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संपादकीय

फिर छिड़ी बात चुनाव आयोग की!

लोकसभा चुनाव के चार चरण पूरे होने के बाद सबसे बड़ा संकट चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का खड़ा हो गया है। स्वतन्त्रता के बाद अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों को सम्पन्न कराने वाली देश की स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था के मामले में यह असाधारण स्थिति है जिसमें उसकी निष्पक्षता को विरोधी दल कांग्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे दी है। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ जब चुनाव प्रक्रिया के चलते उस दौरान चुनाव आयोग के कार्यकलाप पर गंभीर सवाल खड़ा किया गया हो। यह बेहद ही चिन्ता का विषय है क्योंकि भारत का चुनाव आयोग पूरी दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है मगर सबसे बड़ा सवाल भारत के उस प्रजातन्त्र का है जिसकी नींव ही स्वतन्त्र व निष्पक्ष चुनाव आयोग की निर्भीक भूमिका पर पड़ी हुई है।

यह व्यवस्था बहुत गहन चिन्तन-मनन के बाद हमारे उन पुरखों ने हमें सौंपी थी जिन्होंने अपना खून-पसीना देकर इस देश को अंग्रेजों से आजाद कराकर संसदीय लोकतन्त्र को अपनाते हुए कहा था कि इस प्रणाली के तहत भारत के मुफलिस से मुफलिस और धनाढ्य से धनाढ्य व्यक्ति का राजनैतिक अधिकार एक बराबर का होगा और इसकी निगरानी चुनाव आयोग इस प्रकार करेगा कि बड़े से बड़े पद पर बैठे व्यक्ति और जनता के बीच से उठकर चुनाव लड़ने वाले किसी प्रत्याशी के बीच कोई भेदभाव नहीं होगा और दोनों के लिए ही बराबरी का वातावरण उपलब्ध कराना संवैधानिक जिम्मेदारी होगी परन्तु लगता है कि वर्तमान 17वीं लोकसभा चुनावों में वे सभी मान्यताएं और मर्यादाएं बुरी तरह टूट रही हैं जिनकी बुनियाद पर भारत का महान लोकतन्त्र टिका हुआ है।

राजनैतिक दल इस कदर बाजारूपन की भाषा और आचार-विचार पर उतर आये हैं कि स्वयं मतदाता भी सोच में पड़ रहा है कि क्या इन्हीं लोगों को वोट देना उसकी किस्मत में लिखा है ? परन्तु यह अचानक नहीं हुआ है। पिछले पांच सालों के दौरान जिस प्रकार संसद की कार्यवाही चली और उसे सत्ताधारी दल से लेकर विपक्षी दलों तक ने किसी बाजार का चौराहा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, उसी से अन्दाजा लगाया जा सकता था कि अगली लोकसभा के चयन में किस-किस तरह की बाजीगरी और सर्कसबाजी हो सकती थी मगर हद तो तब हो गई जब भोपाल से ताल ठोककर एक ऐसी महिला को चुनावों में उतारा गया जिसके ऊपर आतंकवाद फैलाने का गंभीर आरोप है लेकिन इन्हीं चुनावों में यह भी मुद्दा बनाया जा रहा है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में किसी प्रकार की कोताही नहीं करेगा।

इतना ही नहीं बल्कि उस महिला की मार्फत आतंकवाद को हिन्दू और मुसलमान में बांटा जा रहा है और इसके नाम पर वोट तक मांगने की हिमाकत की जा रही है। सवाल यह है कि जब चुनाव आयोग अमर्यादित और साम्प्रदायिक आधार पर लोगों को बांटने की मंशा से दिये गये बयानों का संज्ञान लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ और बसपा की नेता सुश्री मायावती को सजा सुना सकता है तो अपने ही पुराने फैसलों का अनुपालन अन्य नेताओं के बयानों पर क्यों नहीं कर सकता ? उसकी निगाह में सब बराबर हैं।

