चीन की ‘चिनचिनाहट’


भारत और चीन के बीच तनातनी उस भूमि पर सड़क निर्माण को लेकर पैदा हुई है जो भारत के सिक्किम राज्य और भूटान देश की सीमाओं से लगी हुई है और चुम्बी घाटी के किनारे पर पड़ती है। 80 कि.मी. क्षेत्रफल वाला यह इलाका चुम्बी घाटी के कोने पर भूटान की सीमाओं में आता है मगर चीन इस पर अपना अधिकार जताता रहा है जबकि यह भूटान सरकार के नियन्त्रण में है। भूटान इस क्षेत्र को ‘दोकलाम पठार’ कहता है औऱ चीन ‘दोंगलांग’ के नाम से पुकारता है और भारत ‘दोकाला’ के नाम से जानता है। इस ‘दोकलाम पठार’ पर चीन के साथ भूटान का लम्बे अर्से से विवाद रहा है और 1984 से इसे सुलझाने के लिए दोनों देशों की बातचीत जारी है जिसके अभी तक 24 दौर हो चुके हैं। अत: कूटनीतिक नजरिये से यह पूरी तरह विवादास्पद क्षेत्र है। यह क्षेत्र भारत की सीमाओं की तरफ इस तरह खुलता है कि हमारे प. बंगाल के ‘सिलीगुड़ी से लेकर उत्तर पूर्वी राज्यों को जोड़ने वाली ‘चिकन नेक’ के नाम से जानी जाने वाली सड़क बहुत कम दूरी पर रह जाती है। इसके साथ ही भारत की भूटान के साथ रक्षासन्धि है जिसके मुताबिक इस छोटे से पहाड़ी देश की राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा का भार हमारे ऊपर है मगर चीन ने इस विवादित क्षेत्र को सड़क निर्माण के लिए चुनकर भारत व भूटान दोनों के सामने ही अपनी सामरिक ताकत के बूते पर ‘सैनिक चुनौती’ खड़ी करने की धमकी तक दे डाली है।

भारत-भूटान की सन्धि राष्ट्रसंघ में सूचीबद्ध है अत: चीन भारत को भूटान की सामरिक मदद करने से नहीं रोक सकता। दूसरे भारत को अपने रणनीतिक हितों की सुरक्षा करने का पूरा अधिकार है जिसकी वजह से भारत की सरकार ने बीजिंग की सरकार से अपनी आपत्ति जता दी है लेकिन चीन का भारत को 1962 के वाकयों का याद दिलाना और यह कहना कि इतिहास से भारत को सबक सीखने की जरूरत है। पूरी तरह उसकी हठधर्मिता और सीनाजोरी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि 1962 में हमारी करारी शिकस्त हुई थी मगर यह भारत का वह ‘विश्वास’ तोड़कर हुई थी जिसमें चीन ने खुद भरोसा जताते हुए 1959 में नई दिल्ली यात्रा पर आये इसके प्रधानमन्त्री ‘चाऊ एन लाई’ ने कसम खाई थी कि वह ‘पंचशील’ के शान्ति के सिद्धान्तों पर अमल करते हुए ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के जज्बे को अपने दिल से लगाये रखेगा। मगर 1962 में चीन ने भारत का भरोसा तोड़ डाला और अपनी सेनाएं हमारे असम के तेजपुर तक पहुंचा दीं। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसका भारी विरोध हुआ और चीन को पीछे हटना पड़ा। मगर इस वाकये से हमारे तब के प्रधानमन्त्री स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू को इतना जबर्दस्त धक्का लगा कि वह लगातार बीमार रहने लगे और मई 1964 में उनकी मृत्यु हो गई। भारत की पीठ में छुरा घोंपकर चीन ने एक शान्ति प्रिय पड़ोसी देश के रूप में अपनी विश्वसनीयता समाप्त कर डाली।

