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बोरिस जॉनसन की भारत यात्रा

लम्बे इंतजार के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोेरिस जॉनसन भारत यात्रा पर आए हैं। अहमदाबाद पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। प्रधानमंत्री बनने के बाद जॉनसन का यह पहला अहम भारत दौरा है। उन्हें पिछले वर्ष भारत के गणतंत्र ​दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया था लेकिन कोविड-19 महामारी के चलते भारत यात्रा रद्द कर दी गई थी। तब भारत यात्रा करने की बजाय बोरिस जॉनसन और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आनलाइन बातचीत करना ही उचित समझा। ब्रिटिश प्रधानमंत्री की भारत यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब रूस-यूक्रेन युद्ध चरम पर है। जॉनसन की भारत यात्रा का मकसद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना और रक्षा और व्यापार के क्षेत्र में अपने संबंधों को और आगे ले जाना है। 

जॉनसन की यात्रा भारत-​ब्रिटेन गतिशील संबंधों का सबूत है। अंग्रेजों ने भारत पर 200 वर्ष तक राज किया। व्यापार के नाम पर भारत आए अंग्रेजों ने सबसे पहले व्यापारिक लेन-देन शुरू किया था, इसके बाद वे यहां की शासन प्रणाली का  हिस्सा बन गए थे। कभी पूरी दुनिया में अंग्रेजों की हकूमत थी। केवल दुनिया के 22 देश ही ऐसे थे जिन  पर अंग्रेज हमला नहीं कर पाए थे। तब कहा जाता था कि ब्रिटेन में सूर्य कभी नहीं डूबता क्योंकि अगर ब्रिटेन में सूर्य ढलता था तो उनकी हकूमत वाले दूसरे देश में सूर्य उग जाता था। लगभग सौ देशों पर ब्रिटिश शासन रहा लेकिन समय के साथ-साथ देश स्वतंत्र होते गए। ​ब्रिटेन सिमटता ही चला गया, अब वह शक्तिशाली नहीं रहा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने गुटनिरपेक्षता और गैर उपनिवेशवादी अवधारणा की वकालत की, जबकि ​ब्रिटेन ने शीत युद्ध के दौरान अमेरिका के साथ गठबंधन किया। इस प्रकार शुरू में भारत और ब्रिटेन राजनीतिक और वैचारिक रूप से एक-दूसरे के विपरीत सिरे थे। द्विपक्षीय रूप से भारत-​ब्रिटेन संबंध 1965 के भारत-पाक युद्ध तक अच्छे रहे परन्तु युद्ध के बाद पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति भरे रवैये के कारण संबंधों में ​गिरावट आती रही। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भारत-ब्रिटेन संबंधों में सकारात्मक बदलाव आए और  तब से संबंधों का नया युग शुरू हुआ। वर्ष 2004 में दोनों देशों ने सामरिक भागीदारी समझौते पर हस्ताक्षर किए  थे। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता सम्भालने के बाद 2015 में उन्होंने तीन दिवसीय ​ब्रिटेन यात्रा की थी। इस दौरान सुरक्षा चिंताओं को दूर करने के लिए रक्षा और अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा संधि पर सहमति व्यक्त की गई थी। ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन पर सहयोग बढ़ा। 2016 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा ने भारत का दौरान किया था। आज की वैश्विक राजनीति में बहुत बड़े-बड़े बदलाव आ चुके हैं। आपसी संबंधों का महत्व काफी बढ़ गया है। इस बात को महसूस किया गया कि अगर मिलकर काम करेंगे तो सभी के हित बेहतर और प्रभावी ढंग से साधे जा सकेंगे। अकेले कोई डफली नहीं बजा सकता। इसलिए धुर विरोधी देश एक-दूसरे से तालमेल कायम कर रहे हैं और व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं। 

ब्रिटेन 1973 में यूरोपीय इकोनोमिक  क्म्युनिटी में शामिल हुआ था लेकिन कुछ वर्षों बाद ​ब्रिटेन में यूरोपीय यूनियन में शामिल होने का विरोध शुरू हो गया था। ब्रिटेन ने महसूस किया कि यूराेपीय यूनियन के देश ब्रिटेन से फायदा उठा रहे हैं। जबकि ब्रिटेन पर शर्तें लादी जाती हैं। घटनाक्रम में ऐसे बदलाव हुए कि जनमत संग्रह के बाद ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन से बाहर जाने का मार्ग प्रशस्त हो गया। जनवरी 2020 में ब्रिटिश संसद और यूरोपीय यूनियन की संसद ने ब्रेक्जिट समझौते की अनुमति दी। इसके बाद भारत-ब्रिटेन संबंधों पर व्यापक ​प्रभाव पड़ना तय था। ब्रिटेन को भारत के साथ व्यापारिक संबंधों और अन्य साझेदारी विकसित करने की जरूरत महसूस हुई।

भारत ब्रिटेन का महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार भी बन गया। कोरोना महामारी के दौरान भी दोनों देशों में अभूतपूर्व सहयोग देखा गया। भारत ब्रिटेन को वस्त्र, मशीनरी, उपकरण, पैट्रोलियम और चमड़े के उत्पादों का निर्यात करता है। भारतीय मूल के कई नागरिक ब्रिटेन की संसद के सदस्य हैं। अप्रवासी भारतीय वहां के संविधान और संस्कृति को आत्मसात कर ब्रिटेन के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं। बोरिस जॉनसन की प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान इस बात की सम्भावना कम है कि वह रूस को लेकर भारत को कोई नसीहत दे। रूस से अपने संबंधों काे लेकर अपनी स्थिति दो टूक स्पष्ट कर चुका है। दोनों नेताओं में विज्ञान स्वास्थ्य एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निवेश  पर बातचीत होगी। दरअसल ब्रिटेन भारत का बड़ा व्यापारिक साझीदार बनना चाहता है और बोरिस जॉनसन से निवेश की घोषणा की उम्मीद है। रक्षा के क्षेत्र में साझेदारी के अलावा जॉनसन मुक्त व्यापार समझौते पर भी चर्चा करेंगे। ब्रिटेन 2035 तक भारत से व्यापार 36.5 अरब डालर से भी बढ़ाना चाहता है। भारत इस समय एक प्रमुख आर्थिक शक्ति है और ब्रिटेन को इस समय भारत की जरूरत है। इससे ब्रिटेन को बम्पर फायदा ही होगा। ब्रिटेन मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में भारत को चीन के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखता है। ऐसे में व्यापारिक संतुलन बनाने और व्यापार को बढ़ाने के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री की यात्रा की काफी अहमियत है। उम्मीद है कि दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध बदलती दुनिया में नए आयाम स्थापित करेंगे।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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