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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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‘अमिट’ हैं अमित शाह के इरादे...

जब एक देश संवैधानिक रूप से स्थापित हुआ हो तो स्वाभाविक है कि उसके हर राज्य में एक ही विधान होगा। उसकी संस्कृति, उसकी भाषा अलग हो सकती है परंतु भारतीय संस्कृति की पहचान अनेकता में एकता के रूप में ही तो बनी हुई है। इस सतरंगी भारतीय संस्कृति का परचम पूरी दुनिया में लहराता है। ऐसे में अगर कोई यह सवाल उठाए कि विदेशियों को और विदेशी भी वह जो अवैध रूप से भारत में घुस गए हों यानि कि जिन्हें घुसपैठिये कहा जाता हो, उन्हें हम अपना नागरिक कैसे मान सकते हैं। 

इस एनआरसी अर्थात नेशनल रजिस्टर ऑफ कैपिटल को लेकर हमारे गृहमंत्री अमित शाह अगर पूरे देश में एनआरसी असम की तर्ज पर लागू करने जा रहे हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। उनका यह कहना कि देश में अगर कोई बाैद्ध, सिख, जैन, ईसाई या पारसी शरणार्थी हमारे यहां वैध तरीके से रह रहा है तो उसे भारतीय नागरिकता मिलनी चाहिए। सब जानते हैं कि असम में श्री अमित शाह ने वोटों की राजनीति करने वाली पार्टियों और नेताओं को बेनकाब किया था। देश का बहुसंख्यक हिंदू अल्पसंख्यक बन जाए तो यह बात कौन बर्दाश्त करेगा। 

प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी श्री अमित शाह के इस चट्टानी विचार की प्रशंसा करते हुए कहा है कि किसी विदेशी धर्म के लोग इस एनआरसी को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम से ऊपर उठकर यह मानें कि यह एक प्रक्रिया है और पूरा हिंदुस्तान इस एनआरसी में शामिल होगा। श्री अमित शाह ने बराबर समय-समय पर एनआरसी में धर्म विशेष के आधार पर भेदभाव न होने की बात कही है और दो दिन पहले राज्यसभा में दृढ़ता के साथ यह भी कहा है कि ऐसा कोई प्रावधान इस एनआरसी में नहीं है कि जिसके आधार पर धर्म का नाम लेकर किसी को इसमें शामिल न किया जाये। 

यह सच है क्योंकि भारत दुनिया का एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है तो इसलिए यहां किसी को कुछ भी कहने की स्वतंत्रता है। हालत तो यहां तक है कि अनेक सांसद लोग जो अलग-अलग पार्टियों से हैं, वे लोकसभा और राज्यसभा तक में अपना विरोध जताने के लिए माननीय स्पीकर के आसन के पास तक पहुंच जाते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक दृष्टिकोण से पार्टियां अपना नफा-नुकसान समझती हैं। इसे लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने झंडा बुलंद कर रखा है कि वह अपने बंगाल में एनआरसी लागू नहीं होने देंगी। 

अब एनआरसी जो कि पूरे देश में लागू की जा रही है तो किसी एक राज्य को इससे तकलीफ क्यों हो रही है, यह बात समझ से बाहर है। किसी की नागरिकता छीन कर कोई किसी को शरणार्थी नहीं बना सकता। सच बात तो यह है कि अब बंगाल में भी वह स्थिति मुस्लिम आबादी को लेकर बनने लगी है जो कभी असम में थी जहां हिंदू बहुसंख्यक वोटों के अंकगणित में अल्पसंख्यक होने लगे थे। राजनीतिक विश्लेषक इसे किस नजरिये से लेते हैं यह हम नहीं कहते लेकिन हम अमित शाह जी की इस विचारधारा के कट्टर समर्थक हैं कि देश में एक देश, एक विधान और हिंदुस्तानीयत अर्थात भारतीयता होनी चाहिए। 

देश में रहने वाला नागरिक भारतीय पहले कहलाए तब कहीं जाकर वह अपने धर्म की बात सोचेे। यहां एक और बात स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अगर असम में अनेक ऐसे लोग जो देश के नागरिक नहीं हैं चाहे वह रोहिंग्या हों या अन्य घुसपैठिये, उनके दस्तावेज चैक करने की गारंटी भी गृहमंत्री ने दी है। इस कड़ी में हमें अमरीका से भी सावधान रहना होगा जो कि असम के लोगों को लेकर अपने अंतर्राष्ट्रीय अमरीकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के माध्यम से प्रचार करवा रहा है कि असम में कई लाख लोग नागरिकता खोने जा रहे हैं। हमारा मानना है कि अगर कभी आजादी के बाद गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल ने जिस भारतीयता की पहचान स्थापित की थी तो हमें भी उस एजेंडे पर ही चलना है। 

यह राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि एक सच्ची कर्त्तव्यपरायणता है जिसे मोदी सरकार के नेतृत्व में नए गृहमंत्री श्री अमित शाह निभा रहे हैं। हमें इस पर नाज है, उनकी भारतीयता, उनके एनआरसी और भारतीय नागरिकता पर नाज है। अमित जी मेरी लेखनी आपकी इस विचारधारा को नमन करती है।