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विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मोड में RLD, उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ 'भाईचारा सम्मेलन'

2022 में होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियों ने तैयारियां शुरू कर दी है। इसी के मद्देनजर पार्टियां अपनी गोटियां बिछा रही है और सत्ता पर काबिज होने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है। इस बीच राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) जयंत चौधरी के नेतृत्व में अपने पहले बड़े राजनीतिक कार्यक्रम में मंगलवार से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 'भाईचारा सम्मेलन' की एक श्रृंखला को आयोजित करेगा।

विधानसभा चुनाव से पहले खुद को फिर से नजर में लाने के लिए रालोद के प्रयासों का एक हिस्सा

जाहिर है कि यह उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले खुद को फिर से नजर में लाने के लिए रालोद के प्रयासों का एक हिस्सा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित दो महीने लंबे कार्यक्रम की शुरूआत मुजफ्फरनगर जिले के खतौली से होगी। रालोद के राष्ट्रीय सचिव अनिल दुबे ने कहा, "कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने के अलावा अगड़ी और पिछड़ी जाति समूहों को एकजुट करना है, जिसकी इस समय तत्काल आवश्यकता है।"

जाति और धार्मिक रेखाओं को धुंधला करना और राज्य में 'मुद्दों पर आधारित' राजनीति को बढ़ावा देना है

उन्होंने कहा कि विचार जाति और धार्मिक रेखाओं को धुंधला करना और राज्य में 'मुद्दों पर आधारित' राजनीति को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा, "हम विभिन्न समुदायों को एक साथ लाने और सभी के लिए समान मुद्दों को उठाने के लिए बैठकें आयोजित करेंगे। राजनीतिक लाभ के लिए निहित स्वार्थों को सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने से रोकने की जरूरत है।" उन्होंने आगे कहा कि "जब भी सामाजिक तनाव होते हैं, तो उन्हें शांत करने में नागरिक समाज की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। किसी भी अवांछित अभिव्यक्ति के होने से पहले उन्हें जड़ से खत्म करने की आवश्यकता होती है।"

2002 के बाद से रालोद की चुनावी किस्मत में लगातार गिरावट आई है

दो दिन पहले, समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चौधरी अजीत सिंह को पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए दिल्ली में जयंत चौधरी के आवास का दौरा किया था, जिन्होंने मई में कोविड -19 के कारण दम तोड़ दिया था। दोनों पार्टियां पहले से ही गठबंधन में हैं और माना जाता है कि उनके नेताओं ने आगामी राज्य विधानसभा चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा का मुकाबला करने के लिए रणनीतियों पर चर्चा की है। 2002 के बाद से रालोद की चुनावी किस्मत में लगातार गिरावट आई है, जब उन्होंने 38 सीटों पर चुनाव लड़ा और 14 सीटों पर 26.82 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करने में सफल रही।

2007 के विधानसभा चुनावों में एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में बसपा के उभरने से रालोद को झटका लगा

2007 के विधानसभा चुनावों में एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में बसपा के उभरने से रालोद को झटका लगा, जो 3.70 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करते हुए 254 सीटों में से केवल 10 पर जीत दर्ज कर सकी। 2012 में सपा के पुनरुत्थान ने रालोद को और प्रभावित किया, जिसने तब कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था। उन्होंने 46 सीटों पर चुनाव लड़ा और 2.33 प्रतिशत वोट शेयर के साथ केवल नौ जीते थे।

2017 के विधानसभा चुनावों में रालोद को अंतत: पूरी तरह से हार का सामना करना पड़ा

2014 के लोकसभा चुनाव में चौधरी अजीत सिंह और जयंत चौधरी क्रमश: बागपत और मथुरा की अपनी सीटों से हार गए थे। 2017 के विधानसभा चुनावों में रालोद को अंतत: पूरी तरह से हार का सामना करना पड़ा क्योंकि राज्य में भाजपा की लहर चल रही थी। पार्टी ने जिन 277 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से सिर्फ एक ही जीत सकी। बागपत की छपरौली विधानसभा सीट से इसके एकमात्र विधायक सहेंदर सिंह रमाला भी 2018 में भाजपा में शामिल हो गए। हालांकि, रालोद अब चल रहे किसान आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी और सपा के साथ गठबंधन के साथ पुनरुद्धार की उम्मीदों को देख रही है।

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