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बाबरी मस्जिद से पहले उस जगह राम मंदिर मौजूद था : रामलला

अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय में आज सातवें दिन सुनवाई हुई, जिसमें प्रमुख पक्षकार ‘रामलला विराजमान’ ने विवादित जमीन के नक्शे, नक्काशियों और पुरातात्विक खोजों के आधार पर यह स्थापित करने का प्रयास किया कि विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले राम मंदिर मौजूद था। 

रामलला विराजमान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण तथा न्यायमूर्ति ए अब्दुल नत्रीर की संविधान पीठ के समक्ष विवादित जमीन के नक्शे और फोटो दिखाते हुए दलील दी कि खम्भों में श्रीकृष्ण, शिव तांडव और श्रीराम के बाल रूप की तस्वीर नजर आती है। 

श्री वैद्यनाथन ने दलील दी कि विवादित ढांचे और खुदाई के दौरान मिले पाषाण स्तंभ पर शिव तांडव, हनुमान और अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां मिलीं। उन्होंने कहा कि पक्के निर्माण में जहां तीन गुम्बद बनाये गये थे, वहां बाल रूप में राम की मूर्ति थी। 

उन्होंने मुस्लिम पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड को इंगित करते हुए कहा, ‘‘सिर्फ नमात्र अदा करने से वह जगह आपकी नहीं हो सकती, जब तक वह आपकी संपत्ति न हो। नमाज सड़कों पर भी होती है इसका मतलब यह नहीं कि सड़क आपकी हो गई।’’ श्री वैद्यनाथन ने भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि खुदाई में मिली सामग्रियों से यह पता चलता है कि यहां मंडप और आसपास के खंभे पाये गये थे, जिनपर भगवान के बाल स्वरूप और अन्य तस्वीरों की नक्काशियां की गयी थीं, जो पूरी तरह से इस्लामी प्रथाओं के विपरीत हैं। 

उन्होंने दलील दी कि एएसआई ने जो खुदाई की थी, उसमें कहा गया था कि विवादित स्थल पर एक विशाल भूमिगत संरचना थी, जो इंगित करती है कि वहां एक मंदिर था। 

न्यायमूर्ति बोबडे ने श्री वैद्यनाथन से पूछा कि क्या इन सामग्रियों की कार्बनडेटिंग करायी गयी थी? इस पर उन्होंने ‘हां’ में जवाब दिया और कहा कि उत्खनन से बरामद सभी सामग्रियों की कार्बन डेटिंग करायी गयी थी। 

सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि कार्बनडेटिंग परीक्षण केवल उन्हीं धातुओं पर किया जा सकता है, जिनमें कार्बन होते हैं, लेकिन ईंट और पत्थरों में कार्बन मौजूद नहीं होते, इसलिए उनकी कार्बनडेटिंग नहीं करायी जा सकती। उन्होंने कहा कि मूर्तियों की कार्बनडेटिंग नहीं की जा सकती। इस पर श्री वैद्यनाथन ने तुरंत कहा कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा कि मूर्तियों का कार्बन परीक्षण कराया गया गया था। इसके अलावा और भी सामग्रियां मिली हैं, जिनका परीक्षण कराया गया। 

श्री वैद्यनाथन के अनुसार, पुरातत्विक प्रमाणों से पता चलता है कि विवादित स्थल पर एक विशाल संरचना मौजूद थी जिस पर निर्माण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के रूप में शुरू हुआ था और पूर्वानुभव यह दर्शाता है कि यह एक राम मंदिर था। इस स्थल पर कोई इस्लामिक कलाकृतियां नहीं मिलीं। 

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने फिर रामलला के वकील से पूछा, ‘‘(विवादित स्थल पर) एक कब, भी मिली है, इसकी क्या व्याख्या की जा सकती है।’’ इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि कब, बहुत बाद की है। उन्होंने खंभे और खंभों पर जानवरों और पक्षियों के चित्रों के बारे में भी पीठ को अवगत कराया। 

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि ये पशु पक्षी हैं और इन्हें धर्म से जोड़ने के लिए कुछ भी नहीं है। इस पर श्री वैद्यनाथन ने जवाब दिया कि ये पुरातत्वविदों द्वारा की गई व्याख्याएं हैं। अप्रैल 1950 में विवादित क्षेत्र का निरीक्षण हुआ तो कई पक्के साक्ष्य मिले। जिसमे नक्शे, मूर्तियां, रास्ते और इमारतें शामिल हैं। परिक्रमा मार्ग पर पक्का और कच्चा रास्ता बना था। आसपास साधुओं की कुटियाएं थी। पुरातत्व विभाग की जनवरी 1990 की जांच और रिपोर्ट में भी कई तस्वीरें और उनका साक्ष्य दर्ज है। अब इस मामले की सुनवाई सोमवार 19 अगस्त को जारी रहेगी।