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फारूक-महबूबा का गुपकार गैंग

कौटिल्य (चाणक्य) किसी विशेष कार्य से कहीं जा रहे थे। रास्ते में एक बड़ा सा कांटा उनके पांव में चुभा तो पांव लहूलुहान हो उठा। कौटिल्य ने उस कांटे को निकाला तो देखा वहां ऐसे कांटों का हजूम था जो एक विशेष पौधे में लगे हुए थे। कौटिल्य ने उस पौधे को काट कर जला दिया। अपना कार्य करके जब कौटिल्य वापस लौटे तो उन्होंने पूरी तन्मयता के साथ उस पाैधे की जड़ों को निकाला। जहां तक जड़ें थीं, वहां तक पहुंचने में उन्हें शाम हो गई। थोड़ी देर बाद वह एक पात्र में छाछ लेकर आए और जिस मिट्टी से जड़ें निकली हुईं थी वहां सावधानीपूर्वक छाछ को गिरा दिया। एक अजनबी ने कौटिल्य के इस व्यवहार को देखकर इसका कारण पूछा तो कौटिल्य ने कहा-यह बड़ा खतरनाक कांटा है, यह पूरे राज्य में फैल गया तो जीना दूभर हो जाएगा। अतः जड़ों से निकाल तो दिया है, परन्तु मानवीय भूल से एक भी जड़ अगर रह गई तो वह छाछ के प्रभाव से निकलेगी नहीं। कांटों का समूल नाश होना ही चाहिए। यह कहानी मेरे मस्तिष्क में घूम रही है।

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और 35-ए को नरेन्द्र मोदी सरकार ने जड़ों से उखाड़ दिया, हुर्रियत के नागों को भी पिटारे में बंद करने में सफलता प्राप्त कर ली। गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी दृढ़ इच्छा​शक्ति का परिचय दिया लेकिन कुछ कांटे अभी भी हैं जो राज्य को फिर से अशांत करने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले दो दिन में जो कुछ हुआ वह समूचा राष्ट्र देख रहा है। जैसे ही पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती नजरबंदी से रिहा हुईं शेख अब्दुल्ला के बेटे और नैशनल कांफ्रैंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला अपने बेटे उमर अब्दुल्ला को लेकर महबूबा मुफ्ती से मिले। जल्दबाजी में सभी दलों की बैठक बुलाई और बना डाला नया गठबंधन। फारूक और महबूबा एक हो गए और बना डाला ‘गुपकार गैंग’। इस गैंग ने अलगाववाद का फिर राग अलापा और अनुच्छेद 370 की बहाली, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का बंटवारा रद्द करने और प्रदेश को पुनः राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने की चेतावनी दे दी। दरअसल अनुच्छेद 370 हटने के बाद अपनी राजनीतिक जमीन खो चुके कश्मीर केन्द्रित दल पूरी तरह से बौखला गए हैं। फारूक अब्दुल्ला का चीन की मदद लेने संबंधी वक्तव्य बौखलाहट का परिणाम है। जो लोग आजादी का सपना दिखाकर राज्य के लोगों को ठगते आए थे, अब इनकी दुकानदारी बंद हो गई है, इसलिए ये अब फिर से अलगाववाद के एजैंडे की वापसी चाहते हैं। गुपकार घोषणापत्र के बहाने इन लोगों ने पाकिस्तान और चीन के खतरनाक इरादों को बल देने की कोशिश की है। इससे बड़ा देशद्रोह क्या हो सकता है कि जो चीन लद्दाख और अरुणाचल को भारत का हिस्सा मानने से इंकार कर रहा है, वह फारूक अब्दुल्ला को मददगार दिखाई देता है। फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती संवैधानिक पदों पर रहे हैं लेकिन जिस थाली में खाया, उसी में छेद करने की कहावत को तो इन्होंने चरितार्थ किया है। अपनी इन हरकतों से देश के प्रति अपनी निष्ठा को संदिग्ध बना दिया है। कश्मीरी अवाम को इन लोगों ने इतना गुमराह किया कि उनमें सोच-विचार की क्षमता ही खत्म हो चुकी है।

