अहंकार को न होने दे अपने पर हावी


जीवन में सब कुछ संतोष से, विनम्रता से और झुककर प्राप्त किया जा सकता है। इंसान अभिमान से दूर रहे, अहंकार से बचे लेकिन व्यवहार में उल्टा होता है जिसके पास कार बंगला है वह अहंकारी होता है। इंसान दिखावे में यकीन रखता है। ऐसे में अगर बचपन को याद करें तो हमें सादगी का एक वह सपाट मैदान दिखाई देता है जहां ऊंच-नीच और नफरत की कोई दीवार दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती है। जीवन की बुनियाद बचपन ही है, लेकिन भविष्य में पहुंचकर इसी बचपन में सीखी हुई तमाम बातों को हम भुला देते हैं।

बचपन में एक कहानी पढ़ी थी कि किस प्रकार एक खरगोश और कछुए में दौड़ की प्रतिस्पर्धा हुई और अपने अभिमान की वजह से खरगोश ने कछुए को निश्चित गंतव्य पर पहले पहुंचने की चुनौती दी। उसका अतिआत्मविश्वास और अभिमान उसे ले डूबा तथा कछुआ निरंतर धीरे-धीरे चलता रहा और मंजिल पर पहुंच गया और विजेता रहा।

बचपन में पढ़ा था माता-पिता और बुजुर्गों की इज्जत करनी चाहिए। बचपन में पढ़ लिया और ऐसा कर भी लिया परंतु आज बड़े हो जाने पर बड़े बुजुर्गों और मां-बाप को नकार देते हैं इस तथ्य को जीवन में उतारने का काम कौन करेगा सवाल यह है