अफस्पा मुक्त मेघालय


केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने मेघालय में विवादास्पद आर्म्ड फोर्स स्पैशल पावर्स एक्ट (अफस्पा) को पूरी तरह हटा लिया है जबकि अरुणाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों से इस एक्ट को हटा दिया गया है। इस कानून के तहत सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार मिलते हैं। सितम्बर 2017 तक मेघालय के 40 फीसदी क्षेत्र में अफस्पा लागू था। वर्षों से इस एक्ट को हटाने की मांग चल रही है। इस एक्ट को लेकर काफी विवाद रहा है और इसके दुरुपयोग के आरोप अक्सर सुरक्षा बलों पर लगते रहे हैं।

अफस्पा का सैक्शन चार सुरक्षा बलों को किसी भी परिसर की तलाशी लेने और बिना वारंट किसी को गिरफ्तार करने का अधिकार देता है। इसके तहत उपद्रवग्रस्त इलाकों में सुरक्षा बल किसी भी स्तर तक शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। संदेह होने पर किसी की गाड़ी रोकने, तलाशी लेने और उसे सीज करने का अधिकार होता है। यदि कोई कानून तोड़ता है आैर अशांति फैलाता है तो सशस्त्र बल का विशेष अधिकारी आरोपी की मृत्यु हो जाने तक बल का प्रयोग कर सकता है।

अफस्पा को एक सितम्बर, 1958 को असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल, मिजोरम और नागालैंड सहित भारत के उत्तर-पूर्व में लागू किया गया था। इन राज्यों के समूह को Seven Sisters यानी सात बहनों के नाम से जाना जाता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही इन राज्यों में अलगाववादी भावनाओं के चलते ​हिंसा होनी शुरू हो गई थी। सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों में ​हिंसा रोकने के लिए अफस्पा को लागू किया था। मई, 2015 में त्रिपुरा में कानून-व्यवस्था की स्थिति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद अफस्पा को हटाया जा चुका है जबकि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में यह लागू है। इस कानून का विरोध करने वालों में मणिपुर की कार्यकर्ता इरोम शर्मिला का नाम प्रमुख है,

जिसने इस कानून के खिलाफ 16 वर्ष तक उपवास किया। उनके विरोध की शुरूआत सुरक्षा बलों की कार्यवाही में कुछ निर्दोष लोगों के मारे जाने की घटना से हुई। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर नवीनतम पिल्लईे ने 23 मार्च 2009 को इस कानून के खिलाफ जबरदस्त आवाज उठाई थी और देश के अनेक मानवाधिकार संगठन इसे पूरी तरह बंद करने की मांग करते आ रहे हैं।

राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों के बीच भी अफस्पा एक विवाद का मुद्दा रहा है। मणिपुर में अफस्पा को लेकर जस्टिस संतोष हेगड़े और जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी गठित की गई थी, जिसने अपनी रिपोर्ट में इस कानून को दोषपूर्ण बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2013 में राज्य में मुठभेड़ के 6 मामलों को लेकर फैसला सुनाया था, फैसले में सभी मुठभेड़ाें को फर्जी बताया गया था।

सेना का तर्क है कि आतंकवाद का सामना करने के लिए उसे विशेष अधिकारों की जरूरत है। इनके बिना वह आतंकवाद का सामना नहीं कर सकती। आप सेना के हाथ बांध कर सुरक्षा की उम्मीद नहीं कर सकते। जब त्रिपुरा से अफस्पा हटाया गया था तो यह बात स्पष्ट हो गई थी कि अगर राज्य सरकार मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय दे आैैर कानून-व्यवस्था अच्छी तरह कायम हो तो अफस्पा हटाया जा सकता है। इसलिए राज्य सरकारों को ईमानदार कोशिश करनी होगी।

त्रिपुरा में 1997 में अफस्पा तब लगाया गया था जब राज्य में विरोधी गुट नैशनल लिबरेशन फ्रंट आफ त्रिपुरा और अन्य अलगाववादी संगठन काफी सक्रिय थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि सशस्त्र बलों के लिए आतंकवाद से जूझना काफी बड़ी चुनौती है लेकिन अपवाद स्वरूप ऐसी घटनाएं भी सामने आती रही हैं जिसमें सशस्त्र बलों द्वारा मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन पाया गया।

मानवाधिकार संगठन क्षेत्रीय जनता द्वारा सेना पर लगाए गए मर्डर, रेप और जबरन वसूली के आरोपों को सिविल कानून के दायरे में रखने की मांग करते रहे हैं लेकिन ऐसा कदम भी घातक होगा, इससे सेना पर झूठे आरोप गढ़े जाएंगे। वैसे पिछले चार वर्षों में पूर्वोत्तर में उग्रवाद से संबंधित घटनाओं में 63 फीसदी की गिरावट देखी गई है। 2017 में नागरिकों की मौत में 83 फीसदी और सुरक्षा बलों के हताहत होने के आंकड़ों में 40 फीसदी की कमी आई है। वर्ष 2000 से तुलना की जाए तो 2017 में पूर्वोत्तर में उग्रवाद संबंधी घटनाओं में 85 फीसदी की कमी देखी गई है, वहीं 1997 की तुलना में जवानों की मौत का आंकड़ा भी 96 फीसदी तक कम हुआ है।

पूर्वोत्तर के लिए यह एक अच्छा संकेत है। मेघालय से अफस्पा को पूरी तरह हटाया जाना और अरुणाचल से आ​ंशिक रूप से हटाया जाना राज्यों के विकास के लिए सकारात्मक कदम है। असम में अब भाजपा की सरकार है और वह राज्य के विकास की ओर पूरा ध्यान दे रही है, केन्द्र भी पूर्वोत्तर में विकास की नई परियोजनाएं शुरू कर चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि असम से भी अफस्पा हटा लिया जाएगा।

आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश के कुछ हिस्सों में अफस्पा का इस्तेमाल इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि राज्यों का पुलिस बल हिंसा से निपटने में सक्षम नहीं बन पाया। अफस्पा जम्मू-कश्मीर में भी लागू है, लेकिन वहां स्थितियां ऐसी नहीं हैं कि अफस्पा को हटाया जाए। भारतीय सेना दुनिया में सबसे ज्यादा अनुशासित है। उनकी शहादतों के बल पर ही देशवासियों का मनोबल बना हुआ है। जम्मू-कश्मीर से अफस्पा का हटाया जाना, वहां की स्थितियों पर निर्भर करेगा फिलहाल जो अभी संभव दिखाई नहीं देता।