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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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घर में ही मनाएं छठ पर्व

दिल्ली उच्च न्यायालय ने राजधानी दिल्ली में छठ पर्व सार्वजनिक स्थलों पर सामूहिक रूप से मनाने की स्वीकृति न देते हुए साफ कर दिया है कि धार्मिक या सांस्कृतिक समारोह भी “जान है तो जहान है” की परिधि में ही बन्धे हुए हैं।  विद्वान न्यायाधीशों ने स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली सरकार ने इस बाबत जो आदेश दिया है उसमें हस्तक्षेप करने का उसका कोई इरादा नहीं है। कोरोना संक्रमण के चलते ही दिल्ली की सरकार ने आदेश जारी किया था कि इस बार छठ पर्व के आयोजन नदियों या तालाबों अथवा पोखरों पर सामूहिक रूप से नहीं मनाया जा सकेगा और सभी नागरिक घरों में रह कर इस पर्व को मनायें जिससे कोरोना का संकट और ज्यादा भयावह न हो सके। सरकार का यह फैसला पूरी तरह तार्किक और सामयिक था मगर इसके बावजूद कुछ लोगों ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना बेहतर समझा। अब वहां से भी उन्हें वही जवाब मिला जो दिल्ली सरकार का आदेश था तो स्थिति साफ हो गई कि धार्मिक पर्वों के मामलों में भी कोरोना से बेपरवाह होने की कोई जरूरत नहीं है।

 गौर से देखा जाये तो स्वयं नागरिकों को ही इस बारे में आगे आकर वैज्ञानिक सोच के साथ पर्वों को मनाने की पैरवी करनी चाहिए, परन्तु कुछ लोग एेसे मौकों पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते और अनावश्यक रूप से लकीर के फकीर बने रहने की मुहीम चलाते हैं। छठ पर्व पूर्वांचल व बिहार के लोगों का बहुत बड़ा पर्व होता है जिसकी प्रतीक्षा साल भर से की जाती है परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि लोगों की जान को जोखिम में डाल कर परंपरा निभाने के नाम पर अंधविश्वासी बना जाये। कोई भी पर्व के लिए सबसे पहले स्वस्थ होना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि भारतीय संस्कृति में पर्वों का सम्बन्ध जिस प्रकार प्रकृति से है वह स्वयं में स्वास्थ्य की प्रदाता मानी जाती है। बेशक धार्मिक मान्यताएं स्वरूप बदल कर प्रस्तुत की जाती हों मगर अन्ततः प्रकृति से ही सभी पर्वों की छठा बिखरती है।

 छठ पर्व में जिस प्रकार जल से लेकर पुष्प व फलों आदि का अर्चन होता है वह मनुष्य के साल भर तक हरा-भरा व स्वस्थ रहने की कामना ही होती है। अतः पर्वों के मूल को समझने की भी जरूरत है।  राजधानी दिल्ली में जिस तरह कोरोना का संकट पूरे देश की तुलना में सर्वाधिक गहरा रहा है उसे देखते हुए राज्य की सरकार का फैसला वक्त की मांग थी। क्योंकि लोकतन्त्र में किसी भी चुनी हुई सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में से एक जिम्मेदारी लोगों के स्वास्थ्य की भी होती है। इस जिम्मेदारी से कोई भी सरकार यह कह कर पीछा नहीं छुड़ा सकती है कि लोगों की धार्मिक भावनाएं देखते हुए उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से समझौता करने के लिए मजबूर होना पड़ा। अभी हाल ही में हमने देखा कि किस प्रकार दीपावली पर पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आतिशबाजी और पटाखेबाजी पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था। इसका आदेश पर्यावरण पंचाट या एनजीटी ने दिया था। हालांकि कुछ शरारती तत्व समाज में एेसे जरूर होते हैं जो ऐसे प्रतिबन्धों का उल्लंघन करने में अपनी शान समझते हैं मगर कमोबेश रूप से इस आदेश का पालन हुआ और आतिशबाजी बहुत कम हुई।

 लोकतन्त्र में हर फैसले के उल्लंघन को दंडनीय बनाना भी जायज इसलिए नहीं होता है क्योंकि पर्वों के सांस्कृतिक स्वरूप को देखते हुए नई पीढ़ी उच्छशृंखलता की ओर भी बढ़ जाती है जिसे अपराध की श्रेणी में रखना मानवीय दृष्टि से गैर जरूरी लगता है। मगर सभ्य व समझदार नागरिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे नई पीढि़यों को उच्छशृंखल बनने से रोकें। अतः दीपावली को इको फ्रेंडली तरीके से मनाने के निर्णय का असर राजधानी के आसपास के राज्यों पर भी पड़ा और वहां इस बार पटाखे खुले बाजारों में धड़ल्ले से बिकते नहीं देखे गये हालांकि उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों या कस्बों में इसका असर बहुत कम देखने को मिला। अब छठ पर्व मनाते हुए हमें यह ध्यान रखना होगा कि कोरोना की वजह से सबसे ज्यादा काल कवलित लोगों की संख्या दिल्ली में ही है  और सबसे ज्यादा मरीज भी इस क्षेत्र से आ रहे हैं। छठ पूजा पर जल स्नान की जो परंपरा है और जिस प्रकार सामूहिक रूप से शारीरिक दूरी का ध्यान इस पर्व में नहीं रहता है उसे देखते हुए तो कोरोना संक्रमण की संभावनाएं कई गुना बढ़ जाती हैं। सबसे ज्यादा छोटे बच्चों की चिन्ता हर मां-बाप को रहती है क्योंकि किसी उत्सव या पर्व के अवसर पर उन्हें नियन्त्रित करना खासा टेढ़ा काम होता है जबकि उनकी बाल सुलभ क्रीड़ाएं हर मां- बाप को बहुत सुहाती हैं। अतः छठ पर्व अपने घर में मना कर ही हम स्वयं को और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकते हैं। इस छठ पर्व पर सभी को कामना करनी चाहिए कि उनके परिवार के लिए आने वाला वर्ष मंगलमय हो और छठी मैया सभी को स्वस्थ व सम्पन्न रखें।