‘अन्नदाता’ के अन्दर छिपे दर्द को समझो


अगर यह पूछा जाए कि देश का अन्नदाता कौन है तो इसका जवाब हर कोई यही देगा कि हमारा किसान। किसान की मेहनत, किसान का खून-पसीना सब्जी से लेकर अन्न उपजाने तक विद्यमान रहता है लेकिन उसकी कद्र नहीं होती। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि आज हमारा किसान बहुत ही बदतर हालत में है तो इसकी वजह मौजूदा परिस्थितियों में प्रकृति की मार भी कही जा सकती है। बारिश का न होना और जरूरत से ज्यादा बारिश का होना ये दोनों ही चीजें किसान की फसल से जुड़ी हैं और बची-खुची कसर खेती के महंगे तौर-तरीकों ने पूरी कर दी है। ऐसे में देश के आधुनिकतम रूप से संवरने की सोच के पीछे खेती योग्य जमीन भी सिमट रही है तो सचमुच यह एक चिंतनीय पहलू है। कभी देश में नारा दिया गया था ‘जय जवान-जय किसान’ जो आज भी भारत की पहचान को दिखाता है परंतु आज किसान तरह-तरह के लोन लेकर फसल बीजता है और जब फसल तैयार होने को होती है तो प्राकृतिक प्रकोप से नष्ट हुई फसल के कारण लोन न चुका पाने को लेकर बदहाली से गुजर रहा है तो उसने आत्महत्या का रास्ता चुन लिया है, इस अविश्वसनीय सच को मानना ही पड़ेगा, क्योंकि आंकड़े चौंकाने वाले हैं। आज के लोकतंत्र में किसान अगर अपनी मांगों के समर्थन में कहीं धरना-प्रदर्शन करते हैं और जिस तरह से मंदसौर में इन किसानों पर पुलिस फायरिंग हुई है यह एक खतरे की घंटी है। भले ही मध्य प्रदेश शासन अच्छा-खासा मुआवजा इन किसानों के लिए देने का ऐलान कर चुका है लेकिन जो मारे गए हैं उनके परिजनों का जो आसरा छिन गया वह एक बड़ा सवाल है। यद्यपि मोदी सरकार इस मामले में बहुत कुछ करने को कृतसंकल्प है परंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि किसानों के सब्र का पैमाना अब भर चुका है।

भाजपा सरकार ने सत्ता में आने से पहले किसानों को ढेरों सुविधाएं दिए जाने के वादे किए थे, उनके लोन माफ करने के और कृषि के अत्याधुनिक संसाधनों की उपलब्धता तथा बीज खरीदने और सिंचाई की सुविधा के लिए लोन दिलाने के वादे भी किए गए थे। यूपी में ऐसी सहूलियतें योगी सरकार ने शुरू भी की हैं। यह बात अलग है कि केंद्र सरकार भी इस मामले में किसानों के दर्द को समझकर उन्हें न केवल जागरूक बना रही है बल्कि नियमित रूप से उन्हें आज के माहौल में ढालने की कोशिश भी कर रही है। भाजपा से उम्मीदें तो लोगों की बढ़ी हुई हैं लेकिन हम समझते हैं कि किसानों के लिए सब कुछ अलग से ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि जो उनके उस दर्द को खत्म करने पर केंद्रित हो जो मौसम से जुड़ा है।  किसानों के दर्द की जब बात चलती है तो अगर पिछले एक दशक की बात करें तो आंकड़ें चौंकाने वाले हैं और इनसे हमें यह पता चलता है कि हजारों किसान कर्ज न चुका पाने की सूरत में आत्महत्याएं कर चुके हैं। बात महाराष्ट्र की हो, मराठवाड़ा, विदर्भ या फिर पंजाब, आंध्र प्रदेश या फिर यूपी की हो, सच तो यह है कि किसानों ने अपना ऋण न चुका पाने के चक्कर में आत्महत्याएं तो की हैं। यहां सोचने वाली बात यह है कि इन किसानों को आखिरकार वित्तीय लाभ कब मिलेगा? और अगर सरकार यह सब कुछ प्रदान कर रही है तो इसके आंकड़े जनता के सामने लाए जाएं ताकि और किसान आत्महत्या जैसी राह पर न चलें। किसानों की अनेक समस्याएं ऐसी हैं जो बिजली, पानी के अलावा भूमि अधिग्रहण से भी जुड़ी हैं। अगर किसानों की जमीन किसी मामले में विकास कार्यों को लेकर अधिग्रहीत की जाती है तो उनको मुआवजा घोषित हो जाता है लेकिन उन तक पहुंचने में बड़ी देर हो जाती है।

