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चीन और चाणक्य नीति?

भारत के ज्ञात लिखित इतिहास के अभी तक के सबसे महान मनीषी अर्थशास्त्री और राजनैतिक विचारक आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थ शास्त्र में लिखा कि राजा को अपनी प्रजा से उसी प्रकार शुल्क या कर आदि वसूलना चाहिए जिस प्रकार ‘मधु मक्खियां फूलों से पराग लेकर शहद बनाती हैं और छत्ते का निर्माण करती हैं।’ आचार्य ने किसी भी देश की सामरिक सुरक्षा के बारे में भी बहुत महत्वपूर्ण विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि ‘किसी भी राजा की सेना के सैनिकों में लेशमात्र भी असन्तोष नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही आचार्य लिखते हैं कि राजा को अपने पड़ोसी देश के साथ कभी भी असावधान नहीं होना चाहिए और उसकी प्रशंसा में भक्तिभाव के लिए लेशमात्र भी स्थान नहीं होना चाहिए। पड़ोेसी से स्नेह जरूर होना चाहिए मगर बीच में स्पष्ट दीवार खींच कर।’ दो हजार वर्ष पूर्व से भी पहले लिखा हुआ यह सिद्धान्त हर समय-काल में सटीक बैठता है। इसके साथ ही आचार्य लिखते हैं कि राजा को ‘पड़ोसी देश की शक्ति और कमजोरी दोनों से ही भलीभांति परिचित रहना चाहिए।’ 

आज भारत में जो माहौल है वह हमें आगाह करता है कि हम चाणक्य नीति का एक बार पुनः अध्ययन करें और अपनी अर्थ व्यवस्था से लेकर सामरिक क्षमता का बिना किसी लाग- लपेट के आंकलन करते हुए स्वयं को सामर्थ्यवान बनायें। पड़ोसी चीन जिस तरह भारतीय भू-भाग को छोटे-छोटे टुकड़ों में निगलने की बिसात बिछा रहा है, उसका एकमुश्त तरीके से  पूरी एकजुटता के साथ मुकाबला करें। कुछ वर्षों पहले तक भाजपा और कांग्रेस के विभिन्न नेता संसद से लेकर सड़क तक चीन की आर्थिक तरक्की के लिए प्रशंसा के पुल बांधा करते थे। इसकी वजह सिर्फ यह अज्ञानता थी कि चीन एक कम्युनिस्ट तानाशाही व्यवस्था वाला देश है और हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र कहलाते हैं। 

हम पूरी प्रशासनिक पारदर्शिता में इस तरह यकीन रखते हैं कि जब 1962 में चीन के साथ ही युद्ध के दौरान उसकी सेनाएं हमारी छाती पर चढ़ रही थीं तो तब विपक्षी पार्टी जनसंघ के नेता स्व. अटल बिहारी वाजपेयी इस मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन करने लगे थे कि संसद का सत्र बुला कर तुरन्त सीमा की स्थिति पर चर्चा की जाये और दूसरे विपक्ष के नेता आचार्य कृपलानी जो आजादी के वर्ष 1947 में स्वयं कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे, मांग कर रहे थे कि तत्कालीन नेहरू सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव रखा जाये। 

दोनों मांगें पूरी हुईं, तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू पर जमकर चारों तरफ से आक्रमण हुआ और उन्हें अपने रक्षामन्त्री स्व. वी.के. कृष्णा मेनन का इस्तीफा लेना पड़ा। निश्चित रूप से वर्तमान हालात ऐसे नहीं हैं कि दोनों देश युद्ध में उलझे हों मगर इतना जरूर है कि चीन ठीक वैसे ही व्यवहार कर रहा है जैसा उसने 1962 का युद्ध शुरू करने से पहले किया था। वह भारत की सीमा के भीतर घुस कर अपना अतिक्रमण करने की फिराक में हैं।

