सर्वोच्च न्यायालय का ‘इंसाफ’


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भारत के महान लोकतन्त्र के लिए वर्तमान समय जो चुनौती खड़ी कर रहा है उसमें सबसे कड़ी परीक्षा न्यायपालिका की हो रही है क्योंकि हमारे चौखम्भा राज का यह एेसा स्तम्भ है जो पूरी संसदीय प्रणाली के संविधान के अनुरूप संचालित होने की गारंटी देता है और सुनिश्चित करता है कि राजनीतिक बहुमत के आधार पर चुनी हुई कोई भी सरकार उन सीमाओं को तोड़ने की हिमाकत न कर सके जो विभिन्न स्तम्भों के बीच संविधान ने खींच रखी हैं।

संसदीय प्रणाली की पारदर्शिता संसद के माध्यम से इस प्रकार तय है कि इसमें कोई दूसरा स्तम्भ किसी भी स्तर पर दखलंदाजी नहीं कर सकता है और इसका कामकाज संसद के दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा के भीतर इनके चुने हुए सभाध्यक्षों के माध्यम से स्वतन्त्र व निरपेक्ष रूप से चलता है लेकिन संसद के दोनों सदन ही राजनीतिक प्रतिनिधियों का समूह होते हैं

अतः इनके भीतर होने वाले फैसले राजनीति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते मगर हमारी न्याय प्रणाली की संरचना राजनीति से परे और सत्ता के प्रभावों से दूर रखने की व्यवस्था हमारे संविधान निर्माताआें ने जिस प्रकार की थी उसमें कालान्तर में सत्ता ने अपना हस्तक्षेप करने के प्रयास न किए हों,

ऐसा पूरे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता क्योंकि 1993 तक सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की जो प्रणाली लागू थी उसमें केन्द्र की सरकार मुख्य न्यायाधीश के साथ विचार-विमर्श या वार्तालाप के नाम पर अपनी इच्छा सहमति के नाम पर लाद देती थी। (श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने शासनकाल में एेसा कई बार किया था) इसका प्रतिरोध स्वयं सर्वोच्च न्यायालय ने ही किया और अपने भीतर से ही न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए निर्वाचक मंडल ( कोलिजियम) की प्रणाली विकसित की।

इसे निरस्त करने के लिए सरकार ने ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ का विधेयक पारित जरूर किया मगर वह संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाया जिसकी वजह से कोलिजियम प्रणाली जारी हैै मगर यह व्यवस्था केन्द्र में सत्तारूढ़ सरकारों को चिढ़ाती रहती है कि बाकायदा कानून मन्त्रालय होने के बावजूद उसकी हैसियत सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त करने की नहीं है जिसकी वजह से समय-समय पर हम कानून मन्त्री के एेसे बेसिर-पैर के वक्तव्य सुनते रहते हैं जिनसे उपजी झुंझलाहट न्यायपालिका को सावधान करती रहती है।

यह सारी भूमिका इसलिए जरूरी है जिससे हम यह समझ सकें कि भारत की न्यायपालिका का अगला पड़ाव क्या होगा और इसकी स्वतन्त्रता व निष्पक्षता को प्रभावित करने के किसी भी सरकार के प्रयासों का नतीजा क्या निकलेगा? मुख्य न्यायाधीश श्री दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग चलाये जाने की मांग राज्यसभा के सभापति श्री वेंकैया नायडू ने जितनी जल्दबाजी में निरस्त की थी उसके परिणाम स्वरूप इसे चुनौती देने वाली याचिका के रूप में मामला सर्वोच्च न्यायालय में जाना लगभग तय ही था।

मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग का मुद्दा उनके ही साथी न्यायमूर्तियों की शिकायत के आधार पर बना था जिन्होंने विगत जनवरी महीने में सार्वजनिक रूप से कहा था कि देश की सबसे बड़ी अदालत में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। राजनीतिक रूप से दूरगामी प्रभाव डालने वाले मुकद्दमे मुख्य न्यायाधीश स्थापित परंपरा को तोड़ कर मनपसन्द न्यायिक पीठों को सौंप रहे हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय की प्रक्रियागत समस्या थी जिसका संज्ञान निश्चित रूप से राजनीतिक दलों को लेना ही था।

ठीक एेसा ही हुआ और यह मामला राजनीतिक कलेवर के साये में आने के बावजूद राजनीतिक न होकर न्यायपालिका की स्वतन्त्रता और निरपेक्षता का बन गया परन्तु आज सर्वोच्च न्यायालय से कांग्रेस नेता श्री कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश को पद से हटाने की अपनी याचिका वापस लेकर साफ कर दिया है कि उनका मन्तव्य व्यक्ति विशेष के विरुद्ध रंजिश का नहीं है बल्कि मुख्य न्यायाधीश के पद और इस संस्थान की शुचिता व पवित्रता को संदेहों से ऊपर बनाये रखने का है।

सवाल यह है कि जब मामला मुख्य न्यायाधीश के ही विरुद्ध है तो किस प्रकार वह अपने विरुद्ध होने वाली सुनवाई को सुनने के लिए किसी संविधान पीठ का गठन कर सकते हैं। यह न्यायिक चेतना और सत्य को बाहर लाने की प्रेरणा ही होती है कि कोई भी न्यायाधीश किसी भी एेसे मुकद्दमे से स्वयं को इसके शुरू होने पर ही अलग कर लेते हैं जिसमें उनका किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो या उनके हित किसी भी स्तर पर उस मुकद्दमे के मुद्दे से टकरा रहे हों।

अतः श्री सिब्बल का यह पूछना कि पहले यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि संविधान पीठ का गठन किसके आदेश से हुआ है अथवा उसे गठित करने में कौन सी प्रक्रिया अपनाई गई है, पूरी तरह वाजिब है और प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से भी तर्कपूर्ण है। संविधान पीठ का गठन बिना न्यायिक आदेश के नहीं हो सकता और जब पीठ के गठन में ही न्यायिक प्रक्रिया का अनुपालन नहीं किया है तो उसमें न्याय पाने की गतिविधि को किस प्रकार न्यायोचित कहा जा सकता है?

अतः पीठ के गठन के आदेश की प्रतिलिपि मांग कर उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया का ही पालन किया और जानना चाहा कि जिस पीठ के समक्ष वह अपनी दलीलें देंगे उसकी वैधानिक स्थिति क्या है? इसमें किसी प्रकार का कोई भ्रम नहीं रहता यदि उन्हें आदेश की प्रतिलिपी सुलभ करा दी जाती। एेसा क्यों नहीं किया गया ? यह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है परन्तु अभी तक की परंपरा यही रही है कि सर्वोच्च न्यायालय का सारा कामकाज पारदर्शी तरीके से होता आया है।

जो दिक्कतें फिलहाल पेश आ रही हैं वे इसके कामकाज को पर्दे में रखने की कोशिशों की वजह से ही आ रही हैं। अतः श्री सिब्बल ने अपनी याचिका वापस लेकर सर्वोच्च न्यायालय का मान ही बढ़ाया है और पूरा मामला मुख्य न्यायाधीश की अन्तरात्मा पर छोड़ दिया है। यह सच है कि लोकतन्त्र लोकलज्जा से ही चलता है मगर एेसा भी नहीं है कि हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत देश में चल रही अराजकता से वाकिफ ही न हो। इस बर्बर कांड पर अमानवीय राजनीति हुई,

उसका जवाब विद्वान न्यायाधीशों ने दिया और मुकदमे का कठुआ से पंजाब के पठानकोट की अदालत में तबादला कर दिया और सख्त आदेश दिया कि मामले की सुनवाई बिना किसी स्थगन के रोज होगी और बन्द कमरे में होगी तथा इसकी कार्यवाही का विवरण फैसला आने तक किसी अखबार या चैनल में नहीं लिखा या बताया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय जानता है कि कठुआ में वकीलों ने ही इस मामले में किस प्रकार की जहनियत दिखाई थी और मुकद्दमे की चार्जशीट दायर करने वाली वकील दीपिका सिंह राजावत के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया था और जम्मू बार एसोसियेशन के अध्यक्ष ने किस तरह बलात्कार करने वालों के हक में वकीलों को इकट्ठा किया था।

अपराधियों को शह देने वाले ये लोग मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे और जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय के आदेशों की खुलेआम अवहेलना कर रहे थे और इसके लिए जनान्दोलन तक चला रहे थे जिसे राज्य की सरकार में शामिल भाजपा मन्त्रियों का समर्थन तक प्राप्त था। कठुआ का मामला इसीलिए अलग और पूरे देश में रोष पैदा करने वाला है कि इसमें स्वयं सत्ता दोषियों को बचाने के रास्ते ढूंढ रही थी। एेसा दूसरा मामला उत्तर प्रदेश के उन्नाव के भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का भी था जिसे योगी सरकार यह कहकर बचा रही थी कि उसके खिलाफ कोई सबूत ही नहीं है । यह नई राजनीतिक संस्कृति पूरे देशवासियों को विचलित करने के लिए काफी थी।

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