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राजस्थान में 3 दिन का खेल!

राजस्थान का राजनीतिक नाटक अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां से बागी कांग्रेसी युवा नेता सचिन पायलट उल्टा मुड़ सकते हैं और मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत चौकड़ी भर सकते हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय ने सचिन के बागी 19 विधायकों की उस याचिका पर फैसला 24 जुलाई तक सुरक्षित रख लिया है जिसमें विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उन्हें दिये गये नोटिस की वैधता को चुनौती दी गई थी। स्वतन्त्र भारत के न्यायिक इतिहास में यह पहला मामला है जब किसी विधानसभा अध्यक्ष के सदन के सदस्यों को दिये गये प्राथमिक नोटिस की वैधता को चैलेंज किया गया हो मगर इस फैसले से इतना तो हुआ है कि बागी पायलट गुट को तीन दिन तक का समय और मिल गया है क्योंकि फैसला सुरक्षित रखते हुए उच्च न्यायालय ने अध्यक्ष महोदय से अनुरोध किया है कि वह नोटिस से आगे की कार्रवाई 24 जुलाई तक न करें। इसे अध्यक्ष सी.पी. जोशी ने स्वीकार करके लोकतान्त्रिक नैतिकता का उच्च मानदंड स्थापित किया है मगर इससे राजस्थान में चल रही सचिन व गहलोत गुटों के बीच की राजनीतिक स्पर्धा का कोई लेना-देना नहीं है। दोनों समूहों के बीच परिस्थितियां तब तक नहीं बदल सकतीं जब तक उच्च न्यायालय के फैसले का खुलासा न हो।

 उच्च न्यायालय के विद्वान न्यायाधीशों ने परोक्ष रूप से एक बात साफ कर दी है कि वे अध्यक्ष के कार्य क्षेत्र में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने 24 जुलाई तक अपना फैसला स्थगित करने का उन्हें आदेश या निर्देश नहीं दिया है बल्कि प्रार्थना या दरख्वास्त की है। अब देखना यह होगा कि इन तीन दिनों में राज्य की राजनीति क्या रंग बदलती है। एक बात और स्पष्ट हो जानी चाहिए कि सचिन गुट के द्वारा लगातार गुहार लगाने पर कि वह अभी भी कांग्रेस में हैं और उसके सदस्यों ने किसी प्रकार का पार्टी अनुशासन भंग नहीं किया है, गहलोत सरकार बाजाब्ता तौर पर बहुमत की सरकार है और उसके अल्पमत में आने का तब तक कोई सवाल ही पैदा नहीं होता जब तक कि सचिन गुट के बागी विधायक यह ऐलान न कर दें कि उन्होंने कांग्रेस छोड़ कर अपना अलग गुट बना लिया है लेकिन तब तक सचिन पायलट कांग्रेस के भीतर ही बगावत को और हवा देने की कार्रवाई करने के लिए भी स्वतन्त्र रहेंगे और श्री गहलोत भी इसके विपरीत उनके गुट को कमजोर बनाने के तरीके निकालने में मशगूल हो सकते हैं लेकिन इतना तय है कि युवा सचिन ने राजस्थान में लोकतन्त्र की मर्यादा को तार-तार कर डाला है। ऐसा उन्होंने केवल निजी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए किया है अथवा अपने अहम् को सन्तुष्ट करने के लिए किया है इसका अनुमान उन्हें ही होगा मगर इतना निश्चित है उनके इसे कृत्य से कांग्रेस पार्टी को भारी नुकसान हुआ है और कांग्रेस के भीतर मौजूद युवा पीढ़ी को भी उन्होंने सन्देहास्पद बना डाला है। 

इसे हम राजनीतिक त्रासदी तक कह सकते हैं क्योंकि स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद सचिन पायलट ऐसे दूसरे नेता हैं जो कांग्रेस के भीतर रहते हुए ही कांग्रेस नेतृत्व को खुली चुनौती दे रहे हैं मगर इसमें उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता भी दिखाई दे रही है क्योंकि उन्हें खुद से ज्यादा राज्य के विपक्षी दल पर भरोसा है जिसका इजहार उनकी कार्यप्रणाली कर रही है। बिना शक राजनीति में आने वाले हर व्यक्ति का ध्येय ऊंचे से ऊंचे पद पर पहुंचना होना चाहिए मगर यह कार्य अपनी क्षमता और सामर्थ्य को देख कर ही किया जा सकता है और इस तरह किया जा सकता है कि वही डाल न कट जाये जिस पर आदमी खुद बैठा हुआ होता है। राजनीतिज्ञ की पहली नजर जनमत की तरफ होती है।  2018 में राजस्थान की जनता ने कांग्रेस पार्टी को जनादेश दिया था किसी पायलट या गहलोत को नहीं।

संसदीय लोकतन्त्र में मुख्यमन्त्री बनने की अपनी लोकतान्त्रिक प्रणाली होती है, इस पर प्रत्येक महत्वाकांक्षी व्यक्ति को खरा उतरना पड़ता है। मध्य प्रदेश में कांग्रेसी नेता श्री दिग्विजय सिंह अपेक्षाकृत युवावस्था  में ही जब 1998 में पहली बार मुख्यमन्त्री बने थे तो विधानमंडल दल में उनके और स्व. श्यामाचरण शुक्ल के बीच बाकायदा मतदान हुआ था जिसमें श्री सिंह विजयी रहे थे जबकि श्री शुक्ल मध्य प्रदेश के निर्माता स्व. पं. रविशंकर शुक्ल के वारिस थे और पहले भी मुख्यमन्त्री रह चुके थे।

लोकतन्त्र बहुमत के नियम से चलता है और इस नियम के तहत श्री अशोक गहलोत राजस्थान विधानमंडल दल के सर्वमान्य नेता साबित रहे, इसके बावजूद सचिन बाबू को उपमुख्यमन्त्री पद मिला जो कांग्रेस में नई पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य की तरफ इशारा करता था परन्तु अब हालत यह हो गई है कि सचिन पायलट 18 विधायकों के समर्थन भर से ही क्रान्ति करने की चाह पाल रहे हैं। निश्चित तौर पर इसका मतलब राजनीति में ‘कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना’ ही निकलता है लेकिन हकीकत यह है कि इन तीन दिनों के भीतर दोनों गुट यदि अपने-अपने समर्थक विधायकों को लेकर बैठे रहते हैं तो राजस्थान की उस महान परंपरा का ही उपहास  होगा जिसमें राजपूत पीठ पर वार करने को सबसे बड़ा अपमानजनक समझते हैं। अतः जब सचिन पायलट कांग्रेस में ही हैं तो उन्हें अपने समर्थकों को अपनी पार्टी के अन्य विधायकों से मिलने की आजादी देनी चाहिए और श्री गहलोत को भी अपने समर्थकों को उनसे मिलने की छूट देनी चाहिए मगर खेल तो यह चल रहा है कि 

‘‘मत पूछ क्या हाल है तेरा मेरे पीछे 

तू देख क्या रंग है तेरा मेरे आगे।’’