कश्मीरी अवाम को संतुष्ट करने के लिए केन्द्र की सरकारों ने काफी धन लुटाया है। लगातार पैकेज दिए जाते रहे। अरबों रुपए खर्च किए गए, जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता। इससे देश को क्या मिला-नरसंहार, जवानों की शहादत और कश्मीरी पं​ड़ितों  से घाटी खाली हो गई। न तो हमारे देव स्थान अछूते रहे। याद कीजिए अक्षरधाम पर हमला आैर जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर हमला। भारत को मिले अमरनाथ यात्रियों के शव। पाकिस्तान और अरब देशों से हवाला के जरिये आए धन से स्कूली बच्चों से लेकर बेरोजगार युवाओं को दिहाड़ीदार पत्थरबाज बना दिया। किताबों की जगह उनके हाथों में बंदूकें थमा दी गईं। अनुच्छेद 370 का लाभ अवाम को नहीं मिला, अपनी तिजोरियां भरीं तो कश्मीर के तथाकथित रहनुमाओं ने। फारूक अब्दुल्ला ने समय-समय पर षड्यंत्र रचे। 

उन्होंने ऑटोनामी का राग छेड़ा था। सन् 2000 की बात है तत्कालीन प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले थे। फारूक अब्दुल्ला दिल्ली आए, प्रधानमंत्री से मिले, उनके वा​पस आने तक संयम बरतने का आश्वासन दिया गया आैर उधर प्रधानमंत्री का जहाज उड़ा और इधर कश्मीर की जम्मू-कश्मीर विधानसभा में नाटक शुरू हो गया। ऐसे-ऐसे प्रवचन ​िवधानसभा में हुए मानो वह कश्मीर नहीं, ब्लूचिस्तान की असैम्बली हो। फारूक अब्दुल्ला ने जो प्रस्ताव पारित कराया था, वह देशद्रोह का नग्न दस्तावेज था, और वस्तुतः उस दस्तावेज में भारत की इतनी भूमिका थी कि वह राज्य में किसी भी बाह्य आक्रमण के समय रक्षा करे, पैसों का प्रवाह यहां होता रहे आैर यहां भी सरकार भारत के समस्त विधानों का उपहास उड़ाते हुए विखंडित करने का दुष्प्रयत्न करते रहे। महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद कश्मीर समस्या के समाधान के लिए लगातार पाकिस्तान से वार्ता की रट लगाए रहते थे। अटल जी ने कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत की बात की थी लेकिन देश के लोगों और महिलाओं से भेदभाव करने वाले राज्य के संविधान के समर्थक गुपकार गैंग के नेता किस मुंह से कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत की बात करते हैं। गुपकार रोड के एक तरफ भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र का कार्यालय है और दूसरी तरफ कश्मीर के अंतिम राजा का घर है। यह बहुत ही सुरक्षित इलाका है और हमेशा सत्ता में शामिल या उनसे जुड़े लोगों का आवास रहा है। गुपकार गैंग यदि समझता है कि उनकी आवाज विश्व स्तर पर सुनी जाए तो वे भूल जाएं। अब उनकी आवाज को कोई सुनने वाला नहीं है। 2010 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने जम्मू-कश्मीर को विवादित क्षेत्रों की सूची से निकाल दिया था और कहा था यह भारत का आंतरिक मामला है। कश्मीर की आजादी बस एक ख्याली विचार है। कश्मीरी जनता को भारत की मुख्यधारा में शामिल होकर ही बेहतरी के रास्ते मिल सकते हैं। सिर्फ घाटी में अलगाववादी ताकतों के प्रभाव वाले क्षेत्रों के कुछ लोग गुपकार गैंग का समर्थन कर सकते हैं। अब 370 के मामले में बाहरी दबाव सम्भव नहीं। जरूरत है कश्मीरी जनता काे संदेश देने की कि गुपकार गैंग से सतर्क रहे क्योंकि इसे कश्मीरियों की चिंता कम अपना अस्तित्व बचाने की ज्यादा है।