जम्मू-कश्मीर और संविधान का राज


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जम्मू-कश्मीर राज्य में जिस प्रकार संविधान के शासन के परखचे उड़ाये जा रहे हैं वह पूरे देश के लिए गंभीर चिन्ता का विषय है। राज्य में पीडीपी व भाजपा की साझा सरकार राजनीतिक गठजोड़ बना कर संविधान की शर्त के अनुसार विधानसभा के भीतर बहुमत की सत्ता ही नहीं है बल्कि यह पूरे राज्य में कानून का शासन स्थापित करने के दायित्व के साथ भी बन्धी हुई है। संविधान का राजनैतिक मजबूरी या गठजोड़ अथवा आवश्यकता से कोई लेना-देना नहीं होता। किसी भी गठजोड़ या गठबन्धन को सर्वप्रथम संविधान के ऊपर खरा उतरना होता है। किसी भी गठबन्धन या साझा सरकार में शामिल हर पार्टी के प्रतिनि​िध को संविधान के अनुरूप ही काम करके अपनी वैधता सिद्ध करनी होती है किन्तु जम्मू-कश्मीर की महबूबा मुफ्ती सरकार जिस तरह संविधान के विरुद्ध काम कर रही है उससे यह मतलब निकल रहा है कि इस राज्य को इस मामले में भी ‘विशेष दर्जा’ दे दिया गया है। किसी भी राज्य सरकार का कोई भी मन्त्री किसी भी सूरत में अपने उच्च न्यायालय के आदेशों की न तो अवहेलना कर सकता है और न उसके विरुद्ध कोई काम कर सकता है। यदि किसी राज्य मंे इस प्रकार की घटना होती है तो वह प्रत्यक्ष रूप से संविधान की सत्ता को चुनौती समझी जाती है।

एेसी घटना का संज्ञान लेने के लिए राज्य के राज्यपाल बाध्य होते हैं क्योंकि उनका प्रमुख कार्य केवल संविधान का शासन देखना ही होता है। हमारे संसदीय लोकतन्त्र में इस प्रकार की जो तक्नी​की मगर पवित्र व्यवस्था की गई है वह किसी भी चुनी हुई सरकार को बेलगाम होने और कानून के दायरे से बाहर जाकर बहुमत की अकड़ पर सीना-जोरी करने से रोकने के लिए ही हुई है। जम्मू-कश्मीर राज्य में जब दो पूर्व मन्त्री लालसिंह और चन्द्रभान गंगा को कठुआ में बकरवाल ( गुर्जर) समुदाय की एक आठ वर्षीय बालिका के साथ पैशाचिक बलात्कार करके उसकी हत्या करने वाले अभियुक्तों के हक में आयोजित एक रैली को सम्बोधित करने के लिए अपने पद से हटना पड़ा था तो यह स्पष्ट था कि ये दोनों मन्त्री राज्य के उच्च न्यायालय के उस आदेश की अवहेलना कर रहे थे जिसने इस मामले की जांच अपनी निगरानी में करने के जम्मू-कश्मीर पुलिस की अपराध शाखा को निर्देश दिये थे। ये दोनों मन्त्री इस आदेश के खिलाफ इलाके के कुछ लोगों द्वारा मामले की सीबीआई जांच करने की मांग का खुला समर्थन कर रहे थे।

इन दोनों मन्त्रियों ने उच्च न्यायालय की निगरानी में चल रही जांच के प्रति अविश्वास व्यक्त करके अपने संवैधानिक दायित्व को तिलांजिली दे दी थी। एेसा करके उन्होंने पूरी राज्य सरकार की वैधता को कटघरे में खड़ा कर दिया था और परोक्ष रूप से एेलान कर दिया था कि उनका उच्च न्यायालय में विश्वास नहीं है। उनके इस कृत्य का संज्ञान राज्यपाल ने क्यों नहीं लिया अथवा इस तरफ अपनी आंखें क्यों मूंदे रखी, इस बारे में अलग से सवाल खड़े किये जा सकते हैं? मगर इतना तय है कि लाल सिंह व गंगा दोनों ही कानून के मुजरिम हैं और इन पर योथोचित धाराओं के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज होना चाहिए और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की सम्बन्धित दफाओं का इस्तेमाल करके इनके चुनाव लड़ने पर सवाल खड़ा होना चाहिए या वर्तमान विधानसभा सदस्यता को मुअत्तिल करने पर गौर किया जाना चाहिए। संवैधानिक व्यवस्था तभी चरमराती है जब संविधान की कसम उठा कर शासन चलाने का अंग बने लोग संविधान के ही विरुद्ध काम करने लगते हैं। एेसे लोगों को लेकर जो सरकार चलती है उसकी वैधता भी तब तक सन्देह के घेरे में रहती है जब तक कि उनके विरुद्ध संविधान के अनुसार कार्रवाई शुरू न कर दी जाये।

मगर लगता है कि जम्मू-कश्मीर सरकार को दोनों पार्टियों ने ‘खाला का घर’ समझा हुआ है कि मंगलू अगर बिरयानी खराब बनाता है तो मोज्जम को खानसामा बना दो। कठुआ में हिन्दू एकता मंच की जिस रैली में शिरकत करने लाल सिंह और गंगा गये थे उसी रैली मंे कठुआ का विधायक राजीव जसरोटिया भी बड़ी शान से शामिल होकर उच्च न्यायालय के आदेश का विरोध कर रहा था। मन्त्रिमंडल विस्तार में अब पुराने मन्त्रियों की जगह एक जसरोटिया को बना दिया गया है। वाजिब सवाल है कि जब लालसिंह और गंगा को रैली में शिरकत करने की वजह से मन्त्री पद से हटाया गया तो जसरोटिया को रैली में ही शिरकत करने की वजह से मन्त्री पद पर क्यों रखा गया? संवैधानिक मर्यादाओं और उसकी पवित्रता से खेलने वाले लोगों को हम पुरस्कृत करके क्या सिद्ध करना चाहते हैं? दरअसल सियासत ने हमें खाली वोटर बना कर रख दिया है और हम इंसानियत के हर उस पहलू को कुचल देना चाहते हैं जो लहू के रंग को एक मानता है।

वरना क्या वजह है कि जम्मू-कश्मीर का नया उपमुख्यमन्त्री कवीन्द्र गुप्ता कुर्सी पर बैठते ही यह नसीहत देता कि कठुआ जैसी छोठी घटना के पीछे क्यों पड़े हुए हो। एेसी छोटी-मोटी घटनाएं होती रहती हैं। सत्ता की भूख ने किस कदर हमें नीचे गिरा दिया है कि हम कानून तोड़ने वाले को ही मन्त्री बना कर शेखी बघार रहे हैं कि कठुआ की आठ साल की बच्ची के साथ न्याय होगा? जंगली भेडि़यों की तरह उस बच्ची के साथ व्यवहार करने वाले मुजरिमों की पैरवी करने में हमें जरा भी शर्म नहीं आ रही और महबूबा मुफ्ती एक महिला होकर भी उस दर्द को नहीं समझ रहीं जो एक अबोध बच्ची के जिस्म को नोचते हुए सारे आलम में बिफरा होगा। मुल्जिमों की सरकार क्या कोई सरकार हो सकती है?

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