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फिर चर्चा में हाथरस

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब उत्तर प्रदेश का हाथरस काफी दिनों तक चर्चा में रहा। अब फिर हाथरस चर्चा में है। हाथरस का इलाका बार-बार देशवासियों को व्यथित कर रहा है। एक बार फिर हाथरस के नौजपुर गांव की बेटी इंसाफ के लिए गुहार लगा रही है। इस बेटी ने ढाई वर्ष पहले छेड़छाड़ करने वाले युवकों के विरुद्ध केस दर्ज कराया था और आरोपी केस वापिस लेने के लिए दबाव बना रहे थे। इस मामले में मुख्य आरोपी को 15 दिन जेल में भी रहना पड़ा था। जेल से लौटने के बाद से ही वह बदला लेने की फिराक में था। उसने साथियों के साथ लड़की के पिता की हत्या कर दी। ऐसी घटनाएं केवल उत्तर प्रदेश में ही होती हैं ऐसा नहीं है। एक झपटमार दो वर्ष की बच्ची को गोद में उठाए एक महिला की भरे बाजार में गले पर वार कर हत्या कर देता है और समाज मूक दर्शक बन कर देखता रहता है। रोड रेज के चलते मामूली सी बात पर लोग गोली मार देते हैं। जिस बेटी ने अपने​ पिता की अर्थी को कंधा दिया, आखिर उसका दोष इतना था कि वह अपनी अस्मिता के लिए लड़ रही थी। हर बार पुलिस व्यवस्था को कोसा जाता है। आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं। अपराधियों को किसी न किसी राजनीतिक दल से जोड़कर सियासत की जाती है। ऐसा वातावरण सृजित हो चुका है जिसमें ऐसा अहसास होने लगा है कि जितने भी समाज में पाप हो रहे हैं वह राजनीति की कोख से ही पनप रहे हैं। ऐसा माहौल सृजित हो जाना न तो समाज के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। यह भी वास्तविकता है कि पुलिस हर खेत में, हर गली में सुरक्षा नहीं दे सकती। किसी भी समाज में शांति का वातावरण बनाए रखने के लिए उसे अपराध मुक्त होना अत्यंत आवश्यक है। समाज को अपराध मुक्त रखने के लिए अपराध और अपराधी के मनोविज्ञानिक को समझना बहुत जरूरी है। लड़की द्वारा छेड़छाड़ का केस दर्ज कराए जाने के बाद आरोपी ​युवक और उसका पूरा परिवार आक्रोशित हो गया था। यही आक्रोश प्रतिशोध में बदल गया। वे अपने दुश्मन परिवार से हिंसा का सहारा लेकर आत्मसंतोष अनुभव करते होंगे। ऐसा विशेष कर देहाती क्षेत्रों में देखा जाता है। इस प्रतिशोध की ज्वाला में परिवार के परिवार नष्ट हो जाते हैं। कुछ परिवार अपने प्रतिशोध के लिए धन दौलत के साथ अपना समय खर्च कर पूरा जीवन तबाह कर लेते हैं। प्रतिशोध के चलते आरोपियों को अब जेल में सड़ना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आरोपियों पर रासुका के तहत कार्रवाई करने के निर्देश दे दिए हैं। अभी एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया है, अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी पर पुलिस ने ईनाम भी घोषित कर दिया है। अक्सर कहा जाता है कि कोई भी व्यक्ति प्राकृतिक रूप से अपराधी के तौर पर जन्म नहीं लेता। जब भी किसी क्षेत्र में आम आदमी आपराधिक गतिविधियों में संलग्न होने लगता है तो समाज में विकृतियां आने लगती हैं। 70 और 80 के दशक में भारत के अनेक शहरों और देहात में बार-बार दंगे होते रहते थे। उत्तर प्रदेश के कुछ जिले तो जातीय एवं धार्मिक दंगों के लिए पूरी तरह बदनाम हो चुके थे, जिनमें मेरठ, अलीगढ़, मुरादाबाद विशेष दंगा ग्रस्त शहर बन गए थे। जिन परिवारों का कोई सदस्य दंगों का शिकार हुआ वे परिवार दूसरे समुदाय के विरुद्ध बदले की भावना से जलने लगा। असुरक्षा की भावना ऐसी पनपी कि हर काई अपने घर में वैध-अवैध हथियार रखने लगा। ऐसे में आपराधिक प्रकृतियां ही जन्म लेंगी। समाज में असहिष्णुता की भावना खत्म हो रही है। छोटी-छोटी बातों पर खून बहा दिया जाता है। ये बहुत ही खौफनाक माहौल है।

महिलाओं पर यौन उत्पीड़न के इरादे से हमले के अपराध व्यापक और अंडर रिपोर्टेड हैं। अकेली आवाज और अकेली ​जिन्दगी होने की वजह से महिलाओं की ओर से ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट नहीं होती। उनके पास रिपोर्ट के लिए परिवार का समर्थन नहीं होता, क्योंकि परिवार वालों को सामाजिक शर्म का डर सताता है। अगर हाथरस की बेटी ने आवाज उठाई तो आरोपियों ने उसे अनाथ बना डाला। महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों का हमें हल ढूंढना है, लेकिन हम समस्या की जड़ से दूर भाग रहे हैं। कुछ सवाल सामने हैं कि मानसिक रूप से बीमार युवकों के बर्बर होने के पीछे कौन सी वजह है। क्यों वो दानव बन जाते हैं? कौन है जो उन्हें ऐसा बना रहा है। आज मां अपने बेटों से यह पूछने से भी डरती है कि वो कहां जाते हैं? पिता को परिवार की रोजी-रोटी की चिंता है या फिर वे खुद गैर जिम्मेदार हैं। कोई रोक-टोक भी नहीं। पुलिस के पास ऐसी प्रणाली भी नहीं है कि जो ऐसे लोगों की पहचान कर ले कि कौन-कौन गुंडे बदमाश के तौर पर इलाके या पड़ोस के लिए समस्या बन सकता है। इसके लिए गांव पुलिस अधिकारी सिस्टम की जरूरत है। समाज को अपराध मुक्त रखने के लिए आवश्यक है कि अपराधियों को शीघ्र से शीघ्र सजा देने की व्यवस्था हो और समाज को भी सामूहिक रूप से शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण पर जोर देना चाहिए। बच्चों में पनपते असंतोष को समय रहते दूर किया जाना चाहिए। आपराधिक न्याय प्रणाली में आंतरिक समन्वय होना चाहिए, जो मौजूदा स्थिति में कमजोर नजर आता है। जिसके कारण बाएं हाथ को पता नहीं होता कि दाहिना हाथ क्या कर रहा है। जब हवस के भूखे भेड़िये घूम रहे हों, तो हमारी बेटियां सुरक्षित कैसे रह सकती हैं। हाथरस गलत कामों की वजह से बार-बार क्यों चर्चा में आ रहा है, इसका कारण क्या है, इस पर समाज को ही विचार करना होगा।