रायपुर : छत्तीसगढ़ में पैरी,सोंढूर और महानदी के तट पर स्थित पावन नगरी राजिम में प्रतिवर्ष कुंभ मेला का आयोजन किया जाता है। माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक आयोजित इस भव्य और दिव्य कुंभ में देश भर से लाखों श्रद्धालु यहा पहुँचते है और त्रिवेणी संगम में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित करते है। इस दौरान देश भर से हजारों साधु, संत महामंडलेश्वर, महात्माओं का यहां आना होता हैं, जहा वे अपनी अमृतवाणी की वर्षा कर देश भर से आए श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हैं।

यह आयोजन अपने आप में अनूठा है क्योंकि यह सरकारी आयोजन है। छत्तीसगढ़ प्रदेश के धर्मस्व कृषि एवं सिंचाई मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की पहल पर इस आयोजन के लिए बकायदा कानून बनाया गया। जिसे छत्तीसगढ़ विधानसभा में पास किया गया है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों दलों के विधायकों ने पुरातन काल से इसी तिथि पर चले आ रहे मेला को कुंभ स्वरूप प्रदान करने की आधारशिला रखी है।

इस राजिम कुंभ में द्वारिका पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज, पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज का नियमित रूप से आगमन होता रहा है। कुछ लोगों ने इस आयोजन को कुंभ कहने पर आपत्ति जताई थी जिस पर सरकार ने कुंभ के आगे कल्प शब्द जोड़ दिया। परंतु जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज ने स्वयं इस आपत्ति को खारिज कर दिया।

उन्होंने कहा कि त्रिवेणी संगम की जिस पावन धरा में हज़ारों साधु,संत-महात्माओं द्वारा मानव कल्याण और धर्म की शिक्षा दी जाती है उसे कुंभ कहने पर किसी तरह की आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सनातन धर्म में उन्हें शंकराचार्य की मान्यता मिली है, इस नाते वे इस आयोजन को कुंभ के रूप में प्रमाणित करते है। परंपरानुसार राजिम कुंभ का शुभारंभ माघ पूर्णिमा के दिन भगवान राजीव लोचन की पूजा अर्चना कर विधानसभा अध्यक्ष करते है।

इस आयोजन की एक सबसे अच्छी बात यह है कि कबीर पंथ, सतनाम पंथ सहित सभी पंथ के धर्मगुरु एक मंच पर विराजमान होते हैं। यह दृश्य अपने आप में अद्भुत होता है। जातिवाद की कुरीतिया यहा दिखाई नही पड़ती। यहा सैकड़ों की संख्या में नागा साधु भी पहुंचते हैं। सभी साधु-संतों के लिए अस्थाई आश्रम व कुटिया प्रशासन बनाकर देता है, जहा श्रद्धालुगण अपने गुरुओं के साथ सत्संग करते है।

यहा एक अच्छी बात और है, संत समागम क्षेत्र के मंच पर सभी संत अपने-अपने विचार बारी-बारी से रखते है। श्रद्धालु किसी भी समय संत समागम पहुंचे अमृत रूपी ज्ञान अवश्य ही प्राप्त होता है। कुंभ के अंतिम दिन महाशिवरात्रि पर अंतिम शाही स्नान के लिए हज़ारों साधु संतों की भव्य शोभायात्रा राजिम नगर का भ्रमण करती है। इस शोभा यात्रा की अगुवाई नागा साधु करते हैं,भ्रमण पश्चात वे त्रिवेणी संगम में स्नान कर कुंभ का समापन करते हैं।

इस दिन लगभग 5 लाख श्रद्धालुओं का राजिम पहुंचना होता है। इस राजिम कुंभ को नया स्वरूप प्रदान कर विश्व पटल के समक्ष रखने वाले छत्तीसगढ़ प्रदेश के धर्मस्व,कृषि एवं जल संसाधन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का कहना हैं कि छत्तीसगढ़ की यह धरा पुरा-संपदा से परिपूर्ण है । यहां की धार्मिक ऐतिहासिक मान्यताएं जो है उसे दुनिया के सामने लाने का हमने प्रयास किया है।

यहां पर मैं छत्तीसगढ़ की परंपरा का उल्लेख करना उचित समझता हूं जिसमे मान्यतानुसार मामा अपने भांजे को पैर नहीं छूने देते। इसके पीछे प्रभु राम की कहानी है। हर मामा अपने भांजे को प्रभु राम के स्वरुप में देखता है। यह छत्तीसगढ़ वासियों के आचरण में है। हम ऐसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को उनकी पहचान दुनिया को बताने के उद्देश्य से राज्य के उन स्थानों पर विभिन्न महोत्सवों का आयोजन करते है।

बृजमोहन अग्रवाल कहते है कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इलाहाबाद हरिद्वार जैसे तीर्थ धाम की अपनी महत्ता है। परंतु राज्य की बहुत से गरीब लोग वहा जा सकने में सक्षम नही है। वे लोग अपने कर्मकांड राजिम की त्रिवेणी संगम में ही करते है। राजीम को विश्व पटल पर उभारने के लिए अभिनव प्रयास किए जा रहे हैं। इसी तारतम्य में राजिम कुंभ 2018 में तीन ऐसे आयोजन किए गए जिसने सारी दुनिया का ध्यान इस ओर आकर्षित कराया।

नदी संरक्षण व संवर्धन के लिए राजिम कुंभ के दौरान नदी मैराथन का आयोजन किया गया। जिसमें क्षेत्र के लगभग 12000 लोगों ने हिस्सा लिया। इसी तरह 7 फरवरी को भारतवर्ष की समृद्धि व संतों के अभिनंदन के लिए 361000 दीपों का प्रज्वलन कर विश्व कीर्तिमान रचा गया। पश्चात जानकी जयंती के दिन 21सौ श्रद्धालुओं ने जल संरक्षण संवर्धन और विश्व शांति की नव चेतना जागृत करने के लिए एक साथ शंखनाद कर इतिहास रचा। यह दोनों आयोजनों को गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में स्थान मिल चुका है।
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