनमें से सिर्फ 80 मंदिरों का जीर्णोद्धार हो सका। उन्होंने बताया कि, इनमें अधिकांश शिव मंदिर हैं। मोहर सिंह ने कहा कि ‘‘45 साल पहले जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर हमने बंदूक और बीहड़ को छोड़ दिया था। 

तब से हम बटेश्वर, मितावली और पड़ावली में स्थित इन मंदिरों के आसपास ही रहे। अब 92 साल की उम्र में इन मंदिरों को एक एक कर गिरते नहीं देख सकते। पत्र में मोहर सिंह ने स्वयं को गुर्जर प्रतिहार वंश से ताल्लुक रखने वाला बताते हुए कहा है कि उनके पूर्वजों गुर्जर प्रतिहारों द्वारा नौवीं शताब्दी में इन मंदिरों को बनवाया गया था।