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अमेरिका में दिलचस्प हुई चुनावी जंग

अमेरिका में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन और उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार कमला हैरिस का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति माइक पेंस को चुनौती देना तय हो गया। उम्मीदवारी को स्वीकार करने के साथ ही भारतीय मूल की कमला हैरिस उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार बनने वाली पहली अश्वेत और दक्षिण एशियाई मूल की महिला बन गई हैं। अपने भाषण में कमला हैरिस ने खुद को भारत और जमैका के अप्रवासियों की बेटी बताया है। इसके साथ ही चुनावी जंग को धार मिलने लगी है और तीखी बयानबाजी भी शुरू हो गई है। ट्रंप पर अमेरिका को फटेहाल बनाने के आरोप लगाये जा रहे हैं तो दूसरी तरफ ट्रंप और उनकी टीम बाइडेन और कमला को अयोग्य बता रहे हैं।

बराक ओबामा के आठ वर्ष के शासन के दौरान उनके हर फैसले के पीछे बाइडेन मजबूती से खड़े रहे। उनके पास बेहतर प्रशासनिक अनुभव है। अपने समर्थकों के बीच जो बाइडेन  विदेश नीति के विशेषज्ञ  के तौर पर मशहूर है। वाशिंगटन डीसी में राजनीति करने का कई दशकों का तजुर्बा है। उन्होंने अपने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं, बहुत सी त्रासदियां झेली हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि वह बड़ी सहजता से आम आदमी से नाता जोड़ लेते हैं। विरोधियों की नजर में बाइडेन ऐसा व्यक्ति है जो अमेरिकी सत्ता में गहरे रचे-बसे इन्सान हैं, जिनमें काफी कमियां भी हैं। विरोधी कहते हैं कि वह अपने भाषण में झूठे दावे करते हैं। जो बाइडेन का चुनाव प्रचार से बड़ा पुराना नाता रहा है। अमेरिका की संघीय सियासत में उनके करियर की शुरुआत 1973 में सीनेट के चुनाव से हुई थी और उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में भागीदारी के लिए पहला दाव आज से 33 वर्ष पहले चला था। जो बाइडेन राष्ट्रपति बनने की तीसरी कोशिश कर रहे हैं। गलत बयानबाजी के चलते उनका पहला अभियान शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया था तथा उन्होंने अपनी रैलियों में यह कहना शुरू कर दिया था कि उनके पूर्वज उत्तरी पश्चिमी पेंसिल्वेनिया  की कोयला खदानों में काम करते थे, उनके पूर्वजों को जिन्दगी में आगे बढ़ने के मौके नहीं मिले जिसके वह हकदार थे मगर वास्तविकता यह है कि उनके पूर्वजों में से किसी ने भी कोयले की खदान में काम नहीं किया था। बाइडेन  ने यह जुमला ब्रिटेन के राजनीतिज्ञ नील ​किनॉक की नकल करते हुए अदा किया था जो उन्हें भारी पड़ा था। नील ​किनॉक के पूर्वज कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूर थे।

उनके बयानों पर कई बार हंगामे होते रहे हैं, इसके बावजूद वह अमेरिका के अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय में काफी लोकप्रिय हैं। वह अच्छे वक्ता हैं और अपने दिलकश अंदाज में लोगों में जोश भर रहे हैं और फिर बड़ी सहजता से उस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं। लोगों के बीच जाकर उनसे हाथ मिलाते हैं, गले मिलते हैं। लोगों के साथ सेल्फी खींचते हैं। 1970 के दशक में उन्होंने अमेरिकी बच्चों के बीच नस्लीय भेदभाव कम करने के लिए उन्हें एक साथ पढ़ाने का विरोध करने वालों का साथ दिया था तब उन्हें उनके स्टैंड के लिए बार-बार निशाना बनाया गया। अब काले लोगों पर पुलिस की हिंसा को लेकर और कोरोना वायरस संकट से निपटने को लेकर बाइडेन ट्रंप से पूरी तरह भिड़ चुके हैं। अब सवाल यह है कि क्या बाइडेन चुनावों में ट्रंप को मात दे पाएंगे? जहां तक उपराष्ट्रपति की उम्मीदवार कमला हैरिस का सवाल है तो वह भी जानी-मानी अश्वेत नेता हैं लेकिन उन्होंने अपनी भारतीय जड़ें नहीं छोड़ी हैं। उनकी मां श्यामला मानवाधिकार कार्यकर्ता रहीं हैं। जमैका मूल के पति से अलग होकर उनकी मां ने दोनों बेटियों को भारतीय संस्कृति के साथ पाला। कमला हैरिस बड़ी ही शान से अपनी अफ्रीकी-अमेरिकी जिन्दगी जीती हैं। अब यह सवाल उठाया जा रहा है कि कमला हैरिस की उम्मीदवारी को लेकर भारत में लोग इतने उत्साही क्यों हैं? यह भी कहा जा रहा है कि कमला हैरिस के भीतर अब भारत कितना बचा है?

कमला हैरिस की उम्मीदवारी को लेकर हमें देखना होगा कि उनकी नीतियां क्या हैं? भारत-अमेरिका संबंध उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहां से उन्हें बेहतरी की तरफ ही ले जाना चाहिए लेकिन कमला हैरिस जिस डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करती हैं,जिन विचारों को प्रदर्शित करती हैं और भारत से जुड़े कई मुद्दों पर उनकी पार्टी की राय से भारत सहमत नहीं होगा। कश्मीर और सीएए को लेकर कमला हैरिस के बयानों से भारत सहमत नहीं है। स्पष्ट है कि कमला हैरिस अपनी पार्टी की नीतियों का ही अनुसरण करेंगी। भारत ने वह दौर भी देखा है जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था और अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में था। जूनियर बुश और बिल क्लिंटन की सरकारें पाकिस्तान पर डालर की बरसात करती रही। उम्मीद तो की जानी ​चाहिए कि कमला हैरिस भारत के साथ संबंधों को प्राथमिकता देंगी। भारत-अमेरिका संबंध इसलिए मत्वपूर्ण हो गए हैं क्योंकि दोनों के हित आपस में मिलते हैं। 1960 के दशक में अमे​रिका में नस्लभेद के विरुद्ध आन्दोलन में कमला हैरिस के माता-पिता की भी भागीदारी थी। इसका प्रभाव कमला हैरिस पर पड़ा और वह एक सशक्त मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में उभरी। जहां तक मानवाधिकारों का प्रश्न है, भारत खुद मानवाधिकारों का प्रबल समर्थक है। फिलहाल अमेरिका के चुनाव दिलचस्प मोड़ पर हैं। देखना होगा कि अमेरिका के लोग  कैसा जनादेश देते हैं।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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