नई दिल्ली : पिछले कुछ महीनों मे भारतीय हॉकी ने लगातार कई आघात सहे हैं, जिनमें सबसे बड़ा धक्का अपनी मेजबानी मेें आयोजित विश्व कप में लगा, जिसमें भारत छठे स्थान पर रहा। हमेशा की तरह भारतीय कोच, खिलाड़ियों और टीम प्रबंधन ने बड़े-बड़े दावे किए पर नतीजा हमेशा की तरह रहा। तारीफ़ की बात यह है कि भारतीय हॉकी ने कभी हार नहीं मानी। विश्व कप की पराजय को भुला कर हमारे खिलाड़ी फिर से प्रयास में जुट गये हैं।

लंबी अवधि के बेमतलब प्रशिक्षण शिविरों में झोंक दिए गये हैं और शायद अगली हार तक बहानेबाज़ी मे लगे रहेंगे। भारत ने 1975 के बाद कोई विश्व कप नहीं जीता। जीतना तो दूर फाइनल में भी नहीं पहुंचे। 1980 में आखरी बार आधे-अधूरे ओलंपिक में स्वर्ण जीता था, जिसे दोहराया नहीं जा सका। फिर भी अकड़ यह कि हम हॉकी के बेताज बादशाह हैं। यह हाल तब है जबकि एशियाड, ओलंपिक, विश्व कप और राष्ट्रमंडल का कोई खिताब हमारे पास नहीं है।

वैसे भी पुरुष टीम कभी भी राष्ट्रमंडल खेलों की विजेता नहीं बन पाई
देखते-देखते बेल्जियम और अर्जेंटीना जैसे देश हमसे आगे निकल गये और हम हैं कि ध्यानचन्द, महान बलबीर सिंह, रूप सिंह, अजितपाल, अशोक कुमार जैसे नामों की खा रहे हैं। राष्ट्रमंडल में पुरुष और महिला टीमें चौथे स्थान पर रहीं। दोनों को इंग्लैंड के हाथों हार का सामना करना पड़ा। महिला टीम पर तो आधा दर्जन गोल पड़े।

एशियाड में पुरुष टीम कांसा ही पा सकी। वैसे भी पुरुष टीम कभी भी राष्ट्रमंडल खेलों की विजेता नहीं बन पाई। सभी छह खिताब आस्ट्रेलिया के नाम रहे। भला हो महिला टीम का जिसने 2002 में खिताब जीता परंतु महिला टीम भी अब भरोसे पर खरी नहीं उतर पा रही। ओलंपिक और विश्व कप मे महिलाओं को प्रवेश तक नहीं मिल पाता।

पुरुष खिलाड़ियों ने भले ही पचास साल पहले एतिहासिक प्रदर्शन किए पर टूर्नामेंट दर टूर्नामेंट उनका जादू फीका पड़ता चला गया। फिलहाल भारतीय हॉकी उस मुकाम पर खड़ी है जहां से सुधार और वापसी की संभावना कम ही नज़र आती है। सच तो यह है कि हॉकी अब बंद कमरों और बयानबाज़ी में खेली जा रही है।

 (राजेंद्र सजवान)