अंतरिक्ष यानी कि हमारे पृथ्वी के बाहर का वातावरण जब हम पृथ्वी से आसमान की तरफ देखते हैं तो हमे बहुत से तारे दिखाई देते हैं और इसे ही अंतरिक्ष कहते है। चमकते तारों से भरा आकाश अपने आप में जाने कितने रहस्य समेंटे हुए है। इन रहस्यों की गुत्थी सुलझानें की कोशिश सदियों से की जा रही है। किन्तु, हम आज तक हम आकाश के एक सिरे को भी पूरा नहीं जान पाए हैं। पृथ्वी पर बैठे-बैठे कल्पनाएं करना और फिर उनके हिसाब से अनुमान लगाने के बाद इंसान ने सोचा कि क्यों न आसमान में ही बस जाएं, ताकि वहां बैठकर धरती और आकाश के बीच की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। ऐसा हुआ भी! इंसान ने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन यानी इंटरनेशनल एयरोस्पेस स्टेशन की स्थापना की। इसे 16 देशों के सहयोग से बनाया गया।

आज धरती से भेजा गया कोई भी सेटेलाइट या यान इस स्टेशन की निगरानी में ही है। खास बात यह है कि स्टेशन केवल मशीनों से नहीं चल रहा है, बल्कि यहां वैज्ञानिक भी रह रहे हैं। कल्पना करके देखिए कि कितना रोचक होगा उनका काम, जो वे सुदूर आकाश में बैठकर करते हैं। जो तारे हमें दूर दिखते हैं, वे उनके बीच में होते हैं। हालांकि, इस काम के अपने जोखिम भी है! तो आईए आपको अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की कुछ गतिविधियों से रु-ब-रू करवाते हैं।

फुटबॉल मैदान से बड़ा स्पेस स्टेशन
अंतरिक्ष के अध्ययन और पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों पर जीवन की तलाश ने वैज्ञानिकों को कई तरह के प्रयोग करने पर मजबूर किया है। हर देश का वैज्ञानिक चाहता है कि वह अंतरिक्ष के रहस्यों को सुलझाए और अपने देश को प्रोद्योगिकी की बेहतर सुविधाएं दे सके। इस प्रयास को हर देश अलग-अलग तरीके से करता, इसके बजाए 16 देशों ने सामूहिक प्रयास कर कृत्रिम उपग्रह तैयार किया गया। आगे इसे प्रोटॉन रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। इसे रूस के वैज्ञानिकों ने बनाया था, जिसे कजाकिस्तान से 20 नवंबर 1998 को लांच किया गया था। सीधे शब्दों में कहा जाए तो यह अंतरिक्ष में मानव निर्मित ऐसा स्टेशन है, जो अंतरिक्ष में यान या उपग्रहों की मदद के लिए तैयार रहता है। कोई भी अंतरिक्ष यान यहां जाकर वैज्ञानिकों से संपर्क कर सकता है। स्‍पेस स्‍टेशन 357 फीट में बना हुआ है, जो एक फुटबॉल के मैदान से भी बड़ा है। इसका वजन 420,000 किलोग्राम है। यह 320 कारों के वजन के बराबर है। इस स्‍टेशन को बनाने में लगभग 120 बिलियन डॉलर लगे हैं। इतनी रकम 11 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा है जिससे 150 से ज्यादा ताजमहल बनाए जा सकते हैं।

200 से ज्यादा वैज्ञानिकों का रहा घर!
पूरे स्टेशन में सिर्फ दो बाथरूम बनाए गए। अंतरिक्ष यात्रियों और प्रयोगशाला के जानवरों का यूरिन फिल्टर होकर फिर से स्टेशन के ड्रिकिंग वॉटर सप्लाई में चला जाता है, जिससे अंतरिक्ष यात्रियों को कभी पानी की कमी ना झेलनी पड़े। इस स्टेशन के इलेक्ट्रिक सिस्टम में 8 मील लंबे तार लगे हैं जो न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क की परिधि से भी ज्यादा लंबे हैं।

ऑर्बिट पर स्‍पेस स्‍टेशन पांच मील प्रति सेकेंड की रफ्तार से दौड़ता है। इसका मतलब है कि यह स्टेशन हर 90 मिनट में ग्रह का एक चक्कर लगा लेता है। इसमें एक समय में 6 वैज्ञानिकों के रहने की व्यवस्था है। यह पृथ्वी की कक्षा में 330 से 435 किलोमीटर की ऊंचाई पर रहता है। इतनी कम ऊंचाई की वजह से यह कई बार नग्न आँखों से भी दिखाई पड़ जाता है। पहले इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को साल 2011 तक अंतरिक्ष में रखने की बात तय हुई थी लेकिन फिर इस सीमा मो 2020 तक कर दिया गया है। यहां अब 15 देशों के 200 से ज्यादा वैज्ञानिक जाकर रह चुके हैं। यहां जिस स्टेशन की बात हो रही है वह आज का है, जबकि इसकी नींव तो सालों पहले रखी जा चुकी थी।

