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संपादकीय

लोकसभा का पहला दिन...

17वीं लोकसभा का आगाज जिस अन्दाज में हो रहा है उससे यह अहसास होता है कि सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के नए चुने हुए सांसदों पर अभी तक चुनावी ‘खुमार’ चढ़ा हुआ है और वे समझ रहे हैं कि जनता के सबसे बड़े चुने हुए ‘संवैधानिक सदन’ में पहुंचने के बावजूद उन्हें इसके कायदे के अनुरूप बदलने की जरूरत नहीं है। संसद हिन्दोस्तान के लोगों द्वारा चुनी गई वह पंचायत है जिसका निर्माण किसी ‘दैवीय चमत्कार या खुदाई करामात’ से न होकर भारत के सबसे निचले पायदान पर खड़े समाज के बीच से निकले ऐसे विद्वान व्यक्ति द्वारा किया गया है जो इस देश में फैली गैर-बराबरी और ऊंच-नीच को आम लोगों की ताकत के जरिये ही खत्म करना चाहता था। 

उसका नाम डा. भीमराव अम्बेडकर था और इस काम के लिए उसका चयन महात्मा गांधी ने किया था। सबसे पहले यह समझा जाना चाहिए कि लोकसभा में जो सदस्य भी चुनकर आये हैं उन्हें किसी आसमानी ताकत ने इस सदन में नहीं भेजा है बल्कि इसी जमीन पर रहने वाले और रोजाना मुसीबतें झेलने वाले लोगों ने ही चुनकर भेजा है। उनकी सबसे पहली जिम्मेदारी इन्हीं लोगों के प्रति बनती है और वे ही इस संसद के मालिक हैं। संसद में शपथ ग्रहण समारोह के दौरान जो नजारा पेश आया उसे किसी भी तरीके से संसद की गरिमा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। संसद सदस्य की शपथ लेते समय सभी प्रकार के राजनैतिक आग्रहों व पूर्वाग्रहों को ताक पर रखकर केवल संविधान के प्रति अपनी निष्ठा और भारत की अखंडता के प्रति अपने समर्पण का ऐलान किया जाता है जो प्रत्येक सदस्य अपनी सर्वोच्च श्रद्धाबिम्ब को हाजिर-नाजिर करके लेता है। 

यह ईश्वर या अल्लाह अथवा सत्य निष्ठा के नाम पर ली जाती है, इसके आगे-पीछे कुछ नहीं होता क्योंकि भारतीय संविधान सभी निष्ठाओं, आस्थाओं और विश्वासों का ‘मूर्तमान स्वरूप’ होता है मगर शपथ ग्रहण समारोह के चलते जिस तरह मध्य प्रदेश के भाेपाल लोकसभा चुनाव क्षेत्र से जीतकर आईं भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने अपना अाधिकारिक नाम उच्चारित करने में ही राजनीति की उससे सदन की गरिमा को पहले दिन ही धक्का पहुंचा है। इससे पहले शपथ समारोह विधिवत अनुशासित रूप से चल रहा था। शपथ ग्रहण के समय यदि कोई सदस्य अपना आधिकारिक नाम ही नहीं लेता है तो उसकी शपथ किस प्रकार हो सकती है? प्रज्ञा सिंह ठाकुर बेशक मोदी के चुनावी तूफान में विजयी होने में सफल हो गई हैं मगर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का दाग उन पर अभी तक लगा हुआ है और अदालत में उन पर बाकायदा मुकदमा चल रहा है। 

सांसदों की राष्ट्रभक्ति और देश के समर्पण के प्रति उनकी निष्ठा को देखकर ही मतदाताओं ने उनका लोकसभा के लिए चुनाव किया है। यह चुनाव लोगों ने अपनी समस्याओं का हल निकालने के लिए अपनी बुद्धि के मुताबिक किया है। संसद राष्ट्रभक्तों का ही जमावड़ा होती है। प्रत्येक सदस्य चाहे वह किसी भी राजनैतिक दल का  हो, राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव से ही इस सदन में पहुंचने में सफल होता है। प्रत्येक सदस्य का लक्ष्य राष्ट्र को और मजबूत बनाने का ही होता है तभी तो आम जनता उसे चुनकर भेजती है। बेशक सदस्यों के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु संविधान द्वारा नियत सीमाओं के बीच ही उन्हें देश को मजबूत बनाने के रास्ते निकालने होते हैं क्योंकि संविधान स्वयं में देश को मजबूत बनाये रखने का वह नायाब नुस्खा है जिसे इस देश को लोकतान्त्रिक प्रणाली देने वाले रहबरों की पीढ़ी ने दिया था। 

उन्हीं के दिये गये नुस्खे की बदौलत हम आज ऐसी रंग-बिरंगी शासन व्यवस्था देख रहे हैं जिसमें किसी भी राजनैतिक दल को हुकूमत में बैठा सकते हैं और किसी भी दल को विपक्ष में खड़ा कर सकते हैं। यह सब इसी संविधान की बदौलत तो है। अतः भाजपा के सांसदों को सबसे पहले यह समझना होगा कि उन्होंने चुनावी नैया तो पार कर ली है मगर अब उन्हें जनता की नैया खेनी है और यह नैया ‘भजन’ गाने से पार नहीं लगेगी बल्कि उन गरीब व मुफलिस लोगों की समस्याएं दूर करने से लगेगी जिनके वोट से वे सदन में पहुंचे हैं। मध्य प्रदेश के भाजपा सासंदों से एक बात कहना बहुत जरूरी है कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि का पहला कर्तव्य यही होता है कि उसकी हर बात जनता की समझ में आये। 

मजेदार यह रहा कि संस्कृत में शपथ लेने के बाद कई सदस्यों ने अंग्रेजी में हस्ताक्षर किये...मन, वचन और कर्म से जनप्रतिनिधि को एक जैसा होना चाहिए। जनता की भावनाएं प्रकट होनी चाहिएं। मराठी या तमिल अथवा तेलगू या मलयालम अथवा कन्नड़ में जब इन क्षेत्रों के चुने हुए सदस्य शपथ लेते हैं तो सीधे अपने मतदाताओं से राब्ता कायम करते हैं अतः मध्य प्रदेश के सांसदों को मैं एक कविता की ये पंक्तियां भेंट करता हूं- 
जैसा तू है, वैसा तू दिखा , 
लकड़ी की तख्ती पर मिट्टी से लिख !