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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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पुलिसवाले ने भीख मांगने वाले बच्‍चों के लिए खोला स्‍कूल, 450 बच्‍चे पढ़ते हैं

हमारी एक छोटी सी कोशिश कभी शायद किसी के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती है। राह चलते हुए आप और हम सभी कभी न कभी कुछ ऐसा देख लेते हैं जिसके बाद हम काफी ज्यादा उदास हो जाते हैं। लेकिन हममें से बहुत ही कम ऐसे लोग होते हैं जो ऐसी स्थिातियों को बदलने का प्रयास भी करते हैं और यही वो लोग हैं जो सही मायने में हीरो कहलाते हैं। एक ऐसा ही महान शख्स जिसका नाम धर्मवीर जाखड़ है। साल 2016 मं राजस्थान के चुरू में एक सिपाही के तौर पर तैनात पुलिसकर्मी जाखड़ ने बेघर बच्चों के लिए स्कूल की शुरूआत की। आज उनकी इस पाठशाला में 450 बच्चे पढ़ते हैं।

सड़क पर बच्चों को देख बदल गई सोच

इस सिपाही ने चुरू जिला मुख्यालय में महिला पुलिस स्टेशन के पास इस स्कूल को बनवाया। धर्मवीर जाखड़ ने बताया कि यह पहल इस वजह से की गई है कि ताकि सड़क पर भीख मांगने वाले बच्चों के हाथ में कटोरे की जगह पेंसिल और किताब आए। बच्चे पढ़-लिखकर राष्ट्र के निर्माण में सहायक बन सके। जाखड़ ने आगे बताया कि मैं पुलिस स्टेशन के आसपास बहुत से बच्चों को भीख मांगते हुए देखता था। पूछने पर पता चला कि वो अनाथ है। मैं पूरा सच पता लगाने के लिए उन झुग्गियों में भी गया जहां वो रहते थे। 

पहले तो जाखड़ बच्चों को खुद से 1 घंटे पढ़ाने लगे। फिर उनकी इसी पहले ने धीरे-धीरे एक स्कूल का रूप ले लिया। महिला कांस्टेबल और दूसरे समाजसेवी इसमें उनकी सहायता करते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने स्कूल में पढ़ रहे तकरीबन 200 बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला करवाया गया। इनमें से 90 बच्चे 6ठी से 8वीं क्लास में पढ़ते हैं। 

स्कूल के पास अपना एक वैन है जो बच्चों को झुग्गी से स्कूल लेकर आता है। इसके अलावा बच्चों को स्कूल ड्रेस ,जूते,खाना और किताबें भी दी जाती हैं। यह सभी चीजें बच्चों को मुफ्त में दी जाती है। जाखड़ ने बताया कि बच्चों को स्कूल लाना सबसे ज्यादा मुश्किल काम था। क्योंकि वो भीख मांगते थे और इसके पीछे उन बच्चों की मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही थीं। ऐसे में कोशिश यही थी कि सबसे पहले इन बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था की जाए। 

कुछ बच्चों को है छूट

जाखड़ ने आगे बताया कि यूपी और बिहार से कई लोग काम की तालश में यहां आते हैं। हमने उनके बच्चों के लिए भी उन्हें प्रेरित किया है। कुछ बच्चों को कचरा बीनने की छूट दी गई है क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो उनके मां-बा उन्हें स्कूल नहीं भेजेंगे। लेकिन यह काम बच्चें स्कूल आने के बाद करते हैं।

बता दें कि इस स्कूल को चलाने में हर महीने करीब 1.5 लाख रुपए का खर्च आता है। ज्यादातर बार इस पूरी रकम की व्यवस्था लोगों के दान और सोशल मीडिया कैंपेन से पूरी होती है। वैसे जाखड़ की यह भी शिकायत है कि सरकार की ओर से उन्हें कोई सहायता नहीं मिल रही है। 

उन्होंने आगे बताया कि पुलिस समाज और शिक्षा विभाग की मदद से हम बदलाव करने की सारी कोशिशें कर रहे हैं। इन बच्चों के लिए अलग स्कूल और स्टाफ की व्यवस्था करने की जरूरत है। इन पर ध्यान देना जरूरी है अन्यता यह बच्चे कभी भी स्कूल में पैर नहीं रखेंगे।