भारत, रूस और अमरीका


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अमरीका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के साथ अच्छे संबंध बनाने के उत्साह में हम भारतवासी भूल रहे हैं कि भारत के स्वतंत्र होने के बाद से रूस हमारा समय की ‘कसौटी’ पर परखा हुआ सच्चा दोस्त है। मगर खुशी इस बात की है कि मोदी सरकार इस हकीकत को दुनिया के बदलते स्वरूप के बावजूद नहीं भूली है। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आजकल चल रही अमरीका यात्रा से ठीक पहले वित्त व रक्षामंत्री अरुण जेटली रूस की तीन दिवसीय यात्रा पर गये और वहां जाकर उन्होंने सैनिक तकनीक व विज्ञान व टैक्नोलोजी के क्षेत्र में आपसी सहयोग की कड़ी को और मजबूत किया। यह दीवार पर लिखी हुई इबारत है कि भारत पर जब भी मुसीबत आई रूस चट्टान की तरह इसके साथ खड़ा रहा और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसने भारत का  सम्मान कायम रखने में विशिष्ट भूमिका निभाई, परन्तु 1990 के बाद सोवियत संघ के विघटन के उपरांत परिस्थितियां बदलीं और भारत ने भी यथास्थिति का संज्ञान लेते हुए अमरीका से संबंध सुधारने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने शुरू किए। मगर इसका प्रभाव भारत की सभी सरकारों ने आपसी घनिष्ठ संबंधों पर नहीं पडऩे दिया। इसकी मूल वजह थी कि भारत के सैनिक सुसज्जिकरण के क्षेत्र में रूस ने हमें न केवल जरूरी साजो-सामान दिया, बल्कि उन्हें बनाने की टैक्नोलोजी का भी हस्तांतरण किया।

इसी वजह से दोनों देशों की सरकारों के बीच ‘सैनिक तकनीकी सहयोग पर एक आयोगÓ का गठन हुआ था। श्री जेटली ने इसी आयोग की बैठक में विगत 23 जून को मास्को में भाग लिया था। मुझे अच्छी तरह याद है कि पहली मनमोहन सरकार में जब वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी रक्षामंत्री थे तो उन्होंने अमरीका व रूस के मामले में बहुत संतुलित नीति अपनाते हुए साफ किया था कि सोवियत संघ के विघटन से भारत के सामने अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण का कार्य बहुत महत्वपूर्ण है मगर भारत दुनिया के बाजार में केवल खरीदार होकर खड़ा नहीं रह सकता। हमें यूरोपीय सैनिक टैक्नोलोजी के अद्यतन हथियार भी चाहिए और रूस के साथ पुराने सैनिक संबंधों की प्रगाढ़ता भी। हमें सैनिक साजो-सामान में आत्मनिर्भरता इस शर्त के साथ प्राप्त करनी होगी कि इसे बनाने की टैक्नोलोजी भी हमारे पास आए। रूस इस मोर्चे पर हमारा साथी रहा है अत: उसके साथ हमारा सहयोग बदली हुई परिस्थितियों में बदस्तूर जारी रहेगा और साथ ही दुनिया के दूसरे देशों के आधुनिकतम हथियारों के लिए भी भारत के दरवाजे खुले रखे जाएंगे, लेकिन 2014 तक यह बदलाव आ चुका था कि ‘भारत, आस्ट्रेलिया, अमरीका’ की सेनाओं ने संयुक्त सैनिक अभ्यास करने की योजना पर आगे बढऩा शुरू कर दिया था। केन्द्र में सत्ता परिवर्तन होने के बाद इसे और बल मिला।

हाल ही में अमरीका की फौजी लड़ाकू विमान ‘एफ-16’ बनाने वाली कंपनी ‘लाकहीड’ ने भारत के अग्रणी औद्योगिक घराने ‘टाटा’ के साथ इनका उत्पादन भारत में करने की परियोजना पर समझौता किया है। इसके साथ ही अमरीका भारत को ‘ड्रोन’ विमानों की सप्लाई भी करेगा। दुनिया जानती है कि अमरीका पाकिस्तान को एफ-16 विमान दे चुका है और भारत के पास रूसी टैक्नोलोजी के मिग व सुखोई विमान हैं। अमरीकी विमानों का उत्पादन भारत में होने से हमारा रुतबा भी बढ़ेगा और इन विमानों की भारतीय उत्पादन इकाई से इनका निर्यात भी दूसरे देशों को होगा। मगर यह परियोजना निजी क्षेत्र में होगी जिसमें टैक्नोलोजी हस्तांतरण का मुद्दा भी दोनों कंपनियों के बीच का मसला रहेगा। लाकहीड कंपनी एफ-16 विमान के विभिन्न कल-पुर्जे व उपकरण बनाने के अपने अमरीकी उत्पादन स्थल को बदस्तूर जारी रखेगी। बस यही मूल अंतर है रूस के साथ भारत के सैनिक सहयोग में। रूस की सरकार भारत को जो भी सैनिक साजो-सामान देती रही है उसकी टैक्नोलोजी भी हस्तांतरित करती रही है। दोनों देशों की सरकारों के बीच ऐसा समझौता है जिसे दोनों देशों की सरकारों के बीच बना ‘आयोग’ लगातार बढ़ाता रहता है इसमें तिजारत कम और एक-दूसरे को मजबूत बनाने का नजरिया ज्यादा रहता है।

मगर बदले हालात के साथ चलना भारत की भी जरूरत है। यही वजह है कि मोदी सरकार ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की मंजूरी दी हुई है। इसके चलते भारत में औद्योगिकीकरण की गति तेज होनी लाजिमी है और रोजगार के अवसरों के भी बढऩे की प्रबल संभावना है इसमें हमें डरने या घबराने की भी जरूरत नहीं है। भारत आज कार उत्पादन का पूरी दुनिया में बहुत बड़ा केंद्र बन चुका है। यह सब बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के दौर में ही संभव हुआ है। मगर रक्षा क्षेत्र में हमें यह ध्यान रखना होगा कि हम इनकी मूल उत्पादक कंपनियों के फेंरचाइजी (उप-विक्रेता या उप-उत्पादक) बनकर न रह जाएं। अमरीका को भी यह देखना होगा कि वह भारत सरकार के साथ किये गये परमाणु करार की शर्तों का पालन पूरी ईमानदारी के साथ करें। उसने अभी तक द्विआयामी  (डुअल) टैक्नोलोजी तक भारत को नहीं दी है और भारत अभी तक न्यूक्लियर सप्लायर्स गु्रप देशों के संगठन का सदस्य भी नहीं बन पाया है, जबकि करार में यह लिखित है कि अमरीका भारत को इस गु्रप का सदस्य बनवाने के लिए अपने पूरे प्रभाव व सद इच्छा का प्रयोग करेगा।