भारत का संविधान उसे अधिकार देता है कि वह सत्ता के सर्वोच्च राजनैतिक शिखर पर बैठे हुए व्यक्ति से लेकर साधारण राजनैतिक कार्यकर्ता तक को एक ही तराजू पर रखकर तोले। चुनावों के दौरान तो मुख्य चुनाव आयुक्त को हर दृष्टि और हर कोण से अपनी निष्पक्षता और निर्भयता व स्वतन्त्रता का सबूत देना इसलिए और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि उसके किसी पक्ष में जरा भी झुकने के सन्देह पर ही समूची चुनाव प्रक्रिया पर ही प्रश्न चिन्ह लगाने का रास्ता खुल जायेगा। यदि मुन्सिफ पर ही सन्देह पैदा हो जाये तो मुकद्दमे का फैसला क्या खाक होगा ? असली सवाल यही है जिस पर मुख्य चुनाव आयुक्त श्री सुनील अरोड़ा को पूरी तरह तटस्थ रहते हुए प्रत्येक राजनैतिक दल की शिकायतों को सुनना है और तुरन्त फैसला देना है। चुनाव आचार संहिता से जुड़ी शिकायतों को चुनाव आयोग लटका भी नहीं सकता है क्योंकि उनका सम्बन्ध ही चालू चुनाव प्रक्रिया से होता है। आयोग को हर शिकायत पर दूध का दूध और पानी का पानी इस प्रकार करना होता है जिससे चुनावी प्रक्रिया प्रदूषित न हो सके।

चुनाव आयोग के लिए राजनैतिक दलों की हैसियत सत्ताधारी और विपक्षी दलों की नहीं होती बल्कि राजनीति के मैदान में विभिन्न खिलाड़ियों की तरह होती है जिनमें से कोई भी खेल के नियम तोड़ने पर सजा का हकदार होता है। हैसियत देखकर सजा सुनाने का काम चुनाव आयोग का नहीं है बल्कि नियम तोड़ने के अनुसार सजा देना है। तभी तो भारत का लोकतन्त्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहा जाता है जिसमें सिर्फ कानून का राज ही चलता है। यह कानून या संविधान ही तो चुनाव आयोग को अधिकार देता है कि वह चुनावों के समय हर सरकार को इस तरह प्रशासनिक कार्यों से उदासीन बना दे कि हर तरफ उसका ही आदेश मान्य हो। अपने आप में यही सबूत है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सत्ता का इकबाल कितना पवित्र और बा-बुलन्द संविधान में रखा गया है।

इस बुलन्दी से गिरने का मतलब होगा भारत की बुलन्दी को पशेमां करना। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए पहले भी चुनाव आयोग को निर्देश दिया था और अब पुनः वह उसके खिलाफ की गई शिकायत का संज्ञान ले रहा है लेकिन इस विवाद के चलते यह ध्यान भी रखना होगा कि सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनावों में पड़े मतों की गिनती 23 मई को होगी और तब तक ईवीएम मशीनों की सुरक्षा की गारंटी भी पूरी तरह चुनाव आयोग को ही करनी है हालांकि इन मशीनों के कामकाज को लेकर भी भारी विवाद बदस्तूर जारी है। इनमें एक प्रतिशत खराबी की बात तो स्वयं ही चुनाव आयोग स्वीकार करता है जो पूरी तरह संविधान के उस प्रावधान के खिलाफ है जिसमें सख्त हिदायत है कि अंतिम वोट तक को गिनकर ही चुनावी फैसला होगा। अतः जरूरी है कि इन मशीनों के साथ लगी रसीदी वोटों की मशीन ‘वीवीपैट’ में पड़े मतों को गिनकर ही चुनाव परिणाम घोषित किये जायें। इसका स्वागत सबसे पहले सत्ताधारी पार्टी को ही आगे बढ़कर करना चाहिए क्योंकि इससे ही जनमत को प्रतिष्ठा मिलेगी।