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भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन विरोधी गठबंधन के बाद नई दिल्ली ने यूरोप से मिलाया हाथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए भारत-लग्जमबर्ग द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन में शिरकत की। इस दौरान उन्होंने लग्जमबर्ग के अपने समकक्ष जेवियर बेट्टेल के साथ द्विपक्षीय संबंधों के सभी आयामों पर बातचीत की। 

भारत और लक्जमबर्ग के बीच दो दशकों में पहली बार गुरुवार को शिखर बैठक आयोजित किया गया था। दोनों प्रधानमंत्रियों ने वित्तीय क्षेत्र, डिजिटल डोमेन, ग्रीन फाइनैंसिंग और अंतरिक्ष अनुप्रयोगों में संबंधों को सुधारने का निर्णय लिया। उन्होंने कोविड-19 महामारी से उत्पन्न वैश्विक स्थिति का भी जायजा लिया। 

बमुश्किल एक पखवाड़े पहले विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र से बाहर यूरोप की पहली यात्रा की थी। उन्होंने फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन का एक सप्ताह का दौरा किया था। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंधों के बाद, यह स्पष्ट है कि भारत यूरोप को एक नए रूप में देख रहा है। 

कम्युनिस्ट राष्ट्र चीन की भू-राजनीति विश्व स्तर पर एक आंख खोलने वाली रही है। चीन की विस्तारवादी नीति और चालबाजी से पश्चिम के उदार लोकतांत्रिक देश भी बखूबी वाकिफ हैं। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के साथ भारत के संबंध साझा लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव पर बने हैं। 

यूरोप के लोग भी भारत की पहल पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। यूरोपीय संघ (ईयू) भारत को रणनीतिक चिंताओं और आर्थिक संबंधों के लिए चीन की तुलना में अधिक उपयुक्त विकल्प के रूप में देख रहा है। भारत को पर्याप्त व्यापार संबंध प्राप्त हैं और उसका यूरोपीय संघ के साथ बड़ा निवेश प्रवाह (इनवेस्टमेंट फ्लो) है। इसके अलावा, भारत और कई यूरोपीय देश आम हित के विभिन्न मुद्दों पर बहुपक्षीय प्लेटफार्मों पर निकटता से काम करते हैं। 

श्रृंगला ने अपनी यूरोप यात्रा के दौरान इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के साथ-साथ समुद्री सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर चर्चा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संबंध और रणनीति (डीजीआरआईएस) पर फ्रांस के महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल) एलिस गुइटन के साथ मुलाकात की। फ्रांस भारत को राफेल लड़ाकू विमानों की आपूर्ति कर रहा है और अपनी नवीनतम पनडुब्बियों को डिजाइन करने में भी मदद कर रहा है। दोनों देशों ने आतंकवाद, ग्लोबल वार्मिग, सतत विकास, जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ प्रौद्योगिकी और नवाचार के मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। 

तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के कारण, कई यूरोपीय देशों ने अपने राजनीतिक दृष्टिकोण पर फिर से काम किया है और एशियाई देशों, विशेष रूप से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लोगों के साथ तालमेल के साथ उत्सुकता दिखाई है। 

वहीं जर्मनी ने इस साल सितंबर में भारत-प्रशांत क्षेत्र के लिए अपनी नई नीति दिशानिर्देश जारी किए, जो चीन के अलावा अन्य एशियाई देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने पर जोर देता है। 

जैसे ही जर्मनी चीन केंद्रित नीति से हटता है, उसके भारत के करीब आने की संभावना निश्चित तौर पर बढ़ जाती है। श्रृंगला ने विदेश राज्य मंत्री और थिंक टैंक नील्स एनेन के साथ मुलाकात की। भारत ने जर्मनी को यह याद दिलाने के अवसर को भुनाया कि वह कैसे एक विश्वसनीय और रणनीतिक साझेदार के रूप में भारत-प्रशांत की पूर्व दृष्टि में फिट बैठता है। 

जर्मनी की रक्षा मंत्री एनेग्रेट क्रैम्प-कर्रनबाउर ने हाल ही में कहा है कि उनका देश अगले साल हिंद महासागर व्यापार मार्गो पर गश्त के लिए अपनी नौसेना भेजना चाहेगा। वह ऑस्ट्रेलियाई रणनीतिक नीति संस्थान (एएसपीआई) और कोनराड एडेनॉयर फाउंडेशन (केएएफ) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रही थीं, जहां उन्होंने कहा कि जर्मनी ऑस्ट्रेलिया के साथ निकट रक्षा सहयोग भी करना चाहता है। 

इसके अलावा श्रृंगला ने लंदन में ब्रिटिश सरकार से यूरोपीय देशों के अनुरूप इंडो-पैसिफिक की अपनी रणनीति के साथ आने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी कहा, Òहम चाहेंगे कि ब्रिटेन एक बड़े निवेशक और इनोवेशन पार्टनर के रूप में सामने आए।Ó 

उन्होंने इंडो-पैसिफिक की नई-प्रासंगिक प्रासंगिकता के बारे में भी स्पष्ट रूप से संकेत दिया।