भारत ने इसके बाद से ही अपनी फौजी तैयारियों पर जोर देना शुरू किया जिसमें सोवियत संघ ने हमारी पूरी मदद की, उसके बाद एक बार 1967 में चीन ने ‘नाथूला’ सीमा पर ही हठधर्मिता का परिचय देते हुए अपने सैनिक ‘सिक्किम’ की सीमा की तरफ उतार दिये थे। उस समय सिक्किम भी एक स्वतन्त्र राष्ट्र था और उसके साथ भी हमारा समझौता आज के भूटान देश जैसा ही था तब स्व. इन्दिरा गांधी ने भारत की सेनाओं को चीन का मुकाबला करने का सख्त आदेश दिया और चीनी सेनाएं अपनी हदों में वापस चली गईं। हालांकि ये छिटपुट सैनिक झड़पें ही थीं मगर चीन इसके बहाने भारत को डराने की कोशिश जरूर कर रहा था। इसके बाद से लगातार चीन के साथ ‘छह तरफ’ से लगती हमारी सीमाओं पर शान्ति बनी रही हालांकि चीन बीच-बीच में अतिक्रमण करने से बाज नहीं आया और इसने हमारे ‘अरुणाचल प्रदेश’ को भी अपना हिस्सा बताना शुरू कर दिया वह भी तब जब 2003 में हमने ‘तिब्बत’ को इसका भौगोलिक अंग स्वीकार कर लिया और इसने सिक्किम को भारत का अंग स्वीकार किया। 1972 में स्व. इदिरा गांधी ने सिक्किम को भारतीय संघ में मिला लिया था और राष्ट्रसंघ ने इसे 1974 में मंजूरी भी प्रदान कर दी थी। अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीतिक क्षेत्रों में चीन की ताजा सीनाजोरी को अनापेक्षित नहीं माना जा रहा है क्योंकि भारत के सम्बन्ध पिछले दो दशक में अमरीका के साथ एक नये स्तर पर सुधरे हैं जिनका दक्षिण एशिया की राजनीति पर असर पड़े बिना नहीं रह सकता जबकि चीन इस इलाके में अपना दबदबा पाकिस्तान को साथ लेकर कायम करने की मुहिम को अंजाम दे रहा है। मगर हमें बड़ी ही सावधानी के साथ चीन को सही रास्ते पर लाना होगा और उसे युद्धोन्माद पैदा करने से रोकना होगा।

यह भारत की कूटनीति की अग्निपरीक्षा का समय भी हो सकता है। हम उसके साथ अपने लम्बे सीमा विवाद को तय करने के लिए ‘वार्ता तन्त्र’ का ही सहारा ले रहे हैं और चीन इस पर सहमत है अत: पूरे मसले से सैनिक हस्तक्षेप को इस तरह तटस्थ रखना होगा कि कूटनीतिक दायरे में समस्या का हल निकल कर बाहर आये। हमारी यह परम्परा रही है कि हम विदेशी मामलों से सेना को इस प्रकार तटस्थ रखते हैं कि वह पूरी तरह चाक-चौबन्द और सुसज्जित रहते हुए आवश्यकता पडऩे पर अपनी ताकत का अन्दाजा विरोधी को दिखा सके मगर चीन हमारे सेनाध्यक्ष को यह कहने से नहीं रोक सकता कि भारतीय सेनाएं किसी भी खतरे का सामना करने में पूरी तरह सक्षम हैं। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद ही साफ कर दिया था कि भारत अपने पड़ोसियों से मधुर सम्बन्ध बनाने का हिमायती है और किसी भी विवाद को केवल बातचीत से ही सुलझाने में यकीन रखता है मगर चीन अपनी सीनाजोरी दिखाने से तब भी बाज नहीं आया था।

इसके साथ ही चीन को यह भी ध्यान रखना होगा कि उसे भारत के किसी तीसरे देश के साथ सम्बन्धों की गर्मजोशी से कोई लेना-देना नहीं है। अगर चीन हमें यह याद दिलाने की जुर्रत करता है कि ‘1962 को याद करो’ तो उसे मालूम होना चाहिए कि ‘आज का भारत 1962 का भारत भी नहीं है’ उसकी ‘विस्तारक साम्राज्यवादी’ हरकतों को भारत कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। 1962 में उसने हमारा विश्वास तोड़ा था और दुनिया के सामने यह सिद्ध कर दिया था कि वह भरोसे लायक देश नहीं है। आज भी वह जिस तरह आतंकवाद के प्रतीक ‘पाकिस्तान’ को अपने कन्धे पर बिठाकर दुनिया की सैर करा रहा है उससे यही साबित हो रहा है कि उसकी आर्थिक ताकत के पीछे आतंकवाद का ‘राक्षस’ भी खड़ा हुआ है। भारत को उसकी धमकी उसकी कमजोरी के अलावा और कुछ नहीं मानी जा सकती क्योंकि वह कूटनीतिक मसले को फौज के जरिये सुलझाना चाहता है।

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