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अमेरिका फिर बचाव को आया ?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह कहना कि भारत जल्दी ही पाकिस्तान के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई करना चाहता है, आशंका पैदा करता है कि अमेरिका पुनः पाकिस्तान की मदद के लिए आगे आना चाहता है। पाकिस्तान के वजूद में आने के बाद से अब तक पाकिस्तान को अगर किसी मुल्क ने भारत के खिलाफ मजबूत बनाने की कोशिश की है तो वह अमेरिका ही है जिसने कभी फौजी मदद और कभी आतंकवाद समाप्त करने के नाम पर पाकिस्तान को अरबों डालर की इमदाद दी है।

हकीकत यह भी है कि अफगानिस्तान में रूस का दबदबा कम करने के लिए ही अमेरिका ने इस देश में स्वयं तालिबानी संगठन खड़े किये और उन्हें पालने-पोसने के लिए पाकिस्तान की जमकर इमदाद की और जब ये तालिबान ही उसके लिए खतरा हो गये तो उसने इन्हें समाप्त करने के लिए फिर से पाकिस्तान काे मदद दी। इस बार यह मदद आतंकवाद को खत्म करने के नाम पर दी गई मगर इस सिलसिले में दहशतगर्दी का विस्तार अफगानिस्तान से लेकर भारत तक इस तरह फैला कि वह जम्मू-कश्मीर फिर से इसकी जद में आ गया जिसे 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद शिमला समझौते के तहत केवल बातचीत की मेज पर सुलझाने का वादा खुद पाकिस्तान ने किया था और तौबा की थी कि वह अब भारत के किसी भी मामले में टांग नहीं अड़ायेगा मगर इसके बाद जिस नवोदित देश बांग्लादेश में जिस तरह फौजी हुकूमत इस मुल्क के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान के पूरे परिवार की हत्या कराकर काबिज की गई और उसके बाद पाकिस्तान में फौजी हुक्मरान जनरल जिया-उल-हक ने तख्ता पलट करके खुद को मुख्तार-ए-मुल्क घोषित करके पीपुल्स पार्टी के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी के तख्ते पर लटकाया उसने उस भारतीय उपमहाद्वीप की सियासत को एक बार फिर पलट दिया जिसे इंदिरा गांधी ने अपनी दूरदृष्टि के मजबूत इरादे से इस तरह बदल दिया था कि खुद को दुनिया की महाशक्ति कहने वाले देश इस उपमहाद्वीप से दूर रहें और हिन्द महासागर तक को शान्ति क्षेत्र के रूप में देखें लेकिन इस दौरान भारत में भी भारी उथल-पुथल हुई और 1977 में यहां स्व. मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार काबिज हो गई जिसने पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों को सुधारने की कथित शुरूआत की।

ये कोशिशें कैसी थीं इसका ब्यौरा आज तक भारत की जनता के सामने नहीं आ सका मगर जो आया वह यह था कि बाद में मोरारजी देसाई को पाकिस्तान के हुक्मरान जनरल जिया-उल-हक ने अपने देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से नवाजा मगर हकीकत यह है कि 1980 में जब इंदिरा गांधी पुनः नई दिल्ली की कुर्सी पर बैठीं तो उनके सामने यह रहस्य उजागर हुआ कि पाकिस्तान चोरी-छुपे परमाणु बम बनाने की तैयारी कर रहा है। 1983 में उन्होंने अपने खुफिया विभाग से इस बारे में तफ्सील से पूरी जानकारी लेकर इसका तोड़ निकालने की तजवीज ढूंढनी भी शुरू कर दी थी, मगर 1984 में उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद भारतीय उपमहाद्वीप की सियासत को पलटने में पाकिस्तान ने अमेरिका की गोद में बैठकर अफगानिस्तान के बहाने दहशतगर्दी को इस तरह विस्तार देना शुरू किया कि कश्मीर इसकी जद में आता चला गया मगर यह सब कुछ हुआ अमेरिका की इमदाद के दम पर ही। अतः यह साफ होना चाहिए कि भारत-पाक मामले में अमेरिका का हर दांव भारत को दबाव में रखने का ही है, इसके अलावा और कुछ नहीं। यदि ऐसा न होता तो वह अब तक पाकिस्तान के साथ हुए हर युद्ध में पाकिस्तान के साथ आकर खड़ा न होता और उसे अपने आधिकतम शस्त्रों से लैस न करता जिसमें एफ-16 और एफ-18 युद्धक विमान तक शामिल हैं।

