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अफगान शांति वार्ता और भारत

पिछले दशक में भारत अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत  को लेकर अनिच्छुक था लेकिन अब भारत दोनों पक्षों से बातचीत कर रहा है। एक अति रूढ़िवादी सुन्नी आंदोलन तालिबान नेतृत्व बोलन दर्रे के क्वेटा में स्थित है और इसके उपनेता सिराजुद्दीन हक्कानी अपने नेटवर्क का नेतृत्व करते हैं। तालिबान नेता मुल्ला हैबतुल्ला एक मौलवी हैं और हक्कानी विद्रोही समूह का दाहिना हाथ है। दोहा में आयोजित इंट्रा अफगान डायलॉग में भाग लेकर भारत ने अफगानिस्तान के सभी पक्षों से बात करने की इच्छा जाहिर कर दी थी। अफगान शांति वार्ता में भारत की भागीदारी अब काबुल तक सीमित नहीं बल्कि भारत अफगा​न शांति और सुलह प्रक्रिया में एक वैध हितधारक है। भारत की नीति में परिवर्तन के दो बड़े कारण हैं। ऐसा करके भारत काबुल में शांति स्थापना  में अपना योगदान देगा, साथ ही दूसरी तरफ वह सुनिश्चित करना चाहता है कि अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल भारत के खिलाफ गतिविधियों के लिए न हो। भारत इस बात को समझता है कि अमेरिका 19 वर्षों के बाद अफगानिस्तान से निकलने की तैयारी में है और इस बात को लेकर चिंतित है कि अमेरिकी सैनिकों के काबुल से जाने के बाद हिंसा में वृद्धि हो सकती है। चुनाव के बाद केवल 4700 सैनिक ही रह जाएंगे। इसलिए सभी पक्षों से संवाद का रास्ता ही अच्छा है। भारत अफगानिस्तान में शांति स्थापना का हमेशा पक्षधर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अफगान शांति वार्ताकार अब्दुल्ला अब्दुल्ला से मुलाकात की और यह आश्वासन दिया कि भारत लगातार अफगानिस्तान का समर्थन करता रहेगा। अफगानिस्तान से भारत के हित जुड़े हुए हंै।  भारत ने अफगानिस्तान में पुन​निर्माण गतिविधियों में दो अरब डालर से भी ज्यादा का निवेश किया हुआ है। फरवरी में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद भारत उभरती राजनीतिक स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है।

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी का वादा कर रखा है। वर्ष 2001 के बाद से अफगानिस्तान में अमेरिका के करीब 2400 सैनिक मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अमेरिका की पराजय के लिए काम किया है और हक्कानी नेटवर्क का इस्तेमाल भारतीय ठिकानों पर हमले के लिए किया। अब अमेरिकी सैनिकों की वापसी से पाकिस्तान भी घबराया हुआ है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अन्तर्राष्ट्रीय सैनिकों की वापसी को लेकर आगाह करते हुए कहा है कि जल्दबाजी में कोई कदम न उठाया जाए। अमेरिका समेत अन्य नाटो देश अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की पूरी तरह वापसी की योजना पर काम कर रहे हैं। अफगानिस्तान में ऐसी परिस्थितियों को सृजित किया जाना बहुत जरूरी है ताकि कई अन्य देशों में रह रहे अफगानिस्तान के शरणार्थी नागरिक सम्मान के साथ देश लौट सकें।

19 वर्ष से चले आ रहे गृह युद्ध के कारण अफगानिस्तान जर्जर हो चुका था और भारत ने अफगानिस्तान की काफी मदद की। भारत ने अफगानिस्तान की संसद, सड़कों, बांधों और पुलों  का निर्माण कराया। भारत-अफगानिस्तान संबंध काफी प्रगाढ़ हुए। दरअसल अफगानिस्तान दक्षिण एशिया में भारत का अहम साथी है। 1980 के दशक में भारत-अफगान संबंधों को एक नई पहचान मिली। 1990 के अफगान गृह युद्ध और वहां तालिबान के सत्ता में आ जाने के बाद दोनों देशों के संबंध कमजोर होते गए। जब 2001 में तालिबान सत्ता से बाहर हो गया तो इसके बाद अफगानिस्तान के लिए भारत मानवीय और पुननिर्र्माण सहायता का सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रदाता बन गया है। मौजूदा वक्त में अफगानिस्तान में सबसे अधिक लोकप्रिय देश भारत को माना जाता है। भारत जानता है कि अफगानिस्तान में उसकी भूमिका को कम करने की नीति पर पाकिस्तान लम्बे समय से काम कर रहा है इसलिए पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए सार्क की बजाय विमस्टैक, इंडियन ओशियन रिम एसोसिएशन जैसे समूहों पर भारत ने ध्यान केन्द्रित किया। अफगानिस्तान में पाकिस्तान का स्थाई एजैंडा वहां अपनी सामरिक पहुंच बनाना है, उसी प्रकार भारत का लक्ष्य भी स्पष्ट है कि अफगानिस्तान के विकास में लगे करोड़ों डालर व्यर्थ न जाने पाएं। इसीलिए भारत ने अपनी कूटनीति में बदलाव किया है। अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया में भारत को और सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है। अगर अफगानिस्तान की सेना कमजोर पड़ती है और तालिबान प्रभावी हो जाता है तो सुरक्षा का मामला बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगी। भारत वहां अपनी सेना भेजकर वहां की जनता के बीच किसी आशंका को जन्म नहीं देना चाहता। यह हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में वहां सेना भेजी जाए। समझौते के तहत सरकार में तालिबान की भूमिका तय की जा सकती है। भारत को कोई भी कदम सोच-समझ कर ही उठाना होगा।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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