कोवलम बीच लें नैसर्गिक सौंदर्यता का आनंद

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दुनिया के सुंदरतम समुद्र तटों में से एक कोवलम केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम या तिरूवंनतपुरम से करीब चौदह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कोवलम सागर-तट दर्शनीय होने के साथ ही हर आगंतुक के लिए अपने अनुपम नैसर्गिक सौंदर्य के द्वार खोलता है। राजधानी से कोवलम तक आसानी से बस, टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। इस सड़क के दोनों ओर बाग बगीचे फैले हैं, जिनमें काजू, केले, नारियल और रबड़ के हरे-भरे अनेक पेड़-पौधे दिखाई पड़ते हैं।

झुरमुटों के बीच से होकर अचानक सागर तट पर पहुंचते ही कोई भी व्यक्ति खुले आसमान के नीचे दूर तक अरब सागर के विशाल पारावार को देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है। कोवलम सागर तट पर थल भाग से समुद्र की ओर दो छोटी-छोटी पहाडिय़ां निकली हैं। इन्हीं के बीच अर्ध चंद्राकार रूप में कोवलम का मनोहर सागर तट फैला हुआ है। दोनों ओर पहाड़ी ढालों से सागर जल तक नारियल के अनेक छोटे-बड़े वृक्ष हैं। सागर-लहरों के साथ पचास से दो सौ मीटर की चौड़ाई से सुनहली चमकती रेत फैली है।

सुखद और मनोहर कोवलम सागर तट की यह विशेषता है कि अप्रैल-मई की तेज गर्मी के अलावा साल के शेष महीनों में मौसम अच्छा और हवादार बना रहता है। दूसरी बात यह है कि सागर तट पर दूर तक फैली बालू की राशि में मिट्टी या धूल नहीं है। फलस्वरूप नीला सागर जल निर्मल और फेनिल है, जिसमें सैलानी सागर स्नान के द्वारा मनमोहक आनंद प्राप्त करते हैं। पाश्चात्य दृष्टिकोण से किसी सागर तट की महत्ता वहां के खुले मौसम तथा धूप भरे दिनों की आंकी जाती है। इस रूप में भी कोवलम श्रेष्ठ सागर तट माना जाता है और वहां सुबह-दोपहर अनेक विदेशी पर्यटक धूप स्नान करते नजर आते हैं। सूर्योदय के कुछ देर बाद तटीय क्षेत्र में चहल-पहल तेज होती जाती है।

इसके साथ ही मछुआरे तथा नारियल पानी वाले भी अपना काम आरंभ करते हैं। यहां के मछुआरे भी निराले हैं, छोटी-सी नाव लेकर वे सागर की उत्ताल तरंगों पर निडर होकर कलाबाजी करते हुए मछलियां पकडऩे के लिए जाल फैंकते हैं। सागर किनारे रेत पर श्यामा तल्पंगह मत्स्यकन्याएं मधुर-मुस्कान के साथ आशा भरी निगाहों से उन्हें निहारती हैं। दूसरी ओर विदेशी पर्यटकों का झुंड अपने कैमरों को संभाले सारे दृश्यों को भर लेना चाहते हैं। साथ ही यहां पर सीपी, कौडिय़ों और नारियल सामग्री में बने हस्तशिल्प को खरीदने में भी बड़े आनंद का अनुभव करते हैं। कोवलम तट पर सूर्यास्त का दृश्य अनूठा है, जिसके लिए कहा जा सकता है कि ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश अस्ताचल की ओर जाते हुए सूर्यास्त के साथ ही विशाल जल राशि में रंग-बिरंगे परिवर्तन आरंभ हो जाते हैं।

पहले सुनहला पीला, फिर नारंगी और तब ताम्रवर्ण सूर्यमंडल के साथ गगनांगन सिंदूरी हो जाता है। डूबते हुए सूरज का मुखमंडल सागर-जल पर प्रतिबिंबित होता है। सिमटती किरणों से सहसा सागर तल पर दूर तक स्वर्ण-पथ दिखाई पड़ता है। फिर धीरे-धीरे सूर्य का ताम्रबिंब क्षितिज के निकट होता जाता है, जहां सूदूर सागर और आकाश के मिलन की रेखा नजर आती है। लगता है पूरे दिन की तेजी से थका हुआ सूरज क्षितिज रेखा पर विश्राम हेतु एक क्षण को रुका फिर सहसा ओझल हो गया। शाम ढलते ही दूर तक फैले हुए अंधेरे के साथ सागर लहरों का शोर आसानी से सुना जा सकता है।

वहीं दूर पहाड़ी के ऊंचे स्थान पर स्थित एक दीप स्तंभ (लाइट हाउस) से हर मिनट फैंकी गई प्रकाश रेखा सैलानियों का आकर्षित करती है तो दूसरी तरफ सागर तट पर दुकानदार मोमबत्ती और लालटेन की रोशनी में ग्राहकों को जुटाने का प्रयास करते हैं।

कोवलम सागर तट पर बायीं ओर पहाड़ी ढाल पर होटल कोवलम सागर अशोक बनाया गया है। यह भी अपने ढंग का एक अनूठा स्थान है। पहाड़ी ढाल पर नारियल की झुरमटों के बीच सोपान काटकर सुखद कमरे बनाये गए हैं, जिनमें खिड़कियों से सदैव सागर का दृश्य दिखाई पड़ता है और दिन में धूप भी आती है। इसके नीचे सागर तट की रेत पर योगाभ्यास केन्द्र बनाया गया है और बगल में स्वच्छ जल का छोटा-सा तरण ताल भी है, जो देशी-विदेशी पर्यटकों को अधिक आकर्षित करता है।

कोवलम सागर तट की दायीं ओर का भाग हवा बीच या जनता बीच कहलाता है। यहां पर होटल-रेस्तरां और अनेक प्रकार की छोटी-छोटी दुकानें हैं, जहां हर तरह के सामान मिल जायेंगे। शाम से लेकर देर रात तक यहां लोगों की चहल-पहल बनी रहती है। सागर के समान ही केरल के कोवलम का उन्मुक्त वातावरण इस की एक अपनी विशेषता है।

(उर्वशी)

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