 आचार्य चाणक्य ‘कौटिल्य के अर्थशास्त्र’ में लिखते हैं कि यदि कोई पड़ोसी देश का राजा राज्य की सीमाओं पर अपना बल दिखाने का प्रयास करे तो युद्ध नीति का प्रयोग करके उसके ही किसी दूसरे इलाके को कब्जा लेना चाहिए और कूटनीतिक रास्तों का प्रयोग करके उसे वार्ता के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। जहां तक अर्थ शास्त्र का सवाल है तो स्पष्ट है कि पैट्रोल-डीजल की कीमतें कोरोना के प्रकोप काल में बढ़ने से हो सकता है लोगों में बेचैनी इस वजह से कम हो कि उनका पूरा ध्यान फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर है परन्तु पैट्रोल की आधी कीमत के रूप में शुल्क वसूल कर सरकार अपने शासन धर्म का पालन नहीं कर रही है। 

 समूची अर्थव्यवस्था के मन्दी में जाने के डर से वाणिज्य क्षेत्र में जो भय का माहौल बना हुआ है उसे कुछ कम्पनियों के शेयरों में आ रही तेजी से निरस्त नहीं किया जा सकता बल्कि यह इस बात का सबूत है कि वित्तीय निवेशक भारतीयों की मुफलिसी का जश्न मना रहे हैं। बाजार में नकद रोकड़ा की भारी कमी है जिसकी वजह से माल के उठाने से लेकर उत्पादन की गति ऋणात्मक दर्जे  में घूम रही है  फिर भी भारत के लोग इस हकीकत को नजरअन्दाज केवल चीन को करारा सबक सिखाने की इच्छा से कर रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत में इसी मुद्दे पर सत्ता व विपक्ष की राजनीति लगातार तेज हो रही है। 

यह स्वाभाविक है कि भारत के महान लोकतन्त्र की स्थापित परंपराओं को देखते हुए विपक्ष को सरकार से जायज सवाल पूछने का अधिकार है और सरकार पर पारदर्शी होकर सीमाओं की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय एकता व अखंडता को अक्षुण्य रखने की जिम्मेदारी हर मन्त्री कुर्सी पर बैठने से पहले ही उठाता है। उसकी यह जिम्मेदारी ही आम जनता में सरकार का इकबाल बुलन्द रखती है। 

लोकतन्त्र लोकलज्जा से इसीलिए चलता है कि इसमें प्रशासनिक जानकारियों पर पर्दा नहीं पड़ा रह सकता जबकि चीन की व्यवस्था इसके एकदम उलट है। अतः चीन से अभिप्रेरित होने के लिए भारत के पास कभी कोई कारण रहा ही नहीं। 1962 से लेकर आज तक उसकी धींगामस्ती हमें तो बार-बार सावधान करती रही कि हम अपनी सीमाओं की रक्षा में जरा भी कोताही न आने दें। 

इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2017 में हुआ डोकलाम विवाद था जहां लगातार 73 दिन तक दोनों देशों की सेनाएं आमने- सामने रहीं और तब जाकर चीन ने वह तिराहा खाली किया जो भूटान-चीन व भारत की सीमाएं जोड़ता था और जिस पर संविधानतः भूटान का अधिकार था।  इसके बावजूद चीन ने इस तिराहे के पास ही अब भारी सैनिक ढांचा खड़ा कर लिया है।  उसकी बदनीयती से तो हम वाकिफ हो ही चुके थे। अतः कूटनीति के अस्त्र तो हमें तब से ही चलाने चाहिएं थे लेकिन हम इस विवाद में उलझ रहे हैं। 

कांग्रेस के चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से क्या सम्बन्ध  हैं और भाजपा ने क्यों लगातार 2007 से लेकर अब तक छह बार चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ सम्बन्ध स्थापित किये और क्यों बार-बार प्रतिनिधिमंडलों का आदान-प्रदान किया। आखिरकार चीन से हम सीखंेगे क्या? चीन को तो हमें सिखाना है कि खुली और उदार तथा जवाबदेह लोकतान्त्रिक व्यवस्था किस प्रकार भारत के लोगों का विकास कर सकती है और गरीबी की परिभाषा बदल सकती है। आचार्य चाणक्य ने यही इंगित किया था कि पड़ोसी की प्रशंसा में कभी भक्ति भाव नहीं होना चाहिए।