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पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन

पाकिस्तान में हिन्दू अनुयायियों का जबरन धर्म परिवर्तन कोई अनहोनी नहीं कही जा सकती क्योंकि इस मुल्क की तामीर ही मजहब के नाम पर 1947 में हुई थी और इसकी तासीर ही कट्टरपंथी इस्लामी रवायतों को हवा देने की थी। इसके बावजूद 1956 तक पाकिस्तान में लोकतन्त्र गिरता-पड़ता चलता रहा और जैसे-तैसे अपनी अवाम के मसलों को खुले नजरिये से परखता रहा मगर इस मुल्क में फौजी हुकूमत आने के बाद इसका मिजाज बदलता चला गया और इसकी फितरत हिन्दोस्तान की मुखालफत के नाम पर हिन्दू-विरोध की हो गई जिसकी वजह से इसकी सियासत का मकसद इस मुल्क में 1947 के बाद बचे-खुचे हिन्दुओं व सिखों पर जुल्मो-सितम ढहाना हो गया और इसी तास्सुब के चलते इस मुल्क में हिन्दुओं की जनसंख्या 18 प्रतिशत से घटते-घटते आज केवल दो प्रतिशत से भी कम रह गई। ​

फिलहाल सबसे ज्यादा हिन्दू पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त में हैं और वे तीसरे दर्जे के नागरिकों की तरह जीने के लिए मजबूर हैं। खासतौर पर उनकी बहू-बेटियों की इज्जत हमेशा खतरे में रहती है क्योंकि उनके सिर पर इस्लामी कट्टरपंथियों के जुनून की तलवार हमेशा लटकती रहती है। बलूचिस्तान में भी हिन्दू और सिख थोड़ी बहुत संख्या में हैं जहां उनके साथ और भी ज्यादा बुरा बर्ताव होता है क्योंकि पाकिस्तान की सरकार इस प्रान्त के मुस्लिम नागरिकों को भी दोयम दर्जे का नागरिक समझती है। सवाल यह पैदा होता है कि पाकिस्तान में पिछले सत्तर साल में हिन्दुओं की संख्या कहां गायब हो गई जो वे 18 प्रतिशत से घटकर दो प्रतिशत से भी कम रह गये। 

इसकी वजह हमें हाल ही में ननकाना साहब में एक सिख युवती को अगवा करके उसकी जबरन शादी एक मुस्लिम व्यक्ति से कराने की घटना से पता चलती है। हिन्दू व सिख धर्म की युवतियों को इसी प्रकार से इस्लाम कबूल करवा कर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की आबादी को घटाया गया है। बेशक यही एकमात्र वजह नहीं है परन्तु यह एक मूल कारण है। अपने धर्म के अनुसार जीवन जीने पर लगे अघोषित प्रतिबन्धों और प्रसासनिक स्तर पर हिन्दुओं के साथ बर्बरता के व्यवहार पर हुक्मरानों के मुंह फेर लेने की वजह से इस्लामी कट्टरपंथियों के हौसले इस तरह बुलन्द रहे हैं कि उन्हें हिन्दुओं की कन्याओं को जबरन उठा लेने या अगवा कर लेने में कोई खतरा ही महसूस नहीं होता। इसके बाद उनसे निकाह करना खाली एक शगूफा बनकर रह जाता है। 

ननकाना साहब के समीप एक गुरुद्वारे के ग्रन्थी की पुत्री को विगत 29 अगस्त को पाकिस्तान में जिस तरह अगवा करके उसका निकाह एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ कराया गया, उसे लेकर पाकिस्तान के सिख समुदाय में जबर्दस्त रोष व्याप्त है और इस समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने की हिम्मत भी दिखाई जिसकी प्रतिध्वनि हमें भारत में भी सुनाई दी और इन्दौर व अमृतसर समेत नई दिल्ली में भी सिख व हिन्दू बन्धुओं ने रोष प्रकट किया। यह कैसा विकट विरोधाभास है कि एक तरफ तो पाकिस्तान अपने इलाके में बने सिखों के प्रसिद्ध गुरुद्वारों के लिए भारत से सुरक्षित मार्ग खोलता है और दूसरी तरफ अपने यहां एक सिख युवती का जबरन धर्म परिवर्तन भी होने देता है। 

कहने को कहा गया कि ननकाना साहब की इस घटना में संलग्न आठ व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया है मगर युवती के परिवार वालों ने इसका खंडन करते हुए साफ कहा है कि उन्हें उनकी बेटी सुरक्षित अपने पास चाहिए। पाकिस्तान के पास इसका कोई जवाब नहीं है। जाहिर है कि पाकिस्तानी सरकार किसी तरह मामले को ठंडा कर देना चाहती है मगर यह मामला इतना संगीन है कि इसका असर पहले से ही खटास में चल रहे दोनों देशों के सम्बन्धों को कड़वाहट में बदल सकता है क्योंकि विशुद्ध रूप से यह मामला मानवीय अधिकारों का है जिसका सम्बन्ध किसी भी देश के घोषित रूप से किसी राजधर्म से नहीं हो सकता क्योंकि हमने देखा है कि इस्लामी देशों तक में किस तरह दूसरे धर्मों के अनुयायियों की विरासत को सुरक्षित रखा जाता है। 

गुरु नानक देव के स्मृति चिन्हों को इराक व अरब देशों में पूरी सुरक्षा प्राप्त है। यह तो एक जीवित सिखनी की मर्यादा का मामला है। विगत जून महीने में ही पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के जैकबाबाद शहर में हिन्दू व सिखों ने दो किशोरी युवतियों के अपहरण के खिलाफ प्रदर्शन किया था और प्रधानमंत्री इमरान खान से जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाने की मांग की थी। इससे पहले मार्च महीने में भी दो बहनों रवीना और रीना को जबरन उठा कर उनका निकाह करा दिया गया था। इसकी गूंज कनाडा तक में हुई थी और वहां बसे पंजाबी समुदाय के लोगों ने पाकिस्तान की सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी। भारत सरकार ने ननकाना साहब की घटना का भी संज्ञान लिया है और पहले भी इस मामले में कूटनीतिक स्रोतों के जरिये पाकिस्तान को सावधान किया था मगर इस देश की नीति एेसे मामलों में आंखें मूंदने की ही रही है। 

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस सिख धर्म ने खालसा स्वरूप लेकर हिन्दू धर्म की रक्षार्थ ही शस्त्रों को उठाकर इस्लामी कट्टरपंथ का जवाब देने हेतु कुर्बानियों और बलिदान का इतिहास रच डाला और उसी को पाकिस्तान फिर से चुनौती देने की जुर्रत कर रहा है। यकीन मानिये गुरु गोबिन्द सिंह के इन शिष्यों को घुट्टी में यही पिलाया जाता है कि 

   सूरा सो पहचानिए, जो लरै दीन के हेत

   पुरजा-पुरजा कट मरे, कबहुं न छाड़े खेत