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संपादकीय

अमित शाह का तीर निशाने पर

इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया में जब कुदरती खूबसूरती की बात की जाए तो कश्मीर का नाम आता है और जब इसके साथ जम्मू शब्द जोड़ दिया जाता है तो भारतीय लोकतंत्र में सियासत होने लगती है। जम्मू भी पहाड़ी इलाका है लेकिन सियासत में इसे मैदान और कश्मीर को घाटी कह कर हिंदू और मुसलमान के रूप में लकीरें खींच दी जाती हैं। नए गृहमंत्री के रूप में अमित शाह ने लोकसभा में अपनी बात रखते हुए जब वहां छह महीने के लिए राष्ट्रपति शासन बढ़ाने का प्रस्ताव रखा तो हंगामा होना ही था। हंगामे की वजह जो भी रही हो लेकिन अमित शाह ने साफ कह दिया कि कश्मीर समस्या के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू जिम्मेदार हैं। 

अब हम अपनी बात पर आते हैं कि कश्मीर में धारा 370 को लेकर अमित शाह ने ऑन दा रिकार्ड यह कहा है कि एक राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए जम्मू-कश्मीर में जो धारा 370 लगाई गई है वह स्थाई  नहीं बल्कि अस्थाई है। सब जानते हैं कि पंडित नेहरू इस धारा को लगवाने के लिए डटे रहे लेकिन अमित शाह का यह कहना कि धर्म के नाम पर देश का बंटवारा नहीं किया जाना चाहिए और यह नेहरू की भूल थी। जिस गलती से एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में है। सचमुच अमित शाह कश्मीर को लेकर बहुत संवेदनशील हैं वे सचमुच देश की भावनाओं को समझते हैं। आने वाले दिनों में इस 370 को और इसके दुरुपयोग से कैसे आतंकवाद पनपा इस मामले में बहुत कुछ घटित होने वाला है।  अमित शाह ने साफ कहा कि देश में कश्मीर, कश्मीरीयत और इंसानियत की जरूरत है। 

अगर उस दिन लोकसभा में जिन लोगों ने अमित शाह का यह रूप देखा होता और उनकी बातोंं को रूबरू सुना होता तो लोग उनके मुरीद हो जाते लेकिन उनकी बातों का असर देखिए कि अगले ही दिन सुर्खियों में इसी 370 को लेकर पंडित नेहरू पर उनके पलटवार का चर्चा पूरे देश में था। एक बार फिर से धारा 370 हटाए जाने की मांग पूरे देश में अगर बुलंद हो रही है तो हम यही कहेंगे कि जन भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। सच्ची राष्ट्रीयता और सच्ची भारतीयता और सच्चा हिंदूवाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह और अब श्री अमित शाह ने उसी पंक्ति पर आगे बढ़ते हुए लोगों की भावनाओं का सम्मान किया है। उन्होंने कश्मीर घाटी में बढ़ते आतंकवाद की चिंता की और आतंकवाद को अपने से जोड़कर सियासत करने वाले नेताओं को चुनौती भी दी। 

इसीलिए अमित शाह ने साफ कहा कि अगर चुनाव आयोग तारीख दे दे तो हम जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने को तैयार हैं। उन्होंने हैरानी जताई कि राजनीतिक पार्टियां कश्मीर घाटी में पंचायत चुनावों तक का विरोध कर रही हैं। वह कांग्रेस हो या नेशनल कांफ्रेंस सब यही चाहते हैं कि कश्मीर घाटी में राष्ट्रपति शासन न बढे़। दरअसल चुनावों का बायकाट करना ये कहां की सियासत हुई लेकिन विपक्ष डर पैदा करके देश को टुकड़े-टुकड़े करना चाहता है कश्मीर में विपक्ष की यही साजिश है। विपक्ष की मंशा जो भी रही हो परंतु आतंकवादी उनका साथ जरूर देते हैं।  अमित शाह ने साफ कहा कि आर्टिकल 356 का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस ने सियासी लाभ उठाया और चुनी हुई सरकारों को चुन-चुन कर गिराया। उन्होंने आंकड़े भी गिनवा दिये और कहा कि 132 में से 93 बार तो कांग्रेस के जमाने में ही केंद्र ने सरकारें गिराई। उन्होंने कांग्रेस नेतृव को याद दिलाया कि यह स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी का सपना था कि पंचायत चुनाव कराये जायें लेकिन इसी कांग्रेस की सरकारों ने कश्मीरियों को पंचायत का प्रमुख नहीं चुनने दिया। 

इतिहास गवाह है कि कश्मीर घाटी में जमायते इस्लामी हो या जेकेएलएफ ये लोग वर्षों से किस आजादी की बात कर रहे हैं इन्हें पाकिस्तानी चैनलों ने पूरी कवरेज दी। इन देश विरोधियों को वहां पर सुरक्षा किसने दी और इन आतंकवादी संगठनों पर आज तक बैन क्यों नहीं लगाया गया। सचमुच ये सवाल देश पूछ रहा है। आतंकवाद और पाकिस्तान के अलावा घाटी में वे पत्थरबाज जिन्हें राजनीतिक लोग अपनी ढाल बनाते हैं आखिरकार भारत में इन्हें कैसे प्रमोट किया जा रहा है इन सवालों का जवाब देश मांग रहा है। घाटी में जिस तरह से पत्थरबाजों को ट्रेनिंग मिली, सेना बीएसएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के अलावा सीआरपीएफ ने जिस तरह लोगों की खातिर उनके अमन चैन के लिए कुर्बानियां दी और जब इनका बदला आतंकवादियों से लिया गया तो सवाल क्यों खड़े किये जाते हैं। 

ये बातें भाजपा के साथ-साथ आज की तारीख में देश उठा रहा है तो बताओ इसमें गलत क्या है? समय आ गया है कि आतंकवादियों को जवाब देना होगा। जम्मू-कश्मीर में प्रधानमंत्री मोदी जी जैसा कुशल नेतृत्व सेना को फ्री हैंड दे रहा है। श्री अमित शाह 370 को लेकर देशवासियों की भावनाओं का सम्मान कर रहे  हैं तो फिर सवाल खड़े करने वालों की सियासती मंशा भी जाहिर हो जाती है। आओ इससे ऊपर उठकर भारतीयता, राष्ट्रीयता और कर्त्तव्यपरायणता के साथ चलें जिसका संकल्प अमित शाह ने लिया है।