ऐसा था पहला अंतरिक्ष स्टेशन ‘मीर’
अंतरिक्ष हमेशा से ही वैज्ञानिकों के लिए रहयस्यमी बना हुआ था। ऐसे में वैज्ञानिकों ने पहली बार अंतरिक्ष में ऐसी प्रयोग शाला बनाने की कल्पना की, जो अंतरिक्ष के रहस्यों को तो उजागर करे ही, साथ ही पृथ्वी तक भी जरूरी सूचनाएं भिजवा सके। इसके बाद रूस के वैज्ञानिकों ने पहला अंतरिक्ष स्टेशन 20 फरवरी 1986 को अंतरिक्ष में स्थापित किया। जिसका नाम था मीर। यह पृथ्वी से 225 मील की दूरी पर पृथ्वी का चक्कर लगाता था। साथ ही पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने की इसकी गति थी 17500 मील प्रति घंटा थी। इसका संपर्क मास्को स्थित नियंत्रण कक्ष से रहा। मीर अंतरिक्ष स्टेशन का निर्माण अंतरिक्ष में एक बार में नहीं, बल्कि अलग-अलग माड्यूल जोड़कर हुआ था। अंतरिक्ष स्टेशन का पहला अवयव 1986 फरवरी में स्थापित किया गया। जिसका वजन 20 टन था। 31 मार्च 1987 को क्वांट-1 माड्यूल अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया और इसके बाद 9 अप्रैल, 1987 को स्थापित किया गया। इसमें एक प्रयोगशाला, ट्रांसफर चैंबर और दाबरहित कंपार्टमेंट बनाए गए।

रेल की तरह होता है डिजाइन!
26 नवंबर 1989 को क्वांट-2 माड्यूल प्रक्षेपित हुआ। इस माड्यूल से वैज्ञानिक हार्डवेयर और उपकरण का इस्तेमाल कर सकते थे। 10 जून 1990 को क्रिस्टल माड्यूल मीर से जाकर जुड़ा। 1 जून 1995 को स्पेक्टर माड्यूल, 15 नवंबर 1995 को डाकिंग माड्यूल और 26 अप्रैल 1996 को आखिरी माड्यूल-प्रिरोदा माड्यूल मीर से जुड़ा। मीर का कुल भार 130 टन था, जिसमें टी-आकार में व्यवस्थित इसके छह माड्यूल शामिल थे तथा इसकी लंबाई 85 फुट और चौड़ाई 98 फुट थी। इसका डिजाइन रेल की तरह था। जिसमें तीन अंतरिक्ष यात्री रहते थे. अमेरिकी स्पेस शटल और अंतरिक्ष स्टेशन मीर पहली बार फरवरी 1995 में सबसे ज्यादा नजदीक आए थे। मीर अंतरिक्ष स्टेशन में लगभग 30 हज़ार प्रकार के वैज्ञानिक परीक्षण हुए। इन प्रयोगों में करीब 7000 प्रयोग केवल चिकित्सा क्षेत्र के थे।

ऑस्ट्रोफिजिक्स के क्षेत्र में 5900 और बायो-तकनीकी के क्षेत्र में 125 प्रयोग किए गए। साथ ही मीर की मदद से 12 देशों के सहयोग से लगभग 27 अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष मिशन संपादित किया गए। यूं तो मीर अंतरिक्ष स्टेशन में अनेक अंतरिक्ष यात्रियों ने काफी समय गुजारा है पर पहली बार ल्योनिड किजिम और ब्लैडिमिर सोलोविए वहां पहुंचे थे। इसके बाद 1987 में यूरी रोमैन्को ने मीर स्टेशन में 326 दिन गुज़ारे थे। 1988 में ब्लैडिमिर टिटोव और मूसा मनारोव 365 दिन स्टेशन पर रहे। 1995 में वैलेरी पालिकोव 438 दिन बिताकर एक विश्व रिकार्ड स्थापित किया। स्पेस स्टेशन में समय गुजारने वाली महिला अंतरिक्ष यात्रियों की संख्या भी कम नही है। 1995 में एलेना कोंडाकोवा ने मीर स्टेशन में 169 दिन, अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री शैनन ल्युसिड 188 दिन, जर्मनी की थामस रीटर 179 दिन मीर में गुजारे हैं। 1988 में फ्रांस के अंतरिक्ष यात्री जीन लूप चेर्टियन वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने स्पेस वॉक की।

