जानिए हिन्दू शास्त्रों में कितने प्रकार के होते हैं विवाह


Marriage

कहा जाता है शादी जैसे पवित्र रिश्ते के बाद हर लड़की अपने आप को ज्यादा सुरक्षित महसूस करने लगती है। शादी कहने को तो बहुत छोटा सा शब्द है लेकिन इसका महत्व लोगों की जिंदगी में बहुत ज्यादा है। माना जाता है जब एक लड़का-लड़की इस पवित्र रिश्ते में बंध जाते हैं तो जिंदगी भर एक दूसरे का साथ निभाने का सोच लेते हैं।

Marriage

लेकिन इस रिश्ते में एक जरूरी बात यह भी है कि दोनों को ही एक दूसरे पर विश्वास होना चाहिए। इससे रिश्ते में कभी दरार नहीं आती है और रिश्ता मजबूत होता है। लेकिन रिश्ते में कहीं भी छूठ पकड़ा जाए तो रिश्ते में सब कुछ ही खत्म हो जाता है। लेकिन यह अक्सर देखा जाता है कि समय के साथ रिश्तों की चमक भी कम हो जाती है जिसके कारण आपके साथी का व्यवहार आपके लिए खराब हो जाता है ऐसे साथी के साथ जीवन व्यतीत करना बहुत कठिन हो सकता है।

Marriage

हिन्दू शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाह का वर्णन है। बता दें कि यह आठों प्रकार के विवाह का जो फल भी मिलता है वह भी अलग- अलग ही है। इसमें यह भी बताया गया है कि किस व्यक्ति को किस तरह से विवाह करना चाहिए।

Brahma Marriage

1) ब्राह्म विवाह :- जिस विवाह में वेद संपन्न वर को बुलाकर वर और वधु दोनों को वस्त्र और आभूषण देकर सत्कार करके विवाह कराया जाता है उसे ब्राह्म विवाह कहते है। ब्राह्म विवाह का फल यह की उस विवाह से उत्पन्न होने वाली संतान अपने पूर्व के दस पूर्वज और अपने बाद के दस वंशज और और स्वयं को यानी कि कुल इक्कीस को पापमुक्त करता है।

daiv vivaah

2) दैव विवाह :- जिस विवाह में विधि पूर्वक यज्ञ करके ऋत्विज कर्म करने वालों को अलंकार से युक्त दान करके कन्यादान किया जाए वह होता है दैव विवाह। दैव विवाह से उत्पन्न होने वाली संतान आगे के सात और पीछे की सात पीढीयों को पापमुक्त करता है।

Eye marriage

3) आर्ष विवाह :- जिस विवाह में धर्म पूर्वक वर पक्ष की तरफ से एक या दो गाय का दान लिया जाता है और विधि पूर्वक कन्यादान होता है वह होता है आर्ष विवाह। आर्ष विवाह से उत्पन्न पुत्र अगली और पिछली तीन पीढ़ियों को पापमुक्त करता है।

Pagan weddings

4) प्रजापत्य विवाह :- जिस विवाह में यह कहकर कन्यादान होता है की अब तुम दोनों साथ रहकर धर्म का आचारण करो, उस विवाह को प्रजापत्य विवाह कहते है। प्रजापत्य विवाह से उत्पन्न पुत्र अपनी अगली और पिछली छ पीढीयों को पापमुक्त करता है।

Asur Marriage

5) असुर विवाह :- कन्या पक्ष से मनस्वी तरीके से द्रव्य लेना यानी कि दहेज़ लेकर जो विवाह होता है वह असुर विवाह कहा जाता है। इस विवाह से उत्त्पन पुत्र असत्य का आचरण करने वाले होते है।

Gandharva marriage

6) गांधर्व विवाह :- जब स्त्री और पुरुष एक दुसरे की सहमती से सहवास करते है तो उसे गांधर्व विवाह कहा जाता है। ऐसे विवाह से जीवन में दुःख ही उत्पन्न होता है। इस तरह के विवाह को आज के समय में लिव इन रिलेशनशिप कहते है। इस विवाह में ना कोई विधि होती है और ना ही कोई यज्ञ होता है।

Monster marriage

7) राक्षस विवाह :- जिस विवाह में बल पूर्वक कन्यापक्ष के लोगों के साथ मारपीट करके कन्या का अपरहरण करके कन्या की इच्छा के विरुद्ध विवाह होता है उसे राक्षस विवाह कहते है। राक्षस विवाह से उत्पन्न संतान क्रूर और घातकी होती है।

Vampire marriage

8) पिशाच विवाह :- जब कोई लड़की को कोई कैफ़ी पदार्थ पिलाकर बेहोश करके उसके साथ संबंध बनाए जाए तो उसे पिशाच विवाह कहते है। इस प्रकार का विवाह सबसे अधम माना गया है।