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संपादकीय

जातियों में उलझा समाज

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देशभर में ऑनर किलिंग की घटनाएं सामने आ रही हैं। हमारा देश कितना भी विकास कर ले, विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाए लेकिन जाति का दंश और परम्पराओं की जड़ता हमारे समाज के विकास के रास्ते में पहाड़ बनकर खड़ी हो जाती है। झूठी शान के लिए हत्याएं करने वालों को न पुलिस का कोई खौफ है, न कानून का और न ही अदालतों का।

गुजरात के अहमदाबाद जिला के एक गांव में 25 वर्षीय दलित युवक की हत्या उसकी दो माह की गर्भवती पत्नी के रिश्तेदारों ने पुलिस के सामने ही कर दी। पत्नी ऊंची जाति की और मारा गया युवक दलित था। युवक पुलिस को साथ लेकर अपने ससुराल अपनी पत्नी को लेने गया था लेकिन वहीं उसे तेजधार हथियारों से मार डाला गया। एक और वीडियो वायरल हुआ है। बरेली के भाजपा विधायक राजेश मिश्रा की बेटी और उसके पति का जिसमें युवती को डर है कि उसके विधायक पिता उनकी हत्या करा सकते हैं क्योंकि मैंने एक दलित युवक के साथ शादी की है। जोड़े ने अदालत का द्वार खटाखटा कर सुरक्षा की मांग की है। इससे पहले तमिलनाडु में भी अंतरजातीय विवाह करने के बाद तीन माह की गर्भवती युवती और उसके पति की झूठे सम्मान के लिए हत्या कर दी गई थी।

हरियाणा, उत्तर प्रदेश से तो ऐसी खबरें आती ही रहती हैं। ये घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि समाज किन मध्ययुगीन सामंती मूल्यों को ढो रहा है। महिला सशक्तिकरण के सभी कार्यक्रम विफल साबित हो रहे हैं। आज देश के आर्थिक मॉडल से लेकर अंतरिक्ष में भारत के सुपर पावर बनने की कहानी दुनिया को सुनाई जा रही है। न्यू इंडिया का बखान किया जा रहा है। समाज में जो कुछ हो रहा है, उसकी खबरें अखबारों की सुर्खियां तो बनती हैं लेकिन उन पर बहस नहीं होती। सारी अमानवीय घटनाओं पर राजनीतिक दलों का रवैया भी असंवेदनशील नजर आता है। 

सामाजिक असमानता और अमानवीयता का पता देने वाली घटनाओं पर किसी को शर्मिंदगी क्यों नहीं होती। आज भी एक युवक की हत्या इसलिए कर दी जाती है क्योंकि उसने एक शादी समारोह में सवर्णों के सामने कुर्सी पर बैठकर खाना खाया था। सरकारें आखिर लोकतांत्रिक मूल्यों को सामाजिक चेतना का हिस्सा क्यों नहीं बनातीं। ऐसी घटनाओं के प्रति सिस्टम आज तक सहिष्णु क्यों बना हुआ है। इतनी बड़ी आबादी को हर तरह के भेदभाव, अपमान और अमानवीयता के हवाले करके देश न तो विकास का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है और न ही सभ्यता और संस्कृति का। 

सवाल यही है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी समाज जाति का दंश क्यों झेल रहा है। ऑनर किलिंग में कोई ऑनर नहीं होता, केवल किलिंग होती है। इसमें सिर्फ जीवन तबाह होता है, खुशियां मातम में बदल जाती हैं। इज्जत शब्द झूठे अहंकार के अलावा कुछ नहीं है। यह ऐसा अहंकार है जो जान लेने को तैयार हो जाता है। यह अहंकार प्रेम शून्य है जो अपनी ही बेटी या बेटे को मार डालता है। 

संविधान में दो वयस्क लोगों को अपनी पसन्द के मुताबिक शादी करने का अधिकार है। इसमें जाति सहित कोई परम्परा बाधा नहीं बन सकती लेकिन परम्पराओं में बंधे लोगों की मानसिकता इस कदर जड़ हो चुकी है कि वे इन घटनाओं को कानून की कसौटी पर रखकर देख ही नहीं पाते। आज भी लोग ऊंची जाति के अहंकार में श्रेष्ठता बाेध में डूबे हुए हैं। खाप पंचायतों ने ऐसे-ऐसे फैसले सुनाए हैं जिन्हें देखकर सभ्य समाज भी शर्मसार हुआ। कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं लेकिन कैंडिल लाइट लेकर प्रदर्शन करने वालों ने कभी ऑनर किलिंग पर विरोध प्रदर्शन नहीं किया।

देश में कानून को हमेशा जाति और धर्म से ऊपर माना जाता है लेकिन आज कानून और धर्म में अन्तर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को धोखा दिया जा सकता है। यही कारण है कि लोग धर्मभीरू रूढ़िग्रस्त हैं। वे कानून की त्रुटियों का लाभ उठाने में संकोच नहीं करते। देश ने अनेक राजनीतिक आंदोलन देखे लेकिन राजाराम मोहन राय और ऋिष दयानन्द के बाद सामाजिक उत्थान के लिए कोई बड़ा आंदोलन नहीं देखा। झूठी शान के लिए हत्याएं, दलितों से जातिगत भेदभाव समाज में उचित नहीं। महान सभ्यता आैर संस्कृति वाला भारत किस मध्ययुगीन युग में डूब रहा है। समाज की मानसिकता बदलने के लिए एक बड़े सामाजिक आंदोलन की जरूरत है।