जहां हम एक और देश की विकास की बात करते है वही शिक्षा के नाम चढ़ता है बड़ा बजट और घटती गुणवत्ता की वजह तलाशें तो शिक्षकों में योग्यता की कमी पहले पायदान पर है। देश में भारी तादात में छात्र गणित, अंग्रेजी जैसे विषय ही नहीं, बल्कि सामान्य पाठ पढ़ने में भी समर्थ नहीं हैं। यहां तक कि 5वीं कक्षा के छात्र पहली कक्षा की किताब भी नहीं पढ़ पाते।

ऐसे में आज एक रिपोर्ट में पाया गया कि यू पी के स्कूलों में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या में भी काफी गिरावट दर्ज की गई हैं । सन् 2012-13 में जहां यह संख्या 3-71 करोड थी वहीं आज  2015-16 में घटकर 3-64 करोड रह गई ।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के मुताबिक 2010-16 के दौरान सरकारी स्कूलों में प्रवेश चाहने वालों की संख्या जहां 18-6 फीसदी गिर गई, वहीं निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूलों में इसमें 36-5 फीसदी की बढोतरी दर्ज की गई।

रिपोर्ट हाल ही में संपन्न विधानसभा सत्र के दौरान सदन में पेश की गयी। इसमें कहा गया कि हर साल औसतन 20 लाख बच्चे स्कूल बीच में ही छोड देते हैं।


कैग ने कहा कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत पर्याप्त धन होने के बावजूद 6-22 लाख बच्चों को 2012-16 के दौरान स्कूल की किताबें नहीं मुहैया कराई गई।


रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सरकारी स्कूलों में 175 लाख शिक्षकों की कमी है जबकि स्वीकृत पद 7-60 लाख हैं। यू पी सरकार ने 2011-12 के दौरान सर्व शिक्षा अभियान के तहत एक ही यूनीफार्म बच्चों को उपलब्ध कराई है जबकि परियोजना के तहत 2 यूनीफार्म स्वीकृत की गई और उसी के मुताबिक धन भी दिया गया। इसमें कहा गया कि धन की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद 97 लाख बच्चों को यूनीफार्म नहीं दी गयी।