भारत में कई सारे दिन शहीद दिवस और सर्वोदय दिवस के रूप में मनाए जाते हैं। इनमें से ही एक दिन हैं 23 मार्च जिस दिन भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरू को फांसी हुई। इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं इस दिन से कुछ खास बातें।

1.’रंग दे बसंती चोला’ गाना गा रहे थे मरने से पहले

ऐसा बोला जाता है कि भगत सिंह करीब दो साल जेल में रहे और दुखी होने की बजाय वह बेहद खुश थे कि उन्हें देश के लिए कुर्बान होने का एक सुनहरा अवसर मिल रहा है। बता दें कि वह फांसी पर जाते समय वह सुखदेव और राजगुरू मेरा रंग दे बसंती चोला गाना गाते हुए जा रहे थे और फांसी पर चढ़ते समय भगत सिंह के चेहरे पर काफी ज्यादा मुस्कुराहट भी थी। शहीद होते समय भगत सिंह और सुखदेव केवल 23 साल के थे वहीं राजगुरू 22 साल के थे।

2.तय दिन से पहले ही हो गयी फांसी

23 मार्च 1931 को भगत सिंह सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरू को लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें 24 मार्च की सुबह फांसी देने की सजा सुनाई गयी थी लेकिन पूरे देश में जनाक्रोश को देखते हुए उन्हें एक दिन पहले ही शाम को चुपके से फांसी दे दी गई थी।

3.लाला लाजपत राय की मौत का बदला

लाला लाजपत राय की भारत में स्वतंत्रता संग्राम लाने की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह साइमन कमिशन के विरोध में शामिल थे जिसमें हुए लाठीचार्ज में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद वह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। वहीं भगत सिंह ने सुखदेव,राजगुरू और चुंद्रशेखर आजाद के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने का प्रण ले लिया था।

4.सांडर्स धोखे में मारा गया

मृत्यु के पूरे 1 महीने बाद लाहौर में 17 दिसंबर 1928 को राजगुरू और भगत सिंह ने एएसपी जॉन पी सांडर्स को गोली मार दी थी। हलांकि उनका निशाना लाठीचार्ज कराने वाला जेम्स ए स्कॉट था लेकिन पहचानने में वह चूक होने पर सांडर्स को मार दिया। भगत सिंह और राजगुरू का पीछा करने वाले एक भारतीय कॉन्सेटबल को आजाद ने गोली मार दी फिर भगत सिंह और उनके साथ कई महीनों तक फरार रहे।

5.भगत सिंह बम फेंकने के बाद नहीं भागे

1929 में बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ने दिल्ली असेंबली में बम फेंका। यह बम किसी की हत्या के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को डराने के लिए था। क्योंकि अंग्रेजी सरकार दो ऐसे बिल ला रही थी जो भारतीयों के हित में नहीं थे और इन्हीं की रोकथाम के लिए ये फैसला लिया गया था। बटुकेश्वर और भगत सिंह वहां से आसानी से भाग सकते थे लेकिन वह वहीं खड़े होकर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए खुद की गिरफ्तारी करा ली।

6.बम के बाद हुई गिरफ्तारी

इस हादसे के बाद और भी क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी गई। राजगुरू को पुणे से गिरफ्त में लिया गया। लाहौर में बम फैक्ट्री पकड़े जाने के बाद सुखदेव की गिरफ्तारी हो गई। सब अलग-अलग आरोपों में गिरफ्तार किए गए लेकिन पुलिस ने सांडर्स की मौत से सभी कडिय़ों को जोड़ते हुए तीनों को फांसी की सजा सुना दी।