जब हुआ अंतरिक्ष में ‘एक्सीडेंट’
जून 1997 में मीर अंतरिक्ष स्टेशन और मालवाहक प्रोग्रेस यान के बीच अंतरिक्ष में जोरदार टकराव हुआ और इससे मीर को काफी क्षति पहुंची। इसके एक मोड्यूल की ऑक्सीजन अंतरिक्ष में रिसने लगी। जिसकी मरम्मत की गई। जुलाई 2000 में मीर अंतरिक्ष स्टेशन को नीदरलैंड की एक कंपनी मीर कार्प्स ने लीज पर लिया और स्टेशन को बेहतर रूप से चलाने की काफी कोशिश की। पर इसके अंतरिक सिस्टम में परेशानी आती रही। रूसी अंतरिक्ष अधिकारियों ने तय किया कि इसे पृथ्वी में समुद्र में गिरा दिया जाए। इसके लिए जनवरी 2001 में एक प्रोग्रेस अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष स्टेशन मीर के लिए छो़ड़ा गया, जो अंतरिक्ष में जाकर मीर अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़ गया।

प्रोग्रेस अंतरिक्ष यान एक प्रकार का मानवरहित अंतरिक्ष यान था, जिससे विभिन्न प्रकार की सामग्री, उपकरण, खाद्य सामग्री, डाक इत्यादि भेजी गई। योजना के अनुसार अंतरिक्ष स्टेशन के कंप्यूटर और इंजनों को अंतरिक्ष केंद्र (मास्को के समीप) पृथ्वी पर गिराया जाना था। 23 मार्च 2001 को मीर अंतरिक्ष स्टेशन हिंद महासागर के ऊपर भूमध्य रेखा से ठीक नीचे था। तक इस पर पहली फायरिंग की गई। जब यह पूर्वी अफरीका के ऊपर पहुंचा तो 24 मिनट तक लगातार फायरिंग की गई। टोंगा के ऊपर पहुंचने पर मीर पर आखिरी इंजन फायर किया गया। हर फायरिंग के साथ मीर की पृथ्वी से दूरी कम होती गई। जब अंतरिक्ष स्टेशन इंडोनेशिया के ऊपर से गुज़रा तो यह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर गया तथा 1500 छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट गया। इसके बाद मीर जलती हुई अवस्था में न्यूजीलैंड में वेलिंग्टन स्थान से 1800 मील की दूरी पर पूर्व में समुद्र में गिरकर जल मग्न हो गया। तब तक मीर अंतरिक्ष स्टेशन ने पृथ्वी की 88000 परिक्रमाएँ कर ली थीं।

फिर बना अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन
जब मीर अंतरिक्ष में अपनी सफल यात्रा कर रहा था, तब धरती पर ऐसे अंतरिक्ष स्टेशन को बनाने की कल्पना कई गई, जिससे पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को मदद मिल सके। इसका पहला विचारअमेरिका के 40वें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन को आया। उन्होंने नासा के वैज्ञानिेकों के साथ मिलकर अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की कल्पना की। नासा को जिम्मेदारी दी गई कि वह 10 साल में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से स्टेशन बनाने का काम पूरा करे। इस पहल से बाकी देशों के वैज्ञानिकों को भी मदद मिल सकती थी। दो साल के बाद जापान, कनाडा और यूरोप इस परियोजना का हिस्सा बने। ​इसके बाद बेल्जियम, ब्राजील, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, नार्वे, स्‍पेन, स्‍वीडन, स्विजरलैंड और यूके भी इसके सदस्य बने। अगली कड़ी में वैज्ञानिकों ने 1998 में स्पेस स्टेशन का डिजाइन तैयार किया।

20 नवंबर 1998 को प्रोटॉन रॉकेट की सहायता से इसे अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया गया। यह संरचनात्मक रूप से मीर से काफी मिलता जुलता था। नए मॉड्यूल की डॉकिंग 26 जुलाई 2000 को की गई। जिसके बाद स्पेस स्टेशन में वैज्ञानिकों का रहना संभव हो सका। 2 नवंबर 2000 को सोयुज टीएम-31 के जरिए अभियान के कमांडर वी.शेफर्ड, पायलट गिडज़ें को, उड़ान इंजीनियर एस क्रिकेलेव स्पेस स्टेशन पहुंचे। दूसरे अभियान के तहत यूरी उसाचेव, जेम्स वोस और सुसान हेल्म्स अगले साल मार्च में स्पेस स्टेशन पहुंचे। स्पेस स्टेशन की मदद से अंतरिक्ष यानों की मरम्मत और उपग्रहों की प्रणाली पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा वायुमंडलीय घटनाओं का अध्ययन कर पृथ्वी की निगरानी होती है। चिकित्सा अनुसंधान, नई दवाओं के निर्माण पर भी काम किया जा रहा है। अंतरिक्ष में जो भी कुछ है वह ब्लैक होल से बना है, पर केवल अंतरिक्ष स्टेशन ही है जो मानव की देन है। सोचिए जब मानव अपने केवल 10 प्रतिशत दिमाग का इस्तेमाल करके अंतरिक्ष में अपना घर बना सकता है, तो भविष्य में क्या कुछ संभव नहीं है!

अधिक जानकारियों के लिए यहां क्लिक करें।