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सिमटते नक्सलवाद की जड़ों पर प्रहार

देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बने नक्सलवाद से निपटने के लिए केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों ने समन्वित तरीके से प्रयास किए हैं जिसके चलते नक्सलवाद सिमटता नजर आ रहा है। राज्य सरकारों ने हिंसा का अधिक प्रभावशाली ढंग से उत्तर भी दिया है ताकि एक स्पष्ट संदेश जाए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में हुई मुठभेड़ में पुलिस ने उनको करारा जवाब दिया है। मारे गए 26 नक्सलियों में 50 लाख का इनामी नक्सली मिलिंद तेलतुंबडे भी शामिल है। मिलिंद भीमा कोरेगांव मामले में आरोपी था और फरार चल रहा था। मारे गए नक्सलियों में कुछ तो बहुत गंभीर अपराधों में वांछित थे। मिलिंद तेलतुंबडे की पहचान खूंखार नक्सली के तौर पर थी। वह नई भर्तियों की वारदातों को अंजाम देने के लिए गुरिल्ला ट्रेनिंग देता था। पुलिस के सी-60 कमांडो ने नक्सलियों की घेराबंदी रणनीतिक तरीके से की थी तभी उन्हें इतनी बड़ी सफलता मिली है। यद्यपि मुठभेड़ में चार जवान भी घायल हुए लेकिन खाकी कमांडो भारी पड़े। नक्सलियों के खिलाफ हाल का यह सबसे बड़ा आप्रेशन है।

नक्सलवाद विभत्स इसलिए है क्योंकि घात लगाकर सैन्य बलों पर हमले करना और उनकी निर्मम हत्यायें करना ही उनका मकसद रह गया है। इस वर्ष छत्तीसगढ़ और बीजापुर में हुए नक्सली हमलों से यह बात एक बार फिर साबित हो चुकी है ​कि पांच दशक से भी ज्यादा समय बीतने के बावजूद इसके मूल सिद्धान्त में कोई परिवर्तन नहीं आ पाया है। राज्य सरकारों द्वारा नक्सलियों के विरुद्ध अभियान चलाये जाने से नक्सलियों का प्रभाव कम हो रहा है। पहले 11 राज्यों के 90 जिले नक्सलवाद की चपेट में थे तो वहीं अब 46 जिले प्रभावित हैं। कई बड़े नेता मारे गए हैं या पकड़े जा चुके हैं। कई नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं। जब किसी की जमीन सिमटती है या छिनती है तो वह छटपटाता है। यही हालत नक्सलियों की है। हताश नक्सली समय-समय पर अपनी शक्ति को एकत्रित कर छटपटाहट में हमले करते हैं। जब-जब नक्सलियों ने प्रतिघात किया तो सुरक्षा बलों का पलटवार भी बहुत जबरदस्त होता है। सुरक्षा बलों ने अनेक नक्सलियों को मौत के घाट उतार अपने साथियों की मौत का प्रतिशोध लिया है। नक्सली प्रभावित इलाकों में नक्सली विरोधी अभियान में जुटे पुलिस कमांडो, कोबरा कमांडो और अन्य बलों के जवानों के हौंसले काफी बुलंद हैं।

भारत में नक्सली हिंसा की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलवाड़ी नामक गांव से हुई थी। जमींदारों द्वारा किए जा रहे छोटे किसानों के उत्पीड़न पर अंकुश लगाने को लेकर सत्ता के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और कन्हाई चटर्जी द्वारा शुरू किए गए इस सशक्त आंदोलन को नक्सलवाद का नाम दिया गया। यह आंदोलन चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग की नीतियों का अनुगामी था, इसलिए इसे माओवाद भी कहा जाता है। आंदोलनकारियों का मानना था कि भारतीय मजदूरों और किसानों की दुर्दशा के लिए सरकार नीतियां जिम्मेदार हैं। अब तक जिन कारणों को नक्सलवाद के समर्थक गिनाते हैं उसका अब नक्सलवाद से कोई संबंध नहीं। नक्सली आंदोलन से सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों द्वारा तर्क दिया जाता है ​कि सरकारों के विकास मॉडल ने आदिवासियों से जल, जंगल और जमीन छीन लिया। वंचितों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। आदिवासियों को न केवल उनके जीने के लिए जरूरी प्राकृतिक संसाधनों से वंचित किया गया बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान समाप्त करने के लिए विवश किया गया तो उन्होंने बंदूकें थाम ली। सवाल यह है कि नक्सली अगर अपने ​अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं तो फिर उन्हें जवानों और निर्दोषों की हत्यायें क्यों की। क्यों उन्होंने स्कूल, अस्पताल व सड़क आदि तबाह किए। 

सत्ता के सामने यह प्रश्न भी आया कि क्या भटके हुए लोगों के विरुद्ध सेना का इस्तेमाल किया जाये या नहीं। नक्सलवाद के ​विरोद्ध ‘सलमा जुडुम’ जैसा प्रतिरोध भी सामने आया था, ​जिसका विरोध बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों द्वारा किया गया। कभी-कभी तो नक्सलियों का तालिबानी रूप भी सामने आया। जन अदालतें लगाकर लोगों के अंग काटे गए, कई बार तो सिर भी काटे गए। अपहरण कर फिरौती वसूलना, निर्माण कार्यों में लगे ठेकेदारों से धन वसूलना इनका स्वभाव बन गया। अब नक्सलवाद एक प्रवृति के रूप में मौजूद है। अब राज्य सरकारें समन्वय के साथ काम कर रही हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ​विकास की योजनाएं पहुंच रही हैं। आदिवासियों की सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने के लिए राज्य सरकारें काफी काम कर रही हैं। आदिवासी अब मुख्यधार से जुड़ भी रहे हैं। कई क्षेत्रों में हिंसा से उनका मोह भंग हुआ है। आत्मसमर्पण करने वालों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था की जा रही है। जो बचे-खुचे नक्सली हैं जो कि आतंकवादी ही हैं, उन पर जड़ से प्रहार करना भी जरूरी है।