नई दिल्ली : शिवाजी स्टेडियम कभी हॉकी का गढ़ कहा जाता था| 1982 के दिल्ली एशियाड के लिए इस स्टेडियम को नये सिरे से सजाया – संवारा गया। एनडीएमसी ने स्टेडियम की सतह पर टर्फ बिछाई जिस पर एशियाड हॉकी के महिला मुक़ाबले आयोजित किए गये। भारत ने पहली बार यहीं पर कोरिया को हरा कर महाद्वीप का सिरमौर होने का गौरव पाया। उधर नेशनल स्टेडियम को एथलेटिक और फुटबॉल से मुक्ति दिला कर हॉकी का जामा पहनाया गया और पुरुष हॉकी के एशियाड मुक़ाबले खेले गये। यहीं पर भारत को पाकिस्तान के हाथों 1-7 की शर्मनाक हार मिली जिसकी गवाह तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बनीं। शिवाजी स्टेडियम को कुछ समय पहले तक भारतीय हॉकी का दिल कहा जाता था।

देश मे कुछ और स्टेडियम बनने के बाद इस स्टेडियम पर अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की निर्भरता कम हुई। हालाँकि नेशनल स्टेडियम पर कई बड़े आयोजन किए गये किंतु यह स्टेडियम कभी भी खिलाड़ियों और हॉकी प्रेमियों को रास नहीं आया। कारण, यह स्टेडियम आम हॉकी प्रेमी की पकड़ से बाहर माना जाता है और अब तो लगभग पूरी तरह फिसल चुका है। नेशनल स्टेडियम को लेकर एक बड़ी समस्या यह है कि इसकी पिच घिस पिट चुकी है और खेलने योग्य नहीं रही। हालाँकि जैसे तैसे नेहरू, शास्त्री और रंजीत सिंह हॉकी के आयोजन यहीं पर किए गये लेकिन आगे की डगर मुश्किल हो गई है।

कारण, इस स्टेडियम पर गृह मंत्रालय ने कब्जा जमा लिया है। सुरक्षा कारणों से खिलाड़ी और खेल प्रेमी स्टेडियम मे दाखिल नहीं हो पाते या आज़ादी से खेल का लुत्फ़ नहीं उठा सकते । पंजाब केसरी ने पहले भी इस समस्या को उठाया था लेकिन फिलहाल गेंद खेल मंत्रालय और गृह मंत्रालय के बीच लटकी हुई है। शिवाजी स्टेडियम को लेकर एक बड़ी समस्या पालिका परिषद और हॉकी इंडिया के बीच विवाद के कारण पैदा हुई बताई जाती है। दोनों के बीच हॉकी इंडिया लीग के चलते लेन -देन का विवाद खड़ा हुआ और ख़ामियाजा दिल्ली के खिलाड़ियों को भुगतना पड़ रहा है। हालत यह है कि दिल्ली की लीग और अन्य गतिविधियाँ ठप्प पड़ी हैं। एक तरफ तो सरकार हॉकी को प्रोत्साहन देने की बात करती है तो दूसरी तरफ सरकारी अड़चनों के चलते दिल्ली की हॉकी बंद पड़ी है | तो फिर खिलाड़ी कहाँ खेलें और अपना दुखड़ा कहाँ सुनाएँ ?

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