यह भी हकीकत है कि पाकिस्तान अमेरिकी पेटन टैंकों से लेकर हर आयुध सामग्री का इस्तेमाल भारत के खिलाफ ही करता आया है अतः मौजूदा दौर में आतंकवाद के विरुद्ध पाक को अपना सहयोगी बनाये रखने की उसकी रणनीति केवल दिखावा है और यही भारत के लिए चिन्ता का विषय है क्योंकि भारत की विदेश नीति में जो बदलाव आया है वह अमेरिका के हितों को इस तरह साध रहा है कि हम चीन के मुखालिफ नजर आते हुए अपनी सरहदों की सुरक्षा में ही उलझे रहें जबकि उसने पाकिस्तान को अपना नया सहयोगी बना लिया है और वह धड़ल्ले से हमारे ही कश्मीर के दबाये हुए हिस्से में पाकिस्तान के साथ मिलकर विकास योजनाएं ‘सी पैक’ चला रहा है। अमेरिका ने इस्लामी दुनिया के अमीर मुल्कों को भी सऊदी अरब की मार्फत अपनी गिरफ्त में इस तरह लिया हुआ है कि उनका पाकिस्तान के प्रति नजरिया वही हो जो वह चाहता है। इस सन्दर्भ में डोनाल्ड ट्रम्प का पिछले दिनों यह कहना बहुत मायने रखता है कि ‘सऊदी अरब का शाही परिवार दो सप्ताह भी उसकी हिमायत के बिना गद्दी पर नहीं रह सकता’ दरअसल यह ऐलान है कि दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी मुल्क उसके हुक्म का गुलाम है। अतः उसकी विदेश नीति भी अमेरिका के हितों से टकराव लेने की जुर्रत नहीं कर सकती लेकिन अमेरिका की सबसे बड़ी फितरत यह है कि वह जिस देश में भी घुसता है उसकी आन्तरिक राजनीति में भी अपनी गोटियां इस तरह बिछाता है कि उसमें सामाजिक अराजकता का माहौल इस तरह पैदा हो कि लोकतन्त्र में उसकी हुक्का बरदारी करने वाला तानाशाह पैदा हो और अधिनायकवादी तन्त्र में उसकी गुलामी करने वाला अधकचरा लोकतन्त्र काबिज हो जिससे उसके आर्थिक हित हर हालत में सधे रहें। इसका उदाहरण इराक और ईरान के अलावा लैटिन अमेरिकी देश व पूर्वी यूरोपीय देश हैं। एशियाई और अफ्रीकी देशों में तो वह सीधे हुकूमत की ताकतों का इंतखाब करता नजर आता है।

पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जहां की फौज अमेरिका के रहमो-करम से ही खड़ी हुई है। इसलिए जरूरी है कि हम डोनाल्ड ट्रम्प के वक्तव्य के मायने गहराई से समझें और आतंकवाद के खिलाफ उसकी मु​िहम का वह मतलब समझें जिसमें पाकिस्तान उसका सहयोगी है। क्या यह बताना पड़ेगा कि राष्ट्र संघ मंे अभी तक केवल अमेरिका की वजह से ही आतंकवादी की सही परिभाषा तय नहीं हो पा रही है? जरा कोई पूछे कि अभी तक अमेरिका ने भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स देशों (एनएसजी) का सदस्य बनाये जाने के लिए भारत से किये अपने वादे को कितना निभाया है ? 26 नवम्बर 2008 के मुम्बई हमले के बाद ही भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर में चालू आतंकवादी शिविरों का नक्शा उसे भेज दिया था, मगर अमेरिका इसके बाद भी पाक को दहशतगर्दी के खिलाफ अपना सहयोगी बनाये घूमता रहा?