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संपादकीय

आओ वैशाखी मनाएं...

आज वैशाखी है, अष्टमी-नवमी, है आज इतना शुभ दिन है कि किसी को भी कुछ भी शुभ कार्य करने के लिए कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं। बिना सोचे-समझे नया काम, शादी, गृह प्रवेश या कोई भी शुभ कार्य कर सकते हैं। फसलें पक कर खेतों में लहलहा रही हैं। अपनी फसलों को देखकर भारत के अन्नदाता के चेहरे पर खुशी साफ देखी जा सकती है। वैशाखी का त्यौहार किसानों के लिए एक उमंग लेकर आता है। उन्हें अब अपनी फसल काट कर मंडी में ले जानी है। उन्हें अच्छी आय की उम्मीद होती है। किसी ने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी है, किसी ने बेटी की शादी करनी है, किसी ने बैंक का कर्जा उतारना है।

13 अप्रैल का दिन सिखों के लिए भी धार्मिक दृष्टिकोण में काफी महत्वपूर्ण है। इसी दिन दशम गुरु गोविन्द सिंह जी ने सिख धर्म की स्थापना की थी। पिछले दिनों जब भी आंधी के साथ बेमौसमी वर्षा हुई, कई जगह ओले भी गिरे जिससे खड़ी फसल जमीन पर बिछ गई, सरसों की फसल नष्ट हो गई। कुछ सब्जियों की फसलों को भी नुक्सान पहुंचा। इन दिनों बेमौसमी वर्षा ने कई जगह किसानों पर कहर बरपाया। अफसोस! प्रकृति की मार हमेशा किसानों को ही झेलनी पड़ती है। यद्यपि मोदी सरकार ने किसानों की खुशहाली के लिए कई उपाय किए हैं लेकिन बार-बार कुदरत की मार ​किसानों पर ही पड़ती है। देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती का आधार कृषि ही है।

किसान खुशहाल होगा तो बाजार में उसकी क्रय शक्ति बढ़ेगी। वह बाजार के उत्पाद खरीदेगा तो निर्माता अपना उत्पादन बढ़ा देंगे जिससे हर किसी का राजस्व बढ़ेगा। किसानों की आय बढ़ने से देश के हर क्षेत्र की आय बढ़ती है। इसलिए औद्योगिक और कृषि क्षेत्र को समान प्राथमिकता देनी होगी। फिर भी यह सच है कि वैशाखी खुशियां बांटने की परम्परा निभाता है। मिलकर काम करने से एक नई ऊर्जा मिलती है जिसे हम एक प्रेरणा का नाम दे सकते हैं। जीवन में हम सब मिलकर गरीबों या जरूरतमंदों की मदद करें तो सचमुच मजा आएगा। सिख धर्म की एकजुटता की कल्पना गुरु गोविन्द सिंह जी ने जब की तो एक धर्म स्थापित कर दिया।

हम इसी मार्ग पर चलें जो मानवता को समर्पित है। देश का अन्नदाता यानि किसान कर्जदारी का शिकार होकर आत्महत्या कर रहा है। राजनीतिक दलों ने किसानों को हथियार बना लिया है परन्तु हमें किसान को धरती मां के सपूत की तरह देखना चाहिए। ‘जय जवान-जय​ किसान’ का नारा हकीकत में जमीन पर उतारना चाहिए तो अन्नदाता का सम्मान बढ़ेगा। सच बात तो यह है कि हमें वैशाखी के मौके पर अपने इतिहास में भी झांकना चाहिए जब अमृतसर में जलियांवाला बाग कांड हुआ था। अमृतसर में 8 अप्रैल से 13 अप्रैल 1919 में जो कुछ हुआ वह देश के लोगों के बलिदान की कहानी सुना रहा है कि ​किस तरह हजारों लोगों के बी​च ​जलियांवाला बाग में अंग्रेजी हुकूमत के जनरल डायर ने अन्धाधुन्ध गोलियां चलवाई थीं। आज लोग जब अमृतसर पहुंचते हैं तो जलियांवाला बाग में हमारे शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

ब्रिटिश सेना के इस कुकृत्य पर अब ब्रिटेन खेद जता चुका है। हमारा कहने का मतलब यह है कि वैशाखी के मौके पर क्यों न किसानों के दुःख-दर्द हमेशा के लिए खत्म करने के लिए कोई संकल्प लिया जाए। क्यों न किसानों के घर पहुंचकर उनकी समस्याएं हल कराई जाएं। किसान कर्जे लिए मारा-मारा क्यों फिरे। अश्विनी कुमार अक्सर मेरे साथ बातें करते हुए कहते हैं कि सरकारें अन्नदाता के द्वार क्यों नहीं पहुंचतीं? जब भारत एक कृषि प्रधान देश है तो कृषि उत्पादन करने वाले किसानों को तकलीफें क्यों हों। किसानों को उन्नत बीज, खाद तथा ट्रैक्टर व कृषि सम्बन्धी अन्य सुविधाएं अगर मुफ्त प्रदान कर दी जाएं तो किसानों को किसी लोन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। उनकी ये बातें सचमुच जमीन से जुड़ी हैं। वह भी किसानों की तरह मिट्टी से जुड़े हैं। मैं उनकी सोच को भी सैल्यूट करती हूं और वैशाखी के इस मौके पर भगवान से कामना करती हूं कि हमारे अन्नदाता को इतनी शक्ति प्रदान करें कि उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।

आज खुशियां मनाने का दिन है। किसानों को उनकी नई फसल मुबारक हो। जहां यह महान दशमेश गुरु गोविन्द सिंह जी द्वारा सिख पंथ की स्थापना का दिवस है वहीं खुशियों का दिन भी है लेकिन जलियांवाला बाग के बलिदान का भी दिन है। इसीलिए हम अपनी खुशियां और गम दोनों बांटने की बात कह रहे हैं और उस सरकार से उम्मीद की आस लगाए बैठे हैं जो लोकतंत्र में काम करने वाली सरकार के रूप में जानी जाती है लेकिन किसान का सम्मान सचमुच देश का सम्मान है इसलिए हम किसानों के सुन्दर जीवन-यापन की कामना करते हैं और शहीदों काे सलाम करते हैं। वैशाखी सबके लिए शुभ हो, यही मंगल कामना है।