तीन लोक से न्यारी काशी

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काशी भारत के प्राचीनतम शहरों में एक है। पुराणों में इसका विषद वर्णन मिलता है। यह शंकर भगवान के त्रिशूल पर बनी हुई और उनकी राजधानी मानी जाती है। तभी तो यह तीनों लोक से न्यारी कही गई है। पतित पावनी भागीरथी गंगा के तट पर धनुषाकारी बसी हुई यह काशी नगरी वास्तव में पाप-नाशिनी है। इस नगरी को बनारस भी कहते हैं। वरूणा एवं अस्सी के बीच स्थित होने के कारण इसका नाम किसी समय वाराणसी पड़ा था जो बिगड़ते-बिगड़ते बनारस हो गया। सरकार ने पुन: इसका नाम वाराणसी रख दिया है।

कुछ विद्वानों का यह भी कहना है बनार नाम के किसी राजा ने एक समय इसे बसाया था। धार्मिक दृष्टि से इसका महत्व बहुत ज्यादा है। भगवान शंकर को यह गद्दी अत्यंत प्रिय है, इसलिए उन्होंने इसे अपनी राजधानी एवं अपना नाम काशीनाथ रखा है। मां गंगा, काशी की धरती पर लौट कर धन्य हुई हैं। सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र बिकने हेतु और कहीं न जाकर काशी में आए। भगवान बुद्ध ने ज्ञान का प्रथम उपदेश भी यहीं दिया था। संत कबीर ने यहीं जुलाहागिरी करते हुए हिन्दू-मुसलमान दोनों को फटकारा। तुलसीदास जी ने यहीं बैठकर रामचरित मानस की रचना की। शंकराचार्य को आचार्य की उपाधि भी यहीं मिली।Kashi-Vishwanath-Temple-1

स्वामी दयानन्द ने यहीं से आर्य धर्म की विजय वैजयन्ती फहराई थी। वाराणसी में कई देशभक्त पैदा हुए तो कुछ पढ़े-लिखे भी यहीं। लेखक भी यहीं से आगे पढ़े थे। काशी की जितनी भी महिमा गायी जाए, वह थोड़ी है। काशी प्राचीनकाल से शिक्षा का केंद्र रही है। यहां के प्रत्येक पंडित का घर पाठशाला के बराबर है। यहां पहले गली-गली में संस्कृत पाठशालाएं थीं जहां नि:शुल्क शिक्षा दी जाती थी। इसी संस्कृत शिक्षा की परम्परा बनाए रखने के लिए अंग्रेजी सरकार ने संस्कृति महाविद्यालय की स्थापना की जिसे अब भारत सरकार ने संस्कृत विश्वविद्यालय का रूप दिया है। काशी की एक यह भी बड़ी विशेषता है कि यहां सब धर्मों एवं प्रांतों के लोग रहते हैं।

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पंजाबी, बंगाली, नेपाली, तिब्बती, गुजराती, मद्रासी, मारवाड़ी आदि इन भिन्न-भिन्न लोगों के अपने स्वतंत्र मुहल्ले होते हैं। व्यवसाय की दृष्टि से काशी का महत्व कुछ कम नहीं है। यह एक प्राचीन व्यावसायिक नगर है एवं आज भी बनारसी सिल्क तथा साड़ी, लंगड़ा आम, पीतल के बर्तन, लकड़ी के खिलौने जर्दो, सुर्ती आदि के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। तीर्थ स्थान होने के साथ-साथ यह सुन्दर दर्शनीय स्थान भी है। गंगा के किनारे धनुषाकार बने हुए काशी के पक्के घाट और उन पर बनी हुई विभिन्न राजाओं की हवेलियां दर्शकों को मोह लेती हैं। राजघाट पुल से इस नगर की शोभा देखने योग्य ही बनती है। रात में ऐसा लगता है कि मानो शहर में प्रति दिन दीपावली का त्यौहार हो।

काशी के ये घाट सूर्योदय से लेकर रात्रि तक जनता के विचरण से भरे रहते हैं। शाम को इन घाटों का दृश्य और गंगा की धरती पर छोटी होती नौकाओं का विहार मन को मोह लेने वाला होता है। काशी विश्वनाथ तथा अन्नपूर्णा का मंदिर, भारत माता का मंदिर, मान मंदिर का यंत्रगृह, सारनाथ, माधव राव का धरहरा, संस्कृत विश्वविद्यालय की इमारतें, काशी हिन्दू नागरी प्रचारणी सभा, दुर्गा मंदिर, मानव मंदिर तथा संकटमोचन का मंदिर आदि यहां अनेक दर्शनीय स्थल हैं जिन्हें देखने देश-विदेश से प्रतिदिन श्रद्धालु यात्री आया करते हैं।

इन सबके अतिरिक्त काशी की प्रधान विशेषता यहां की संकरी गलियां हैं। गलियों में बनी हुई ऊंची पथरीली हवेलियां, इन गलियों में स्वछंद भाव से टहल रहे सांड, गायें, कदम-कदम पर मठ, मंदिर एवं शिवाले, प्रतिक्षण शंख घडिय़ाल का स्वर, आरती, भजन पूजन आदि यहां के अन्य आकर्षण हैं। काशी के कंकड़-कंकड़ शिव शंकर के समान माने जाते हैं।

( अरविन्द कुमार द्विवेदी)

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