इस मामले में हमने सबसे बड़ी लड़ाई दिल्ली के पास भट्टा पारसोल में देखी है, जहां खुद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने किसानों के दर्द का हमसफर बनकर प्रशासन को चेताया था। इसे सरकारी पक्ष पर राजनीतिक तौर से तब भी लिया गया था और आज मंदसौर में जब राहुल गांधी किसानों का दर्द समझने के लिए वहां जाते हैं तो भी उन्हें रोक लिया जाता है तो क्यों? पहले भट्टा पारसोल में उन्हें रोका गया और अब यहां मंदसौर में रोका गया। आखिरकार इस लोकतंत्र में किसानों की आवाज उठाना क्या गुनाह है? देश में कोई भी घटना जब होती है तो विपक्ष लोकतंत्र में अपनी प्रतिक्रिया तो देता ही है। अगर राज्य सरकारों के इशारे पर प्रशासन किसी को घटना के प्रभावित पक्षों से मिलने पर रोक लगाता है तो इसका संदेश अच्छा नहीं जाएगा। मध्य प्रदेश शासन को इस मामले में सोच-समझकर आगे बढऩा होगा। अगर किसान प्रदर्शन कर रहे थे तो यह सवाल तो उठता ही है कि उन पर गोलीबारी क्यों की गई? छह किसानों की मौत हुई है। यह छोटी बात नहीं है। इसकी न सिर्फ जांच होनी चाहिए बल्कि किसानों का दर्द और उनकी आवाज शांतिपूर्वक तरीके से सुनने, समझने और इसका हल निकालने की व्यवस्था को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।  हालांकि भाजपा और कांग्रेस के बीच में इस मामले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं। जैसे मोदी सरकार ने जनता से किए वादों के अनुसार कई काम अच्छे किए हैं तो किसानों के मामले में भी उनका दिल जीतना ही होगा।

किसानों को खाली बढिय़ा खाद या बीज देने की घोषणा ही काफी नहीं है बल्कि अगर मौसम की वजह से उसकी फसल खराब हुई तो अगर इसके एवज में सरकारी मुआवजे का प्रावधान है तो फिर यह उस तक तुरंत पहुंचना चाहिए, क्योंकि कहा भी गया है ‘का बरसा जब कृषि सुखाने’ अर्थात जब खेती ही सूख गई तो फिर उस बरसात का क्या फायदा। जब किसान को मुआवजा मिला ही नहीं तो फिर इस घोषणा का क्या फायदा? सरकार द्वारा इस मामले में मुआवजा भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। प्रयत्न किए जाने चाहिएं कि जितने भी किसान अब तक पिछले एक दशक में आत्महत्याओं का शिकार हुए हैं, उनके परिजनों को मुआवजा दिया जाना चाहिए। सरकार को यह याद रखना होगा कि किसानों को सुख-सुविधाएं देना उसका एक प्राथमिक कत्र्तव्य है जिसे हर सूरत में राष्ट्रधर्म की तरह निभाना ही होगा।  केवल राजनीतिक आरोपबाजी ही काफी नहीं बल्कि किसानों के लिए कुछ करके दिखाना होगा। आज की तारीख में यह केवल किसानों की मांग नहीं बल्कि वक्त की मांग है और इस मामले में सरकार की जवाबदेही भी बनती है तथा मध्य प्रदेश शासन को देर-सबेर इसका जवाब भी देना होगा। याद रखना होगा कि भाजपा शासित राज्यों का प्रतिबिम्ब केंद्र सरकार पर पड़ता है और इसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है, जहां आपके कार्यों का हिसाब-किताब जनता देख रही होती है।

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