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किसान आन्दोलन के स्वरूप ?

तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करके प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इस मुद्दे पर चल रहे आन्दोलन का संज्ञान लेते हुए जो सदाशयता दिखाई थी उसका प्रति संज्ञान किसान संगठनों ने अपने तरीके से लेते हुए कहा है कि वे तीनों कानूनों की वापसी के अलावा अन्य सम्बन्धित मांगों के समर्थन में अपना आन्दोलन जारी रखेंगे और सरकार पर दबाव बनायेंगे कि वह इन मांगों को भी स्वीकार करें। इनमें सबसे प्रमुख मांग विभिन्न फसलों के समर्थन मूल्य को किसानों का कानूनी अधिकार बनाने की है। इसके साथ ही उन्होंने पांच अन्य मांगें भी रखीं हैं और सरकार से कहा है कि वह इन्हें भी स्वीकार करके किसानों के आन्दोलनकारी रुख से निजात पाये। इन अन्य पांच मांगों में प्रस्तावित बिजली संशोधन विधेयक का प्रमुखता से जिक्र किया गया है। इस संशोधन के जरिये सरकार बिजली बिलों के भुगतान में एकरूपता लाना चाहती है।

इसके अलावा लखीमपुर खीरी में विगत महीने जिस तरह चार किसानों काे वाहनों के नीचे कुचले जाने के मामले में दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई भी शामिल है। इस कांड में केन्द्रीय गृह राज्यमन्त्री अजय मिश्रा के पुत्र का कथित हाथ बताया जाता है। अतः किसानों की मांग है कि गृह राज्यमन्त्री को तुरन्त बर्खास्त किया जाये। किसानों ने प्रधानमन्त्री के नाम एक खुला पत्र लिख कर इन मांगों को दोहराया है और कहा है कि आन्दोलन से जुड़े जिन आन्दोलनकारी किसानों के खिलाफ सरकार की ओर से भी जो भी मुकदमें दायर किये गये हैं, वे सभी प्रकरण भी वापस लिये जाने चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि स्वतन्त्र भारत में किसानों द्वारा किया जा रहा यह सबसे लम्बा आन्दोलन है जिसमें कई उतार-चढ़ाव भी आये हैं। मगर हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कृषि क्षेत्र एेसा आर्थिक गतिविधियों का दायरा है जिससे देश के साठ प्रतिशत से अधिक लोग जुड़े हुए हैं। अतः इस क्षेत्र के लोगों द्वारा चलाये जा रहे आन्दोलन का सीधा असर भारत की सामाजिक व्यवस्था पर भी पड़े बिना नहीं रह सकता और लोकतन्त्र में सामाजिक समीकरणों का असर राजनीति पर पड़े बिना भी नहीं रह सकता। अतः स्वाभाविक है कि किसानों की सभी मांगों के राजनैतिक आयाम भी उभरेंगे। भारत राजनैतिक समीकरणों से संचालित होने वाला ही लोकतन्त्र है अतः सामाजिक-आर्थिक समीकरण राजनीति को अपने आगोश में लिये बिना नहीं रह सकते और इसके असर से सत्ता के समीकरण बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकते। अतः किसानों द्वारा अपना आन्दोलन वापस न लिया जाना राजनैतिक समीकरणों को उलझाये रख सकता है।

किसानों की मूल मांग यही थी कि तीनों कृषि कानून वापस होने चाहिए। अब सरकार इसके लिए मान गई है तो कुछ विश्लेषकों को लग सकता है कि अब आन्दोलन जारी रखने का क्या औचित्य है? मोटे तौर पर यह सही भी है क्योंकि सामान्यतः किसी भी आन्दोलन की जब मुख्य मांग मान ली जाती है तो वह समाप्त हो जाता है परन्तु यहां किसानों ने ऐसी नई मांग जोड़ दी है जो आन्दोलन की प्रक्रिया से ही उपजी है। इसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानूनी स्वरूप है। आन्दोलन से पहले यह मांग नहीं थी और पूरे देश में समर्थन मूल्य की लचर प्रणाली चल रही थी। मगर कृषि कानूनों में कहीं भी समर्थन मूल्य का जिक्र न आने से आन्दोलनकारियों को ऐसा सिरा मिल गया जिसे पकड़ कर वे कृषि कानूनों का और धारदार तरीके से विरोध कर सकते हैं। एक मायने में देखा जाये तो समर्थन मूल्य कृषि कानूनों के विरोध का  ‘उप-उत्पाद’ है। मगर यह ऐसा मुद्दा है जो किसानों की एकजुटता को सीधे बांधने की क्षमता रखता है क्योंकि इसमें कोई पेंच या उलझाव नहीं है जबकि कृषि कानूनों में बहुत से पेंच और उलझाव थे। यही वजह है कि आन्दोलकारी किसान इस मांग को तीनों कृषि कानूनों की वापसी के आश्वासन के बावजूद गले से लगा कर बैठ गये हैं।

यह भी सत्य है कि स्वतन्त्रता के बाद से अभी तक कोई भी सरकार समर्थन मूल्य को कानूनी अधिकार बनाने की हामी नहीं रही है। इसकी वजह भी बहुत स्पष्ट है कि कोई भी सरकार ‘जिंस बाजार’ की सभी ताकतों को अपने नियन्त्रण में नहीं रख सकती है। ऐसा नियन्त्रित अर्थव्यवस्था के दौर तक में संभव नहीं था जबकि अब तो बाजार मूलक अर्थव्यवस्था का दौर है। बाजार की मूल्य परक शक्तियों का मुकाबला सरकारें किसानों को सब्सिडी देकर करती रही हैं। इसका दोहरा फायदा होता रहा है एक तरफ तो किसान के लिए जरूरी कच्चा माल सस्ता बना रहा है और दूसरी तरफ बाजार में खाद्यान्न के दाम नियन्त्रित रहे हैं। मगर अब बाजार मूलक दौर में यह सन्तुलन बिगड़ रहा है जिसकी वजह से खेती घाटे का सौदा भी बनती जा रही है। इन्ही सब मुद्दों पर गौर करते हुए हमें बीच का ऐसा मार्ग खोजना होगा जिससे कृषि क्षेत्र लाभकारी भी बना रहे और किसान का बेटा अन्य व्यवसायियों की तरफ भी आकर्षित हो क्योंकि बदलती पीढि़यों के साथ किसानों की जमीन के रकबे लगातार छोटे होते जा रहे हैं।