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संपादकीय

लोकतंत्र में चुनौतियां भी कम नहीं !

इसमें कोई शक नहीं कि जब-जब चुनावी मौसम आता है तो हमारे यहां मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक पार्टियां अपना खेल खेलना शुरू कर देती हैं। कोई साइकिल देने की बात करता है, कोई लैपटॉप देने का ऐलान करता है, कोई साड़ियां देने का ऐलान, तो कोई गरीब लड़कियों की शादी होने पर मंगल सूत्र भेंट किए जाने का ऐलान करता है। किसानों के दुःख-दर्द दूर करने और गरीबी खत्म करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। हम इस बहस में नहीं पड़ना चाहते कि यह नैतिक है या अनैतिक लेकिन राजनीतिक पार्टियां देशवासियों के हितों को ध्यान में रखकर ऐसे ही ऐलान करती हैं तो इन्हें चुनावी वायदे कहा जाता है। जो अक्सर पूरे नहीं होते। हां, इन वायदों को पूरा करने के दावे जरूर किए जाते हैं।

ऐसे में अचानक जब तमिलनाडु के वेल्लौर में लोकसभा चुनाव रद्द कर दिया जाए तो सचमुच बड़ी हैरानी होगी। एक सीट पर चुनाव कराने के लिए सरकार के करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं परन्तु इस पर ध्यान देने की बजाय महज यह कहकर चुनाव रद्द कर देना कि 12 करोड़ रुपए की नकदी एक पार्टी के दफ्तर से मिली है तो सचमुच हैरानी होती है। जांच अभी सामने नहीं आई​ यह धन किसका था आैर अभी यह भी नहीं पता चल सका कि इसका मकसद क्या था।

बताया गया है कि एक द्रमुक उम्मीदवार के ठिकानों पर आयकर विभाग ने छापे मारे और वहां से यह नकदी मिली थी। हमारा सवाल यह है कि इस बात की जांच किए बगैर चुनाव रद्द कर देना कहां का न्याय है जबकि इस पैसे का क्या इस्तेमाल होना था। बताया गया है कि इस पैसे का कोई हिसाब-किताब नहीं था। करोड़ों का यह हिसाब-किताब एक बड़े संदेह को जन्म तो देता है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि सारा धन मतदाताओं के वोट खरीदने के लिए इस्तेमाल किया जाना था। यह पैसा कहां से आया, कौन लाया, ऑन दा रिकार्ड इसकी भी जांच नहीं हुई। हम एक बात और स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अकेले तमिलनाडु में ही पिछले दिनों 80 करोड़ रुपए की नकदी, शराब की बोतलें चुनाव आयोग पकड़ चुका है।

इस सामान में मिक्सी-ग्लाइंडर, साड़ियां तथा मेकअप किट्स भी थीं लेकिन राजनीतिक दल बहानेबाजियां ढूंढ सकते हैं और वे मतदाता को आकर्षित करने के लिए अम्मा जयललिता के नक्शेकदमों पर चल सकते हैं परन्तु इस मामले में चुनाव आयोग को और खासतौर पर सरकार को कड़े नियम तो लागू करने ही होंगे। इस नकदी के पकड़े जाने को लोग राजनीतिक काले धन का नाम दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। हालांकि लोग राजनीतिक काले धन का इस्तेमाल रोकने की पुरजोर मांग कर रहे हैं लेकिन यह भी तो सच है कि चुनाव लड़ने वाले दागी नेता तो देर-सवेर बच ही निकलेंगे। सारा सिस्टम गड़बड़ा जाता है। वोट खरीदने की महामारी पर लगाम तो लगानी ही होगी। पूरे देश में वोटरों को आकर्षित करने के लिए धन-बल का इस्तेमाल जमकर हो रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इसे चुनावी बुराई कह रहे हैं तो वहीं घोषणा पत्रों को लेकर सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियों को भी निशाने पर ले रहे हैं लेकिन इसकी कोई ठोस व्यवस्था चुनाव आयोग ने नहीं दी तो क्यों?

मौजूदा चुनावी व्यवस्था हालांकि पहले से बेहतर हो रही है। लोगोंं को वोटिंग के लिए विशेष रूप से यूथ को जिस तरह से वोटिंग अभियान में शामिल किया जा रहा है वह काबिले तारीफ है परंतु यह भी तो सच है कि जो वोट खरीदने को लेकर पैंतरेबाजी चल रही है उस पर नियंत्रण लगना जरूरी है। आज हम 2019 से गुजर रहे हैं लेकिन कई बार जिस तरह से वोट खरीदने के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं तो लगता है हम आज भी उसी तरह पुराने दौर में जी रहे हैं। कई बार लगता है कि चुनाव आयोग चुनाव सुधार जैसे मुद्दे क्यों नहीं सामने लाता। राजनीति में अपराधियों का आना और केवल कुछ एक को प्रक्रिया से दूर रखना जबकि बड़ी तादाद में अपराधी अगर वोट तंत्र में शामिल रहते हैं तो बताइये लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रहेगा। आज सब कुछ सुविधाओं के दौर से गुजर रहा है। बैलेट पेपर की जगह ईवीएम आ चुकी है फिर भी वीवी पैट से मिलान को लेकर आवाजें उठती रहती हैं और सुप्रीम कोर्ट तक को टिप्पणियां करनी पड़ती हैं।

सरकार में रहते हुए आप इन सवालों को बेमानी कह सकते हैं लेकिन यह भी तो सच है कि धुआं भी वहीं उठता है जहां कुछ न कुछ बात होती है। यह बात हम नहीं कह रहे सोशल मीडिया पर लोग अपनी भावनाएं शेयर करते हुए ऐसा कह रहे हैं। जब तक चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी नहींं होगी तब तक कुछ भी स्पष्ट होने वाला नहीं है।

आज भी सबसे अहम सवाल यह है कि पढ़ा-लिखा वर्ग अपने आपको वोटिंग से दूर रखता है। यह भी सच है कि कम पढ़े-लिखे लोग राजनीति में आ रहे हैं और ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों का राजनीति में मौजूदा व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं है। ऐप्स की दुनिया से कुछ भी अपने पक्ष में करना बड़ा आसान है लेकिन जब सोशल मीडिया बहुत तेजी से उभर रहा हो और वह सवाल उठा रहा हो तो इसका जवाब सरकारों को और पुर्ण स्वायत्तता प्राप्त निर्वाचन आयोग को देना होगा। आखिर में यही कहना होगा कि जब तक तथ्यों की जांच न हो जाए तब तक नकदी पकड़े जाने पर चुनाव आयोग अगर चुनाव रद्द कर देता है और लोग सवाल खड़े कर देते हैं तो इसका जवाब मिलना ही चाहिए। सोशल मीडिया की यह सबसे बड़ी मांग है जिसका जवाब मिलना ही चाहिए।