शिवपुरी: देश की आजादी के लिए लडऩे वाले महान देशभक्तों की कर्मस्थली रहे मध्यप्रदेश के शिवपुरी क्षेत्र के लोग अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद एवं तत्कालीन राज्य खनियाधाना के राजा खलक ङ्क्षसह की देशभक्ति एवं दोस्ती की दास्तां आज भी सुनाते हैं और उनको याद कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार परशुराम शुक्ला बिरही के अनुसार चंद्रशेखर आजाद ने अपना अज्ञातवास खनियाधाना राज्य में व्यतीत किया था। उस समय के राजा खलक ङ्क्षसह ने उनको अपना मित्र बनाया और आजादी के आंदोलन के लिए उनकी हरसंभव मदद की।

खनियाधाना के जंगलों में आजाद ने अभ्यास करके अपनी निशानेबाजी को और निखारा। जब अंग्रेजों को पता चला कि खलक ङ्क्षसह ने आजाद को अपने राज्य में रखा है और उनकी मदद कर रहे हैं तो अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक उन्हें राजगद्दी से उतार दिया और उनको एक निश्चित पेंशन देने लगे।

इसके बाद भी उन्होंने देश की आजादी के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी और अपनी पेंशन में से भी स्वतंत्रता सेनानियों की मदद करते रहे। खलक ङ्क्षसह ने अपना राज्य गंवा दिया लेकिन आजाद पर अपने रहते हुए कोई आंच नहीं आने दी। यहां के बुजुर्ग इसी बात को याद करके राजा खलक ङ्क्षसह की देशभक्ति और आजाद के साथ उनकी दोस्ती को कभी भुला नहीं पाते। आज भी 15 अगस्त एवं 26 जनवरी के राष्ट्रीय पर्वों पर यहां के लोग खनियाधाना में चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा पर जाकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं और खलक ङ्क्षसह के साथ उनकी दोस्ती को याद करते हैं।

शिवपुरी जिले से चंद्रशेखर आजाद के अलावा तांत्या टोपे का भी नाता रहा है। यह क्षेत्र जहां एक तरफ चंद्रशेखर आजाद एवं खलक ङ्क्षसह की दोस्ती और त्याग के लिए जाना जाता है वहीं दूसरी तरफ इस क्षेत्र के तत्कालीन जंगल से एक विश्वासघाती द्वारा तांत्या टोपे जैसे वीर सेनापति को अंग्रेजों से पकड़वा जाने और उनको शिवपुरी में अंग्रेजों द्वारा फांसी दिए जाने के कारण भी याद किया जाता है।

डॉक्टर शुक्ला ने बताया कि चंद्रशेखर आजाद सनï् 1928 से 1929 के दौरान लगभग छह माह तक झांसी और खनियाधाना में रहे। झांसी में वह रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवान दास माहौर जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में रहे। वह कुछ दिनों नई बस्ती में एक मकान में रहे।

इसी दौरान उन्होंने आजाद की पहचान छुपाने के लिए उनको झांसी में एक मोटर मैकेनिक की दुकान पर रखवा दिया जहां पर वह काम करने लगे। वह गाड़ी भी बहुत अच्छी चलाते थे। एक दिन उस मैकेनिक के यहां झांसी में खनियाधाना के महाराजा खलक ङ्क्षसह अपनी गाड़ी दिखाने पहुंचे और उन्होंने उस मैकेनिक से कहा कि मुझे एक अच्छे वाहन चालक की जरूरत है। उस मैकेनिक ने आजाद को खलक ङ्क्षसह के साथ भेज दिया।

रास्ते में एक जगह खलक ङ्क्षसह जंगली क्षेत्र में लघुशंका करने के लिए रुके, तभी एक सांप को झाडिय़ों से निकलकर उनकी तरफ बढ़ता देखकर आजाद ने अपनी पिस्टल निकाली और सांप को मार दिया।

इस पर खलक ङ्क्षसह ने आजाद से अपना सही परिचय पूछा, तो आजाद ने अपना पूरा परिचय दिया। उसके बाद राजा उनको अपने साथ ले गए और उनकी पूरी मदद की। सनï् 1928 से 1929 के प्रारंभ तक आजाद झांसी और खनियाधाना में रहे। इसके बाद वह इलाहाबाद चले गये जहां तत्कालीन अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने घेर लिया और दोनों तरफ से गोली चलती रही। आखिरी गोली बची होने पर आजाद ने खुद को गोली मारकर 27 फरवरी 1931 शहादत प्राप्त की।

डॉ. शुक्ला ने बताया कि शिवपुरी से लगी तत्कालीन रियासत पाडोन के राजा मानङ्क्षसह ने 15 अप्रैल 1859 को अंग्रेजों से सौदेबाजी करके तांत्या टोपे को सोते समय पकड़वा दिया था। इसके बाद तांत्या टोपे को शिवपुरी लाया गया। मेजर मीड की सैनिक अदालत में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। उनको 18 अप्रैल 1859 को शिवपुरी में अंग्रेजों ने फांसी दे दी। फांसी दिए जाते समय तांत्या टोपे ने फंदा खुद अपने गले में डाला और शहीद हो गए।