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अशरफ गनी की ताजा अपील

अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति श्री अशरफ गनी ने संयुक्त अरब अमीरात में शरण लेने के बाद अबू धाबी से जो अपने सन्देश का विडियो प्रसारित किया है उसमें अपने देशवासियों को आश्वस्त किया है कि वह वापस स्वदेश आ सकते हैं बशर्ते परिस्थितियां सामान्य होने की ओर अग्रसरित हों। श्री गनी ने यह भी साफ किया है कि उनका देश छोड़ कर जाना इसलिए जरूरी था जिससे काबुल समेत देश के अन्य भागों में खून-खराबा न हो सके और उनका देश यमन या सीरिया की तरह न बन सके, क्योंकि उनके काबुल में काबिज रहने की वजह से तालिबान कत्लोगारत का बाजार गर्म कर सकते थे। उन्होंने यह भी साफ किया कि वह अपने साथ कोई रोकड़ा या खजाना लेकर नहीं आये हैं बल्कि सिर्फ दो कपड़े में आये हैं।  इसके साथ ही उन्होंने उम्मीद जाहिर की है कि अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति श्री हामिद करजई व उनकी सरकार में  जिम्मेदार औहदे पर रहे अब्दुल्ला-अब्दुल्ला जिस तरह तालिबान सरगनाओं से बातचीत कर रहे हैं उसमें उन्हें कुछ रोशनी दिखाई पड़ रही है। 

श्री गनी के इस सन्देश का सीधा मतलब है कि उन्हें अपने देशवासियों से अपेक्षा है कि वे तालिबानों के सामने खुला समर्पण नहीं करेंगे और अपने देश में कानून के राज और सुचारू व्यवस्था को तरजीह देंगे। हालांकि तालिबान फिलहाल यही दिखा रहे हैं कि उन्होंने इस मुल्क के सारे निजाम को अपने कब्जे में ले लिया है मगर आज 19 अगस्त के दिन काबुल समेत देश के अन्य कुछ इलाकों से जो खबरें मिली हैं उनके अनुसार तालिबानों की बरजोरी का स्थानीय नागरिक विरोध भी कर रहे हैं और तालिबानी तख्ता पलट को स्वीकार नहीं करते हैं। इसका सीधा-सीधा मतलब यह निकलता है कि अफगानी नागरिक तालीबानी हुक्मरानी को गैर कानूनी मानते हैं और अपने देश की तरक्की के लिए अवरोध समझते हैं। मगर इसके समानान्तर यह भी स्पष्ट है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान छोड़ने से पहले खुद ही तालिबानों के लिए खुला मैदान छोड़ा । यह इस तरह भी समझा जा सकता है कि जब पिछले महीने श्री गनी अफगानी राष्ट्रपति के तौर पर अमेरिका यात्रा पर गये थे तो अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने उनसे भेंट तक करना गंवारा नहीं किया था। इससे साफ है कि अमेरिका व तालिबान के बीच ऐसी समझ कायम हो चुकी थी कि अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद अफगानिस्तान की वैधानिक सरकार की कोई हैसियत नहीं रहेगी। मगर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि तालिबान के बारे में रूस और चीन क्या रुख अपनाते हैं। 

जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो वह पिछले 20 साल से तालीबानी इस्लामी जेहाद को खत्म करने के नाम पर अमेरिका का सहयोगी बन कर खूब वित्तीय मदद लेता रहा है और अफगानी शरणार्थियों के नाम पर तालिबानियों की पीठ भी सहलाता रहा है। आम अफगानी पाकिस्तान का विरोध इसी वजह से करता रहा है कि वह इस्लाम के नाम पर अफगानिस्तान को आतंकवाद की फसल उगाने का मुकाम बनाता रहा है। तालिबानियों ने जिस तरह जलालाबाद से लेकर अफगानिस्तान के कुछ अन्य शहरों में आधुनिक सोच के लोगों पर आतंक बरपाना शुरू किया है उससे साफ है कि इन लोगों की जहनियत में कोई अन्तर नहीं आया है और ये इस मुल्क को सैकड़ों साल पीछे ही ले जाना चाहते हैं। दरअसल पिछले बीस सालों में अफगानी समाज विशेषकर शहरी समाज में बहुत परिवर्तन आया है और यहां महिलाओं को पढ़ने-लिखने व काम करने की छूट प्राप्त हुई है। तालिबानी जहनियत इसे स्वीकार नहीं करती है और वह दिखावे के तौर पर खुद को उदार बताने की नाकाम कोशिश कर रही है। 19 अगस्त अफगानिस्तान का स्वतन्त्रता दिवस होता है जिसे यहां के लोग खुशी-खुशी मनाते चले आ रहे हैं। जब इस दिन आम शहरियों का अपना राष्ट्रीय झंडा तक फहराने से तालिबानियों को परेशानी हो रही है तो उनकी भविष्य की योजनाओं को समझा जा सकता है। इसी वजह से ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि तालिबानों की बातों को सुन कर नहीं बल्कि उनके कामों को देख कर वह कोई फैसला लेंगे।  कनाडा और यूरोपीय संघ ने साफ कर दिया है कि वे तालिबान प्रशासन को मान्यता नहीं देंगे। 

असली सवाल यह है कि तालिबान ने अफगानिस्तान की चुनी हुई वैध सरकार को उखाड़ा है तो उसे मान्यता का क्या आधार होना चाहिए? असल सवाल यह है कि केवल अपने हित साधने के लिए अमेरिका ने इस मुल्क को अराजकता की आग में झोंकने का फैसला किया है। उसके इस कदम के पीछे पूरी दुनिया आंख बन्द करके क्यों खड़ी रहे। इसी वजह से संभवतः ब्रिटेन ने जी-7 देशों की बैठक बुलाने की मांग की है जिससे अफगान समस्या पर विस्तृत विचार किया जा सके। सोचने वाली बात यह है कि 21वीं सदी की विज्ञान से संचालित दुनिया किस तरह किसी एक मुल्क में ऐसे लोगों की हुकूमत बर्दाश्त कर सकती है जिनका ईमान इंसानियत न होकर दरिन्दगी हो।  तालिबानों का 1996 से लेकर 2001 तक के शासन को क्या दुनिया भूल सकती है जब पूरे अफगानिस्तान में औरतों को किसी ‘चीज’ में तबदील कर दिया गया था और उन्हें अपने घरों की चारदीवारी में किसी जानवर की तरह रहने को मजबूर किया गया था। सिर्फ चार दिन हुए नहीं कि तालिबानों ने काबुल शहर के बाजारों में औरतों के लगे पोस्टरों पर पुताई करनी शुरू कर दी है। 

भारत को याद रखना होगा कि अफगानिस्तान वह मुल्क है जहां सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ 1914 में राजा महेन्द्र प्रताप की ‘आरजी हिन्द हुकूमत’ की नींव रखी गई थी।  अभी अफगानिस्तान की पुरानी पीढ़ी के लोग राजा महेन्द्र प्रताप के नाम से वाकिफ हैं। अगर उस समय अंग्रेजों के खिलाफ चला खिलाफत आन्दोलन असफल न होता और प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की फतेह न हुई होती तो अफगानिस्तान से ही भारत की आजादी का परचम लहराया होता। राजा महेन्द्र प्रताप की सरकार को दुनिया के बहुत से इस्लामी देशों ने उस समय मान्यता भी प्रदान कर दी थी। अतः अफगानी नागरिक तालिबानों के दुःशासनी प्रशासन को बिना संघर्ष के स्वीकार लेंगे, यह आसानी से संभव नहीं है। इस देश के कुछ राज्यों से बगावत की खबरें मिलनी भी शुरू हो गई हैं।