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राजस्थान में संवैधानिक मर्यादा

कानून की पढ़ाई के प्रथम वर्ष का छात्र भी यह जानता है कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत न्यायिक अधिकारों से सम्पन्न जब कोई लोकतान्त्रिक संस्थान अपने नियत दायरे में किसी मामले की जांच प्रक्रिया शुरू करता है तो न्यायालय में उसी मामले की सुनवाई तब तक नहीं की जा सकती जब तक कि सम्बन्धित मामले पर फैसला न सुना दिया जाये। 

विधानसभा अध्यक्ष से लेकर लोकसभा अध्यक्ष व राज्यसभा के सभापति के न्यायिक अधिकारों के बारे में संविधान बड़ा ही स्पष्ट है कि इन सदनों के संचालन से लेकर सदस्यों के व्यवहार व आचरण सम्बन्धी सभी विवादों पर अंतिम फैसला करने का अधिकार केवल इन सदनों के पीठाधिपतियों के पास होगा।

हमारे संविधान निर्माताओं ने निर्वाचित सदनों की मर्यादा और पावनता व लोकतान्त्रिक शुचिता और सदस्यों को अभय देने के लिए यह व्यवस्था इस प्रकार खड़ी की कि कानून का राज लागू करने वाली न्यायिक प्रणाली और कानून को बनाने वाली दोनों संस्थाओं न्यायपालिका व विधायिका के बीच अधिकारों की लक्ष्मण रेखा चिन्हित की जा सके।

इतना ही नहीं संसद परिसर में जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष के आसन को सत्ता पर काबिज सरकार के निरपेक्ष रखा गया वह भी यही बताता है कि लोकतन्त्र किसी भी स्तर पर संविधान के शासन के दायरे से बाहर न जा सके परन्तु राजस्थान में जो राजनैतिक नाटक चल रहा है उसमें सबसे बड़ा खतरा इस बात का पैदा हो रहा है कि न्यायालय की मार्फत  राजनैतिक विवाद को किस प्रकार लम्बा खींचा जाये।

प्रथम दृष्टया रूप से बागी कांग्रेसी युवा नेता सचिन पायलट के खेमे ने राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष के अस्तित्व को ही चुनौती देने की  कोशिश याचिका दायर करते हुए यह कहा है कि उनके द्वारा उनके खेमें के विधायकों काे जारी किया गया नोटिस अनुचित है। यह नितान्त विधि विशेषज्ञों  का क्षेत्र है जिसके बारे में राजस्थान उच्च न्यायालय में बहस जारी है, मेरा निवेदन केवल इतना है कि लोकतन्त्र के चारों पाये विधायिका, न्यायपलिका, कार्यपालिका व चुनाव आयोग स्वतन्त्र व निर्भीक होकर तभी कार्य कर सकते हैं जब उनमें संविधान प्रदत्त शक्तियों से अपने अधिकारों के इस्तेमाल करने की सामर्थ्य परस्पर तटस्थता के साथ विद्यमान हो।

अध्यक्ष की भूमिका केवल विधानसभा के सत्र के चलने तक सीमित नहीं रहती बल्कि वह सदन के प्रत्येक सदस्य के संरक्षक होते हैं, सदस्यों के सदन से जुड़े सभी मामलों पर उनका फैसला ही अन्तिम होता है और जब इस सदन की सदस्यता का ही सवाल हो तो मामला अति गंभीर हो जाता है। अतः राजस्थान के चल रहे पूरे नाटक को हमें इसी दृष्टि से देखना होगा।

यदि कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के नजरिये से देखा जाये तो सचिन पायलट एंड पार्टी ने अपने दल की अनुशासन व्यवस्था को खुले में तोड़ते हुए घोषणा कर डाली कि इसके कुल 19 कांग्रेसी विधायकों की राह अपनी पार्टी के रास्ते से जुदा होगी और इसे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का नाम दे दिया मगर सवाल यह है कि दल बदल कानून अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के मानकों को संज्ञान में लेते हुए ही 1986 में बनाया गया था जिसमें बाद में भी कई संशोधन संसद द्वारा किये गये।

इस कानून का उद्देश्य निजी स्वार्थ को पूरा करने के लिए राजनैतिक अस्थिरता पैदा होने से रोकना था मगर ‘विद्वान’ राजनीतिज्ञों ने इसकी काट ‘इस्तीफा टैक्नोलोजी’ से इस प्रकार निकाली कि लोकतन्त्र ‘धन तन्त्र’ का गुलाम बन कर चुनी हुई विधानसभाओं को ही खंडित कर दे। इसके विस्तार की परिकल्पना से ही पूरी चुनाव प्रणाली को लकवा मार जाने का डर प्रत्येक मतदाता को ही धन तन्त्र का बन्धक बना सकता है।

यह बहुत गंभीर विषय है जिसकी तरफ देश के नामवर वकील श्री कपिल सिब्बल ने ध्यान दिलाया है, उनकी चिन्ता वाजिब है जिस पर स्वयं विधायिका को ही गौर करना चाहिए और दसवीं अनुसूचि में समयानुरूप संशोधन करना चाहिए, पूरे नाटक में एक तथ्य शीशे की तरह साफ है।

कांग्रेस ने स्व. राजेश पायलट के पुत्र होने के नाते युवा सचिन पायलट को ज्यादा तरजीह दी। इस बारे में स्वयं कांग्रेस को ही आत्म विश्लेषण करना होगा लेकिन सचिन पायलट के प्रकरण से एक और गंभीर मामला भ्रष्टाचार का जुड़ा हुआ है जिस तरफ संजीदगी से विचार किया जाना चाहिए कि जिस उद्देश्य के लिए दल बदल कानून का सृजन स्वयं विधायिका ने किया था उसे ही पूरा करने के लिए राजनैतिक चौसर कैसे बिछाई गई और इस खेल में एक केन्द्रीय मन्त्री तक का नाम प्रमुखता से आ गया।

सवाल यह नहीं है कि धन के लेन-देन की आडियो टेप किसने बनाई बल्कि सवाल यह है कि उसमें आवाज केन्द्रीय मन्त्री की है या नहीं। लोकतन्त्र की मर्यादा और नैतिकता कहती है कि विधायकों की खरीद-फरोख्त का प्रयास भर ही जुर्म के होने का सिरा होता है मगर इससे भी बड़ा सवाल विधानसभा की अस्मिता का है जिसके अभिभावक अध्यक्ष होते हैं।

बेशक उनका चुनाव राजनैतिक बहुमत व अल्पमत के समीकरणों के अधीन ही होता है मगर आसन ग्रहण करने के बाद उहें न्यायाधीश की भूमिका में आना पड़ता है जिसमें केवल ‘नीति और न्याय’ ही उनका दायित्व दसवीं सूची तय करती है और राजनीति का प्रवेश निषेध कर देती है।