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पटाखे नहीं दीये जलाओ

मौसम अभी दिल्ली एनसीआर का साथ दे रहा है। राजधानी के पड़ोसी राज्यों में जमकर पराली जलाई जा रही है। 23 अक्तूबर को पंजाब में पराली जलाने की 620 और हरियाणा में 218 जगह पर पराली जलाई गई, लेकिन इसके बावजूद राजधानी का एक्यूआई सामान्य बना हुआ है। प्रदूषण भी सामान्य स्थिति में है। मानसून की विदाई वर्षा ने भी प्रदूषण को नियंत्रित किया है। दिल्ली एनसीआर में शुष्क दक्षिणी पश्चिम हवाएं चल रही हैं, जिससे धूल तो उड़ रही है लेकिन पराली का धुआं दिल्ली नहीं पहुंच रहा। ऐसी स्थिति में प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई की तैयारी के लिए वक्त मिल गया है। दिल्ली सरकार की ग्रीन ऐप पर मिली शिकायतों के आधार पर 150 हॉट स्पॉट की लिस्ट तैयार की गई है। अलग-अलग विभागों की टीमें गठित की गई हैं। इनमें नाइट पैट्रोलिंग टीम भी शामिल है, ताकि रात के समय कूड़े में आग लगाने, मलबा डालने जैसी समस्याएं नहीं आएं। 

अब सवाल यह है कि क्या दीपावली पर दिल्ली में फिर धुएं की चादर छा जाएगी आैर लोगों को सांस लेना भी दूभर हो जाएगा? वैसे तो दिल्ली सरकार ने सख्ती भी की है। दिल्ली में अगर लोग पटाखे जलाते पकड़े गए तो उनके खिलाफ विस्फोटक एक्ट के तहत एक्शन लिया जाएगा। अगर कोई लोगोें की जिंदगी से खिलवाड़ करता दिखाई दिया तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 188 और 286 के तहत कार्रवाई की जाएगी। 

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय पटाखे नहीं दीया जलाओ अभियान की शुरूआत कर रहे हैं, ताकि लोगों को जागरूक किया जा सके। यह सही है कि प्रदूषण की रोकथाम के ​लिए सख्ती जरूरी है लेकिन लोग मानने को तैयार नहीं होते। हर वर्ष दीपावली को देर रात गए लोग पटाखे चलाते रहते हैं। एक विश्लेषण के अनुसार राजधानी में एक नवम्बर से 15 नवम्बर तक हवा सबसे प्रदूषित होती है। इसका कारण पराली और पटाखों से निकलने वाला धुआं होता है, जो दिल्ली को स्वास्थ्य आपातकाल में धकेल देता है। 15 अक्तूबर से पराली जलाने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। इसका सीधा असर नवम्बर महीने में नजर आता है। 

पिछले चार-पांच वर्षों में दीवाली या तो अक्तूबर के अंत में या नवम्बर के पहले 15 दिनों में मनाई जा रही है। हालांकि पिछले वर्ष भी पटाखों पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध था लेकिन फिर भी उल्लंघन के मामले सामने आए थे। क्याेंकि प्रतिबंध की घोषणा अंतिम समय में की गई थी। इसके अलावा लोगों ने पड़ोसी राज्यों के शहरों में जाकर पटाखे खरीद लिए थे। दिल्ली को दुनिया का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर माना जाता है। दिल्ली के अलावा देश के 21 शहर भी प्रदूषित लहरों की लिस्ट में शामिल हैं। सर्दियां आते ही दिल्ली की आबोहवा बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष रूप से खतरनाक होने लगती है। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि यहां रहने वाले 75.4 फीसदी बच्चों को घुटन महसूस होती है। 24.2 फीसदी बच्चों की आंखों में खुजली की ​िशकायत होती है। सर्दियों में बच्चों को खांसी की शिकायत भी होती है। दिल्ली की हवा में उच्च सांद्रता है, जो बच्चों को सांस की बीमारी और हृदय रोगों की तरफ धकेल रही है। राजधानी की हवा में धातुओं का प्राथमिक स्रोत वाहनों का जमावड़ा और पड़ोसी राज्यों में औद्योगिक संचालन से निकलने वाला धुआं है। सर्दियों के मौसम में हवा में घातक धातुएं होती हैं, जिससे सांस लेने में दिक्कत आती है। हवा में कैडमियम और  आर्सेनिक की मात्रा में वृद्धि से कैंसर, गुर्दे की समस्या और उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

प्रदूषण कम करने और दिल्ली को रहने लायक बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं है, बल्कि हम सबकी है। हालांकि लोगों को सिर्फ एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका​ निभानी है। यद्यपि एंटीडस्ट अभियान भी चलाया जा रहा है। लोगों को खुद भी पूरी सतर्कता बरतनी होगी। लोगों को खुली जगह में कूड़ा नहीं फैंकना चाहिए और न ही उसे जलाया जाए। वाहनों का प्रदूषण लेवल चैक करना चाहिए। कोशिश करें कि हम वाहनों का इस्तेमाल कम से कम करें। हालांकि पराली जलाए जाने की घटनाएं पिछले साल के मुकाबले काफी कम हैं, इसलिए  दिल्ली वालों को भी पटाखे चलाकर खुद की या दूसरों की जान जोखिम में नहीं डालनी चाहिए। अगर हमने पर्यावरण को लेकर पहले से ही सतर्कता बरती होती तो दिल्ली प्रदूषण का शिकार नहीं होती। हमने स्वयं अनियोजित विकाड कर प्रदूषण को आमंत्रित किया है। कोरोना वायरस अभी भी हमारे बीच मौजूद है और प्रदूषण के दिनों में वायरस तेजी से फैलता है। यद्यपि कुछ जागरूक लोगों के प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हुए तो पूरी तरह निष्फल भी नहीं हुए हैं। जरूरत है हम स्वयं को तो जागरूक बनाएं ही, पूरे समाज को इस समस्या की गम्भीरता से परि​चित कराएं।  ​दिल्ली वालों को यह संकल्प तो लेना होगा कि वे दीप जलाकर दीपावली मनाएंगे।

‘‘आओ मिलकर दीप जलाएं

अंधेरा धरा से दूर भगाएं

रह न जाए अंधेरा कहीं घर का कोई सूना कोना

हर घर आंगन में रंगोली सजाएं

आओ मिलकर दीप जलाएं, प्रदूषण भगाएं।’’

आदित्य नारायण चोपड़ा

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