अफगानिस्तान में फिर ताकतवर हुआ तालिबान


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अफगानिस्तान के बगलान प्रांत में भारतीय कम्पनी केईसी इंटरनैशनल के 6 इंजीनियरों का अपहरण देश के लिए चिन्ता का विषय है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अपहरण कारी नुरुद्दीन के वफादार तालिबान लड़ाकों ने किया है। तालिबान के लड़ाके पहले भी भारतीयों को निशाना बनाते रहे हैं। भारत अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए जुटा हुआ है।

अफगानिस्तान की संसद का निर्माण, सड़कों, पुलों का निर्माण भारत ने ही किया है। भारतीय कंपनियों ने वहां करोड़ों का निवेश कर रखा आैर युद्ध से जर्जर हो चुके देश को फिर से पटरी पर लाने की परियोजनाओं से जुड़ी हुई हैं। तालिबान पहले भी देश में बिजली से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाता रहा है।

तालिबान ने बगलान में बिजली का खंभा नष्ट कर दिया था, जिससे काबुल दो दिन तक अंधेरे में डूबा रहा था। उस समय तालिबान ने धमकी दी थी कि मांगें पूरी नहीं की गईं तो काबुल के लिए बिजली आपूर्ति रोक दी जाएगी। अफगानिस्तान में भारतीय हमेशा तालिबान के निशाने पर रहे हैं। इस वर्ष की शुरूआत में 15 जनवरी को आतंकियों ने काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर राकेट हमला किया था। इससे दूतावास की इमारत के एक कोने को नुक्सान पहुंचा था लेकिन सभी कर्मचारी सुरक्षित रहे।

इससे पहले चार जनवरी, 2016 को भी अफगानिस्तान के मजार-ए-शरीफ में स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास पर चार बंदूकधारियों ने हमला कर दिया था।इनमें से दो आतंकियों को आईटीबीपी के जवानों ने मार गिराया था। यह घटना ऐसे समय में हुई जब इससे कुछ दिन पहले 25 दिसम्बर, 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अफगानिस्तान की संसद का उद्घाटन किया था। 7 जुलाई, 2008 को भारतीय दूतावास के निकट कार से आत्मघाती हमला किया गया था, जिसमें 58 लोग मारे गए थे।

2009 में भी भारतीय दूतावास पर हमला हुआ था, जिसमें 17 लोग मारे गए थे। इसके बाद 26 फरवरी, 2010 को भी काबुल में भारतीय डाक्टरों के रिहायशी इलाकों पर आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 18 लोग मारे गए थे। 2014 में केथोलिक प्रीस्ट फादर एलेक्सिस प्रेम कुमार को हैरात में अगवा कर लिया गया था और साल 2015 में छोड़ा गया था। वहीं आगा खान फाउंडेशन में काम करने वाली वर्कर जूडिथ डिसूजा को वर्ष 2016 में काबुल में अगवा किया गया था और उन्हें एक माह में छुड़ा लिया गया था।

इस वक्त अफगानिस्तान में आईएस, तालिबान, अलकायदा और कई छोटे-बड़े आतंकी संगठन सक्रिय हैं। इसलिए भारत को अपने नागरिकों की सकुशल वापिसी के लिए फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा। एक समय था जब तालिबान का अफगानिस्तान पर राज था, मगर 2001 में अमेरिकी हमले के बाद तालिबान की सत्ता को उखाड़ फैंका गया। सवाल यह है कि आज 17 वर्ष बाद भी तालिबान अफगानिस्तान में इतना ताकतवर कैसे बन गया।अफगानिस्तान में लगातार हो रहे धमाके इस बात की गवाही दे रहे हैं कि तालिबान फिर सिर उठा चुका है। अफगानिस्तान के नक्शे पर सबसे पहले तालिबान 90 के दशक में उभरा था,

उस वक्त देश भयंकर गृहयुद्ध की चपेट में था। तमाम ताकतवर कमांडरों की अपनी-अपनी सेनाएं थीं। सब देश की सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ रहे थे। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका में अलकायदा ने आतंकवादी हमला किया तो जांच से पता चला कि इन हमलों की साजिश रचने वाले अफगानिस्तान में हैं तो तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया। उस समय ऐसे लग रहा था कि तालिबान का पूरी तरह खात्मा हो जाएगा मगर ऐसा नहीं हुआ।

पाकिस्तान लगातार अफगानिस्तान में तालिबान लड़ाकों को हथियार आैर धन मुहैया कराता रहा। अफगानिस्तान में अमेरिका की हार का कारण पाकिस्तान भी है। आज की तारीख में दो लाख या इससे भी ज्यादा तालिबान लड़ाके हैं, इनमें से ज्यादातर पाकिस्तान शरणार्थी कैम्पों से आए हुए लोग हैं। पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी नहीं चाहता। तालिबानी लड़ाकों की तादाद आईएस या अलकायदा जैसे चरमपंथी संगठनों से ज्यादा है। तालिबान को लगा कि केवल पाकिस्तान उनकी जरूरतें पूरी नहीं कर सकता तो उसने नया सहयोगी तलाश लिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब तालिबान को रूस से

हथियार और दूसरी मदद मिल रही है। रूस असल में अफगानिस्तान में अमेरिका से अपनी कुछ शर्तें मनवाना चाहता है। तालिबान के ठिकानों से रूसी हथियार मिलना इस बात की पुष्टि करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि तालिबान को कई देशों सेे हथियार और पैसे मिल रहे हैं। पाकिस्तान और ईरान में उन्हें छुपने के ठिकाने मिल रहे हैं।

इसलिए वह ताकतवर हो गया है। अमेरिका की कठपुतली सरकार इनसे टक्कर नहीं ले सकती। पाकिस्तान, ईरान और रूस से मिल रहे हथियार और अफीम की खेती से तालिबान बेहद मजबूत हालात में पहुंच गए हैं। युद्ध से बेहाल लोग उसकी पनाह में जाकर शांति चाहते हैं। महा​शक्तियों ने अफगानिस्तान को खतरे में डाल दिया है। भारत को इस ​िस्थति में बहुत सतर्क रहकर काम करना होगा। अफगानिस्तान का भविष्य क्या होगा, यह वक्त ही बताएगा।

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