श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना पर ‘‘सांसदों की शक्तियां छीनने’’ का आरोप लगाते हुए संसद के स्पीकर कारु जयसूर्या ने ‘‘जनसेवकों से उनके अवैध आदेशों का पालन नहीं करने’’ का आह्वान किया।
जयसूर्या ने अपने आलोचकों पर भी पलटवार किया जिन्होंने कहा था कि उनके अनपयुक्त आचरण ने ही सिरिसेना को पिछले शुक्रवार को संसद को भंग करने के लिए बाध्य किया।
26 अक्टूबर को सिरिसेना ने करीब साढ़े तीन साल तक तनावपूर्ण संबंध के बाद अचानक रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया था और उनके स्थान पर महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया था। इस कदम के बाद देश संवैधानिक संकट में फंस गया था।
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सिरिसेना ने संसदीय कार्यवाही 16 नवंबर तक के लिए निलंबित कर दी थी। बाद में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव में उन्होंने 14 नवंबर को संसद की बैठक फिर बुलाने के लिए नोटिस जारी किया।
लेकिन शुक्रवार को सिरिसेना ने संसद भंग कर दी और पांच जनवरी को मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की। दरअसल जब यह स्पष्ट हो गया कि प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के लिए सदन में उनके पास पर्याप्त समर्थन नहीं है तब सिरिसेना ने यह कदम उठाया।
जयसूर्या ने एक कठोर बयान में कहा , ‘‘मैं पिछले दो हफ्तों से देख चुका हूं। कार्यपालिका शाखा ने सासंदों के अधिकार जब्त कर लिये हैं, उनकी शक्तियां छीन ली हैं जो लोगों का प्रतिनिधित्व करने के लिए निर्वाचित हुए थे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैं सभी जनसेवकों से किसी भी अवैध आदेश को लागू करने से इनकार करने का आह्वान करता है, इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन उन्हें ये आदेश दे रहा है।’’
सिरिसेना समर्थक सरत अमूनुगामा के बयान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मुझे अफसोस है कि अति सम्मानित नेता कथित विदेश मंत्री ने झूठा आरोप लगाया है कि जब 14 नवंबर को संसद की बैठक होती तब मेरी मंशा राष्ट्रपति को सरकार का बयान देने से रोकने की थी। इसी काल्पनिक आधार पर मंत्री ने कहा कि संसद भंग करना पड़ी। ’’


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