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संसद में टकराव का माहौल

संसद के वर्षाकालीन सत्र का आगाज जिस टकरावपूर्ण माहौल में हुआ है उससे आगे का रास्ता सरल दिखाई नहीं पड़ता है। वर्तमान सत्र में कुल 19 बैठकें होनी हैं जिनमें से एक बैठक आज समाप्त हो गई परन्तु संसदीय लोकतन्त्र का यह भी सुस्थापित सिद्धान्त होता है कि संसद को चलाने की मुख्य जिम्मेदारी सत्तारूढ़ दल की ही होती है अतः संसदीय कार्यमन्त्री की तरफ से ऐसे सुवारित प्रयास होने चाहिए जिनसे संसद का कारोबार बिना किसी बाधा के चले और विपक्ष जिन मुद्दों और विषयों को उठाना चाहता है उनका समाधान सरकार की तरफ से आये। संसदीय प्रणाली की एक सबसे बड़ी खूबी यह भी होती है कि इस पर पहला अधिकार विपक्ष का ही होता है क्योंकि विपक्ष के सांसद उन करोड़ों लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनकी सत्ता में भागीदारी छूट जाती है मगर सरकार बनाने में जिनका पूरा योगदान रहता है क्योंकि उनके वोट की ताकत से ही लोकसभा में बहुमत व अल्पमत का फैसला होता है। इसी वजह से लोकतन्त्र में बहुमत की बनी सरकार को सभी मतदाताओं की सरकार कहा जाता है।

हम अपनी सुविधा के अनुसार किसी सरकार को भाजपा या कांग्रेस की सरकार कह सकते हैं परन्तु संवैधानिक तरीके से वह भारत की ही सरकार होती है जिसमें हर नागरिक की भागीदारी होती है चाहे उसने वोट सत्तारूढ़ पार्टी को दिया हो अथवा विपक्षी पार्टी को। अतः संसद पर पहला अधिकार विपक्ष का होने का मन्तव्य केवल इतना ही होता है कि बहुमत की सरकार समूचे राष्ट्र की सरकार होने का दायित्व निभा सके। मगर इसके साथ संसदीय लोकतन्त्र की यह भी हकीकत है कि सदन के भीतर इसका कारोबार दलगत आधार पर चलता है जिसके चलते हमने देखा कि संसद के दोनों सदनों के भीतर आज विपक्ष ने प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी को अपने नये मन्त्रियों का औपचारिक परिचय नहीं कराने दिया। बेशक यह सांसदों का विशेषाधिकार होता है कि वे जिस विषय को आवश्यक समझे उसे उठायें और सदन के नियमों के अनुसार उस पर चर्चा करें। ऐसा पूर्व में भी संसद में होता रहा है। 2004 में जब केन्द्र में डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार का गठन हुआ था तो तब विपक्ष में बैठी हुई भाजपा ने भी लोकसभा और राज्यसभा दोनों में मनमोहन मन्त्रिमंडल का परिचय नहीं होने दिया था। उस समय लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण अडवानी थे। उन्होंने सवाल खड़ा किया था कि सरकार में शामिल लालू जी की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के सदस्य ‘दागी’ लोग हैं जिनके खिलाफ न्यायालयों में भ्रष्टाचार के मुकदमें और मामले विचाराधीन हैं।

इस मुद्दे पर श्री अडवाणी के नेतृत्व में उनकी पार्टी के सदस्यों ने सदन से बहिष्कार तक कर दिया था। वास्तव में यह पहला मौका था जब संसद में किसी प्रधानमन्त्री द्वारा अपने मन्त्रियों का परिचय कराये जाने के मुद्दे पर सत्ता व विपक्ष के बीच ठन गई थी। अतः आज संसद में जो कुछ भी हुआ वह एक पुरानी घटना की ही पुनरावृत्ति थी लेकिन लोकतन्त्र में इसे स्वस्थ परंपरा नहीं कहा जा सकता क्योंकि अपने मन्त्रिमंडल में किसी भी भारतीय नागरिक को नियुक्त करने का प्रधानमन्त्री का विशेषाधिकार होता है। यह अधिकार यहां तक होता है कि प्रधानमन्त्री संसद का सदस्य न होने पर भी किसी नागरिक को छह महीने तक अपने मन्त्रिमंडल में रख सकते हैं परन्तु ताजा विस्तार हुए मन्त्रिमंडल में गृह राज्यमन्त्री पद पर नियुक्त श्री निसिथ प्रमाणिक की राष्ट्रीयता पर विपक्ष के सदस्यों ने सवालिया निशान लगाये हैं। असम प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष व सांसद श्री रिपुन बोरा ने सबसे पहले श्री प्रमाणिक की राष्ट्रीयता को सन्देह के घेरे में होने का प्रश्न उठाते हुए उन्होंने विभिन्न मीडिया एजेंसियों के हवाले से बांग्लादेशी होने की बात विगत 17 जुलाई को ही संसद का सत्र शुरू होने से पहले उठायी थी, जबकि आज राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता श्री सुखेन्दु शेखर राय ने भी यह सवाल उठाया कि सरकार अपने गृह राज्यमन्त्री की नागरिकता के बारे में स्पष्टीकरण दे। श्री प्रमाणिक मोदी मन्त्रिमंडल के सबसे युवा मन्त्री हैं और प. बंगाल के कूच बिहार लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। जाहिर है कि विपक्ष इस बारे में सरकार को घेरे में लेना चाहता है क्योंकि सवाल एक केन्दीय मन्त्री की ‘प्रमाणिकता’ का है। मगर संसद के सामने केवल यही प्रश्न नहीं है। देश के करोड़ों लोगों से जुड़े बहुत ऐसे ज्वलन्त सवाल हैं जिन पर सत्ता और विपक्ष दोनों को मिल बैठ कर विचार-विनिमय करके उनके समाधान का प्रयास करना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल आम लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार करने का है जो कोरोना काल की वजह से निढाल हुई पड़ी है। यह तभी संभव है जब देश की अर्थव्यवस्था पुनः पटरी पर आये।

संसद में आज विपक्षी सांसद कृषि कानूनों की वापसी को लेकर भी हल्ला-गुल्ला करते नजर आये। अतः प्रमाणिक की प्रमाणिकता के सबूत देने के साथ ही सरकार को जनता के कारोबार पर ध्यान देना चाहिए जिससे लोग आश्वस्त हो सकें कि संसद में बैठे उनके प्रतिनिधी उनके लिए ही काम कर रहे हैं। इस मामले में पहली जिम्मेदारी विपक्ष की ही बनती है कि वह जनता के मुद्दों को किसी भी सूरत में पीछे न जाने दें।