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संपादकीय

भारत में कम होती गरीबी!

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भारत में गरीबी का जिक्र अक्सर राजनैतिक मुद्दा ज्यादा रहा है और इस पर चुनावी सियासी घमासान भी होते रहे हैं परन्तु इस बात पर ज्यादा बहस नहीं होती है कि स्वतन्त्र भारत में लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए किस प्रकार के प्रयास विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं के अन्तर्गत होते रहे हैं। यह वास्तव में सुखद घटना मानी जायेगी कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के दौर में 2005-06 से लेकर 2015-16 तक इस देश के 27 करोड़ से अधिक लोग गरीबी की उस सीमा रेखा से ऊपर उठ गये जिसे अभावों में गुजर-बसर करता निर्मम जीवन माना जाता है। 

यह जीवन दैनिक मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित होता है और आदमी जैसे-तैसे दो जून की रोटी का जुगाड़ लगाकर जीता है मगर 10 वर्षों के भीतर सरकार की नीतियों के चलते जो आर्थिक ढांचा खड़ा हुआ उससे 27 करोड़ से ज्यादा लोग इस दमतोड़ दायरे से बाहर आने में सफल हुए। यह निश्चित रूप से कोई अजूबा या चमत्कार नहीं है बल्कि आर्थिक नीतियों का जमीनी प्रभाव है। इसका मतलब क्या यह माना जा सकता है कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था संपत्ति का वितरण करने में समर्थ है? इस व्यवस्था के चलते गरीबों के घर तक वे सुविधाएं पहुंच रही हैं जिन्हें कल तक अपेक्षाकृत सम्पन्न व्यक्तियों का अधिकार समझा जाता था।

राष्ट्रसंघ के विकास संगठन (यूएनडीपी) ने जो सर्वेक्षण रिपोर्ट दुनिया के गरीब देशों के बारे में गरीबी के आधुनिकतम मानक तय करते हुए जारी की है उसके अनुसार भारत ऐसा देश है जिसने अपने लोगों की गरीबी समाप्त करने में अव्वल दर्जा पाया है। गरीबी के मानक जाहिर तौर पर आज वे नहीं हैं जो 1947 में भारत के आजाद होने के समय थे। आज वह व्यक्ति गरीब माना जाता है जिसके घर में गैस का चूल्हा न हो या टीवी न हो अथवा घर में शौचालय की व्यवस्था न हो या स्वास्थ्य लाभ के लिए जरूरी इन्तजाम न हो। भोजन की समुचित व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति ने किसी न किसी तरह प्राप्त कर रखी है। इसका मतलब सीधा आर्थिक शब्दावली में यह होता है कि भारत में प्रति व्यक्ति आय में इस प्रकार वृद्धि हुई है कि वह सभी जरूरी मूलभूत आवश्यकताओं को पाने की हिम्मत कर सके। 

यह भी महत्वपूर्ण है कि 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण का प्रभाव संयुक्त रूप से इसके लगातार 15 वर्षों तक चलने के बाद जमीन पर उतरना शुरू हुआ। 1991 में उदार आर्थिक नीतियों की नींव डा. मनमोहन सिंह ने वित्त मन्त्री के रूप में रखी थी और उस समय उनकी तीखी आलोचना भी हुई थी। उन पर प्रथम पांच वर्षों के दौरान वित्त मन्त्री के रूप में कृषि क्षेत्र को लावारिस तक बनाने के आरोप लगाये गये थे जिनमें कुछ तर्क भी था क्योंकि इस क्षेत्र में 1991 से 1996 तक सार्वजनिक निवेश घट गया था।

 परन्तु इसके बाद जितनी भी 2004 तक गैर कांग्रेसी सरकारें आईं सभी ने डा. मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का ही अनुसरण किया चाहे इनमें भाजपा नीत स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का 6 वर्ष तक चला शासन हो लेकिन मूल सवाल यह है कि आर्थिक उदारीकरण ने भारत के गांवों की दशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तभी तो इन 10 वर्षों में झारखंड जैसे गरीब राज्य में सबसे ज्यादा लोग गरीबी की रेखा से ऊपर उठे और इसके बाद बिहार, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के लोग रहे। अतः इस तर्क में दम है कि बाजार मूलक अर्थव्यवस्था ने जिस शहरीकरण के पूंजीकरण पर बल दिया उससे छन कर लाभ गांवों को मिला। इसे ‘परकूलेशन थ्योरी’ कहा गया था। 2010 के करीब इस प्रयोग को असफल बताया जा रहा था मगर सूक्ष्म अध्ययन के बाद यही थ्योरी सही पाई गई।

जाहिर है बाजारीकरण ने फौरी तौर पर गरीबों को लाभ पहुंचाया है और गांवों में सुख-सुविधाएं पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। अतः अब गरीबों की समस्याओं का पैमाना भी बदल गया है और इसे ‘अपेक्षाओं’ का नाम मिल गया है  अतः पिछले 5 साल से मोदी सरकार जिन आर्थिक नीतियों पर चल रही है उनके परिणाम सुखद क्यों नहीं होने चाहिएं? इस दौरान  जिस प्रकार स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर गरीबों के आर्थिक सशक्तिकरण की परियोजनाओं, ईंधन गैस से लेकर शौचालय निर्माण व न्यूनतम रोजगार गारंटी योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न स्कीमों के तहत पूंजी प्रवाह हुआ है उससे गरीबों की क्रय क्षमता में वृद्धि होना निश्चित है। 

फिलहाल इन स्कीमों का सामाजिक-आर्थिक आकलन राजनैतिक आधार पर हो रहा है जिसकी वजह से बदलाव का आभास उसी प्रकार नहीं हो रहा है जिस प्रकार डा. मनमोहन सिंह के प्रधानमन्त्री रहते उनकी नीतियों के असर का नहीं हो रहा था जबकि हकीकत यह है कि 2004 से 2014 तक माननीय डा. सिंह ही प्रधानमन्त्री पद पर थे। अतः उम्मीद की जा सकती है कि आगामी वर्षों में भारत में पूंजी वितरण का कार्य बाजार मूलक अर्थव्यवस्था के चलते ही बेहतर ढंग से होगा जबकि दूसरी हकीकत यह भी है कि भारत की 73 प्रतिशत सम्पत्ति पर केवल एक प्रतिशत पूंजीपतियों का ही कब्जा बताया जाता है। अतः पहेली यह है कि गरीबों का हिस्सा बढ़ रहा है तो किस आधार पर। 

जाहिर है कि ऐसा केवल सरकारी आर्थिक नीतियों की वजह से ही हो सकता है और सरकार अपने राजस्व उगाही का खर्च गरीबों को सशक्त करने के लिए सिलसिलेवार ढंग से कर रही है। कम से कम इस हकीकत को तो हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा।